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जिनपिंग के 'तानाशाही तेवरों' से कैसे निपटेगी दुनिया और खुद चीन

सीपीसी ने माओ त्से तुंग के बाद शी जिनपिंग को सबसे शक्तिशाली नेता बताते हुए संविधान में बदलाव के तर्को को चीनी राष्ट्रवाद से जोड़ा है.

Updated On: Feb 28, 2018 03:16 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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जिनपिंग के 'तानाशाही तेवरों' से कैसे निपटेगी दुनिया और खुद चीन

चीन एक ऐसे रास्ते की तरफ बढ़ रहा है जिससे वहां की राजनीतिक व्यवस्था ऐतिहासिक बदलाव की गवाह बनेगी. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी पार्टी की अंतरात्मा की आवाज सुनकर ऐसे 'सम्राट' बनने जा रहे हैं जो अपनी इच्छा से ताउम्र चीन की सत्ता के सिंहासन पर बिराजमान रहेंगे. चीन का भूत-भविष्य-वर्तमान सबकुछ शी जिनपिंग अपने एक फैसले से कर सकेंगे. उन पर किसी के विरोध के साया तक नहीं पड़ सकेगा.

चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीसी चाहती है कि उसके प्रमुख यानी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपना पद कभी नहीं छोड़ें. वो जबतक चाहें तबतक राष्ट्रपति बने रहें. सीपीसी की इस ख्वाहिश को अंजाम देने के लिए संविधान में बदलाव करने का प्रस्ताव सेंट्रल कमिटी को सौंप दिया गया है. इस प्रस्‍ताव में राष्‍ट्रपति और उप-राष्‍ट्रपति के कार्यकाल की दो टर्म की सीमा को खत्म कर कार्यकाल की अवधि को अन‍िश्चितकाल तक करने की बात कही गई है.

China

इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद दो बार से चीन के राष्ट्रपति पद पर बने रहने के बावजूद शी जिनपिंग के ऊपर सत्ता छोड़ने का दबाव नहीं होगा. उनके हाथ में आजीवन सत्ता रहेगी. 5 मार्च से शुरु होने वाले नेशनल पीपल्स कांग्रेस में संविधान के नियम को बदलने वाला ये प्रस्ताव रखा जाएगा. जिसके बाद यह प्रस्ताव संसद में भेजा जाएगा. इसके मंजूरी मिलने में फिलहाल कोई शक या शुबहा नहीं दिखाई देता है क्योंकि संसद में करीब 70 प्रतिशत प्रतिनिधि कम्युनिस्ट पार्टी से हैं.

शी जिनपिंग साल 2012 में चीन के राष्‍ट्रपति चुने गए थे और नियम के मुताबिक उन्हें साल 2023 में पद छोड़ना होगा. शी जिनपिंग से पहले जियांग जेमिन और हू जिंताओ भी दो कार्यकाल तक महासचिव और राष्ट्रपति पद पर रहे थे. लेकिन संविधान में बदलाव होते ही शी जिनपिंग एक तरह से चीन के सम्राट की भूमिका में आ जाएंगे. इस समय शी जिनपिंग सीपीसी और सेना दोनों के ही प्रमुख हैं.

चीन की राजनीति ने दरअसल चीन के विस्तारवादी नीतियों के चेहरे को ही शी जिनपिंग की आधुनिक ताजपोशी के जरिए नुमाया किया है.

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चीन में तकरीबन तीन दशक तक तक एकछत्र राज करने वाले माओ त्से-तुंग को अगर आधुनिक चीन का संस्थापक माना जाता है तो उनके बाद सीपीसी अब शी जिनपिंग को इक्कीसवीं सदी के आधुनिक चीन के निर्माता के रूप में पेश करना चाहती है. सीपीसी ने क्रांतिकारी संस्थापक माओ त्से तुंग के बाद शी जिनपिंग को सबसे शक्तिशाली नेता बताते हुए संविधान में बदलाव को चीनी राष्ट्रवाद से जोड़ा है.

दरअसल इस निर्णायक बदलाव के पीछे सीपीसी का तर्क ये है कि साल 2020 से 2035 तक चीन के आधुनिकीकरण और सशक्तिकरण के लिए शी जिनपिंग का दो टर्म का कार्यकाल कम है. अगर चीन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दबदबा बनाना है और आधुनिकता के साथ तरक्की की राह पर जाना है तो राष्ट्रपति के दो टर्म के पुराने नियम में बदलाव जरूरी है. सीपीसी की सोच है कि शी जिनपिंग को ज्यादा से ज्यादा समय दिया जाए ताकि वो भविष्य की नीतियों को जमीन पर उतार सकें.

शी जिनपिंग अपने फैसलों की वजह से माओ त्से तुंग के बाद चीन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शुमार करने लगे हैं. शी के फैसलों से चीन ने एक दशक के भीतर हर मोर्चे पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर में दबदबा कायम करने की ताकत दिखाई है. चीन के बाजार को ऊंचाई पर ले जाने के लिए शी की 'वन बेल्ट वन रोड' जैसी योजना चीन के लिए टर्निंग प्वाइंट मानी जाती है.

china russia

शी जिनपिंग की बढ़ती ताकत के पीछे उनके सख्त फैसलों की भी अपनी भूमिका है. भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने मुहिम चला कर तकरीबन दस लाख लोगों को सलाखों के पीछे भेजा. भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके अभियान में न सिर्फ बड़ी संख्या में सेना और पार्टी के लोगों को पकड़ा गया बल्कि शी जिनपिंग के विरोधियों को भी ठिकाने लगा दिया. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में शी जिनपिंग के सामने चुनौती देने वाला न कोई दिखाई दे रहा है और न ही उन्हें किसी की चुनौती पसंद है.

वहीं राजनीतिक लोकप्रियता हासिल करने के लिए शी जिनपिंग ने साल 2020 तक चीन से गरीबी मिटाने का ऐलान कर सबको चौंका डाला. आज चीन की सुस्त आर्थिक ग्रोथ को देखते हुए सीपीसी अपने प्रमुख के हाथ में जादू की छड़ी देख रही है. उसे लगता है कि शी जिनपिंग को अनिश्चितकालीन छूट देने से चीन अर्थव्यवस्था में नए आयाम गढ़ सकता है क्योंकि सामरिक मुद्दों पर शी जिनपिंग के रुख ने चीन को अमेरिका के सामने सबसे मजबूत प्रतिद्वन्द्वी के तौर पर तैयार किया है.

अंतर्राष्ट्रीय मामलों में उन्होंने चीन के दबदबे को बनाने के लिए दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर अमेरिका को आंखें दिखाने में कसर नहीं छोड़ी तो वहीं  ‘वन चाइना पॉलिसी’ पर बदलते रुख को लेकर अमेरिका को चेताया भी. आज जितना ताकतवर देश बनकर चीन उभरा है उतना वो इतिहास में कभी नहीं था.

चीन के साथ अमेरिका के संबंधों में हाल के दिनों में कड़वाहट आई है

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अतीत में कहा जाता था कि ड्रैगन सो रहा है और उसे छेड़ा न जाए लेकिन अब दुनिया देख रही है कि ड्रैगन किस तरह से जाग चुका है. दुनिया के 12 देशों के साथ चल रहे सीमाई विवाद चीन की विस्तार नीति का हिस्सा हैं और शी जिनपिंग ने उन्हें डंके की चोट पर आगे बढ़ाने का काम किया है. भारत के साथ सीमाई विवाद तो डोकलाम के मुद्दे पर युद्ध की नौबत भी चीन के मनोवैज्ञानिक युद्ध शैली का नमूना है जिसे शी जिनपिंग के कार्यकाल में ज्यादा हवा मिली.

पूरे चीन में इस वक्त शी जिनपिंग ‘पापा शी’ के रूप में प्रसिद्ध हैं. शी जिनपिंग ने खुद को चीन की नई सोच के निर्माता के ब्रांड के रूप में साबित किया है. जिस कम्युनिस्ट पार्टी ने शी जिनपिंग को राजनीति का प्लेटफॉर्म दिया तो अब शी का कद उस पार्टी से भी ऊपर हो चुका है. इसके इस बात से समझा जा सकता है कि जहां पिछले साल हुई सीसीपी की बैठक में न सिर्फ शी जिनपिंग के अगले पांच साल के कार्यकाल पर मुहर लगा दी गई बल्कि शी जिनपिंग के उत्तराधिकारी का नाम तक नहीं लिया गया. समझा जा सकता है कि शी जिनपिंग एक राष्ट्र और एक राष्ट्राध्यक्ष की सोच पर आगे बढ़ने का मन बना कर ही चीन की सत्ता पर काबिज हुए थे. अब नियमों में बदलाव उसी सोच के परिणाम का हिस्सा है.

शी जिनपिंग की ताकत को इस बात से समझा जा सकता है कि संविधान में भी उनके राजनीतिक विचारों को जोड़ा जा रहा है. वैसे भी किसी सुपरस्टार की तरह चीन की सड़कों पर शी जिनपिंग के होर्डिंग और पोस्टर दिखाई देते हैं जो आम जनता के अवचेतन में किसी सम्राट की जगह बनाने का मकसद ही ज्यादा दिखाई देता है.

China Dragon

हालांकि चीन का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स  इशारा करता है कि संविधान में संशोधन का ये कतई मतलब नहीं है कि चीनी राष्ट्रपति का कार्यकाल आजीवन होगा लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी की दलील ये है कि चीन को साल 2020 से साल 2035 तक स्थिर और ताकतवर राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत है. ऐसे में साल 2035 तक चीन के ‘पापा शी’ को लेकर कोई सवाल नहीं खड़े कर सकता है.

बहरहाल इस बदलाव को लेकर अंदेशा ये है कि चीन भी नॉर्थ कोरिया की तरह कहीं तानाशाही की राह पर आगे न बढ़ जाए. वैसे भी शी जिनपिंग के कार्यकाल में मानवाधिकार-दमन के कई आरोप लग चुके हैं.

भले ही सोशल मीडिया पर शी जिनपिंग को लेकर ‘विनी पूह’ के नाम से मजाक उड़ाया जा रहा हो लेकिन चीन की राजनीति में ये बड़ा बदलाव दुनिया के लिए भी बदलाव की पटकथा लिख सकता है.

 

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