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दक्षिण अफ्रीका की 'मामू वेतु' विनी मंडेला के संघर्ष को भुला नहीं पाएगी दुनिया

अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग की तरह दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ अश्वेतों के संघर्ष की साढ़े तीन दशक तक प्रतीक रहीं विनी मंडेला ने आखिर दो अप्रैल को भारी मन से दुनिया छोड़ दी.

Anant Mittal Updated On: Apr 03, 2018 06:21 PM IST

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दक्षिण अफ्रीका की 'मामू वेतु' विनी मंडेला के संघर्ष को भुला नहीं पाएगी दुनिया

अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग की तरह दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ अश्वेतों के संघर्ष की साढ़े तीन दशक तक प्रतीक रहीं विनी मंडेला ने आखिर दो अप्रैल को भारी मन से दुनिया छोड़ दी. उनकी याद में उनका देश 11 अप्रैल को शोक सभा करेगा और 14 अप्रैल को उन्हें राजकीय सम्मान के साथ दफनाया जाएगा.

आधी सदी तक दक्षिण अफ्रीका की राजनीति में सक्रिय रहीं विनी मदिकिजेला मंडेला को उनके क्रांतिकारी साथी और राष्ट्रपति साइरिल रमाफोसा ने 'वंचितों की आवाज' बताया. उनके अनुसार 'मदाम विनी' तो आजादी के संघर्ष के सबसे निराशाजनक वक्फों में भी हमारे अवाम की आजाद होने की आकांक्षा की प्रतीक बन मैदान में डटी रहीं. रमाफोसा ने रूंधे गले से कहा कि अत्याचारों से उन्होंने डटकर लोहा लिया और शोषण का मुकाबला न्याय तथा समानता की अलख जगाकर किया.

विनी ने महिला होने के बावजूद अश्वेतों के संघर्ष की कमान तब संभाल ली थी जबकि अमेरिका में ग्लोरिया स्टीनम औरतों से गैर-बराबरी पर कसमसा ही रही थीं. बराबरी मांगने के लिए ग्लोरिया को सेनेका फॉल्स पर औरतों को मोर्चाबंद करने में जहां अस्सी के दशक तक समय लग गया वहीं विनी 1960 के दशक में ही अश्वेतों के बराबरी के संघर्ष की कमान संभाल चुकी थीं. यह विनी मंडेला ही थीं जिन्होंने गोरों की कैद में 1964 से बंद अपने पति और स्वतंत्रता सेनानी नेल्सन मंडेला की आवाज को पूरे 26 साल देश और दुनिया के सामने बुलंद रखा.

हर साल सोवेटो दमन की जयंती पर विनी अपना खून से सना लाल ललाट लिए नस्लवादी गोरी सरकार के अत्याचार की मिसाल बन मीडिया की सुर्खियों में रहती थीं. नेल्सन पर जब जेल में अखबार पढ़ने पर भी रोक थी तब भी विनी की बदौलत उनका सारी दुनिया से संपर्क बरकरार रहा. इस तरह उन्होंने अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के अन्य अश्वेत नेताओं के साथ दक्षिण अफ्रीकी मूल निवासियों के संघर्ष को जिंदा रखा.

यह दुर्भाग्य ही है कि नेल्सन के जेल से रिहा होने और दक्षिण अफ्रीका की आजादी के दो साल बाद ही विनी को उनसे अलग होना पड़ा. उन्हें स्वच्छंद यौनाचार और कत्ल जैसे संगीन आरोपों में 1991 में छह साल कैद की सजा हुई मगर अपील पर उसे जुर्माने में बदल दिया गया. इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता बरकरार रही और वे 1993 में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की वीमेंस लीग की अध्यक्ष चुनी गईं. उसके बाद 1994 में उन्हें मंडेला सरकार में मंत्री बना दिया गया. तब तक एक-दूसरे से छिटक चुके नेल्सन और विनी की मंत्रिमंडल में भी नहीं बनी. प्रतिरोध की आदी विनी ने आजादी के बाद भी अपना तेवर नहीं बदला. लिहाजा उन्हें हुक्मउदूली के आरोप में साल भर बाद ही सरकार से बर्खाश्त कर दिया गया. इसके साथ ही 1996 में विनी ओर नेल्सन का तलाक भी हो गया.

Winnie Madikizela-Mandela listens to the testimony of a witness during a special public hearing of ..

उसके बाद वे सांसद निर्वाचित हुईं मगर फिर उन्हें धोखाधड़ी और बैंक से फर्जी आधार पर लोन लेने के मामले में फंसा दिया गया. वे उससे भी बेदाग बाहर आईं और मरते दम तक राजनीति में सक्रिय रहीं. अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के अध्यक्षों से उनकी लाग-डांट चलती रही. अपने जीवन के अंतिम काल में भी वे सांसद थीं. उनका अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति साइरिल रमाफोसा के साथ उसी सोवेटो शहर में था जिसमें उन्होंने 1976 में अश्वेतों पर अंग्रेजी थोपे जाने के विरोध में अपना खून बहाया था.

उस विरोध की कीमत उन्हें लंबा समय जेल की हवा खाकर चुकानी पड़ी थी. उस आंदोलन में रमाफोसा उनके साथी थे. बाद में भी सोवेटो विरोध की हरेक सालगिरह पर प्रतिरोध सभा में गोरों की लाठियों से उनका सिर फूटता रहा. रमाफोसा के साथ वे सोवेटो वहां के लोगों से बतौर मतदाता अपना नाम लिखाने की अपील करने गई थीं ताकि अगले साल के राष्ट्रपति चुनाव में वे वोट डाल सकें.

आरोप है कि विनी का पतन 1976 में मंडेला यूनाइटेड फुटबॉल क्लब में जमा की गई युवाओं की टोली के साथ शुरू हुआ. यही टोली उनकी अंगरक्षक की भूमिका भी निभाती थी. आजादी की मांग करने पर नस्लवादी गोरे हाथों से पड़ने वाली लाठियों से विनी को यही टोली बचाती थी. बाद में वे इनसे ऐसी घिरीं कि आरोपों के अनुसार टोली के गैर-कानूनी कामों को भी प्रश्रय देने लगीं. बाद में ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन ने भी आजादी के संघर्ष में उनपर कुछ अनैतिक कार्यों में शामिल होने का आरोप लगाया.

विनी को कानून की सजा से भी बड़ी सजा अपने उस पति से अलग होने की मिली जिसे उन्होंने रंगभेद से खुद लोहा लेने के बावजूद पूरी दुनिया की निगाहों में 'महान' बनाया. विनी का त्याग और संघर्ष तब रंग लाया जब नेल्सन 1990 में गोरों की कैद से बाहर आए और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया.

विनी से अलग होकर नेल्सन मंडेला ने तो अपने क्रांतिकारी साथी और मोजाम्बिक के पूर्व राष्ट्रपति समोआ माशेल की विधवा ग्राका माशेल से तीसरी शादी कर ली मगर बेवफाई के तमाम आरोपों के बावजूद विनी ने बाकी जीवन एकाकी काट दिया. अलबत्ता नेल्सन मंडेला की मौत होने पर उन्हें दफनाए जाने तक विनी ने बाकायदा शोक का प्रतीक काला लिबास पहन कर हरेक रस्म में जीवन और क्रांति के अपने साथी का पूरा साथ निभाया.

दक्षिण अफ्रीका और फिर भारत में महात्मा गांधी के अहिंसक संघर्ष से प्रेरित नेल्सन मंडेला ने रंगभेद के खिलाफ जब 1960 के दशक में आंदोलन छेड़ा तो गोरों की नस्लवादी सरकार ने उन्हें 1964 में देशद्रोह के आरोप में जेल में ठूंस दिया. इसके बावजूद न तो नेल्सन माफी मांग कर जेल से बाहर आए और न ही विनी ने उनकी आवाज को दबने दिया.

विनी खुद नेल्सन के अहिंसक संघर्ष का प्रतीक बनकर नस्लवाद के खिलाफ गोरों के डंडे खा-खाकर अश्वेत आंदोलन की अगुआई करती रहीं. दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने विनी को हर तरह से प्रताड़ित किया मगर वे हरेक विरोध प्रदर्शन का दोगुने उत्साह और संकल्प से नेतृत्व करती रहीं. रंगभेद विरोधी आंदोलन की अगुआई से लेकर विनी ने अपनी दोनों बेटियों सहित नेल्सन के चार बच्चों की परवरिश तक हरेक जिम्मेदारी बड़ी बहादुरी से निभाई. फिर भी सार्वजनिक जीवन में गैर-बराबरी का डटकर विरोध करनेवाली विनी की निजी जिंदगी खासी ट्रैजिक रही.

nelson mandela

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विनी ने 1958 में नेल्सन मंडेला से शादी करने के साथ ही क्रांतिकारी गतिविधियों में शिरकत शुरू कर दी थी. नेल्सन मंडेला के कैद होने के बावजूद उन्होंने आजादी का अभियान जारी रखा. उन्हें भी गोरी सरकार ने 1967 में आतंकवादी गतिविधियों का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया मगर रिहा होते ही वे फिर मैदान में डट गईं. उन्हें अनेक मौकों पर कैद करने के बावजूद नस्लवादी दक्षिण अफ्रीकी सरकार उनकी आवाज नहीं दबा पाई.

दुनिया में उसी दौरान बड़े पैमाने पर महिलाएं राजनीति में आ रही थीं. इसलिए उन्होंने अपनी सरकारों पर विनी नीत अश्वेत आंदोलन के समर्थन के लिए दबाव डाला. भारत में भी 1966 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने खुलेआम दक्षिण अफ्रीकी अश्वेत स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया. अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के प्रतिनिधि को राजदूत का दर्जा दिया गया.

विनी की खासियत यही रही कि बेहद पिछड़े देश में महिला होने के बावजूद उन्होंने अपनी अवाम के आजादी के आंदोलन का सक्रिय नेतृत्व किया और विवादों के बावजूद 55 साल राजनीति में डटी रहीं. इसीलिए दक्षिण अफ्रीका के अवाम ने उन पर तमाम आरोपों को नजरअंदाज करके उन्हें 'मामू वेतु' यानी 'राष्ट्र माता' पुकारा. इसके मर्म को हम हिंदुस्तानियों से बेहतर कौन समझ सकता है जिन्होंने अपने आजादी के महानायक महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता' का सम्मान दिया हुआ है. दुनिया में आजादी के महानायकों की जब भी गिनती होगी विनी का नाम हमेशा सुर्खियों में रहेगा.

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