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मर गया वो हक्कानी जो अमेरिका का हाथ थाम आगे बढ़ा, फिर उसी के खिलाफ लड़ा

कहा जाता है कि जलालुद्दीन हक्कानी को व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया गया था, वहां जाकर वह तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से भी मिला था

Updated On: Sep 04, 2018 06:09 PM IST

FP Staff

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मर गया वो हक्कानी जो अमेरिका का हाथ थाम आगे बढ़ा, फिर उसी के खिलाफ लड़ा
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अफगानिस्तान-पाकिस्तान के सबसे खतरनाक आतंकवादी गुटों में से एक है हक्कानी नेटवर्क. जिसे बनाया और बढ़ाया 'जलालुद्दीन हक्कानी' ने. वो जलालुद्दीन हक्कानी, जो सोवियत रूस के अफगानिस्तान पर प्रभुत्व स्थापित करने के दौर में एक अदना सा लड़ाका था और बाद में अमेरिका का हाथ पकड़कर ऊपर चढ़ा और जब अमेरिका ने अपनी मदद का बदला पाने की कोशिश की तो उसने अमेरिका को 'धोखेबाज' कहा और अपना पल्ला झाड़ लिया.

यहां तक कहा जाता है कि उसने अमेरिका के कट्टर दुश्मन लादेन को भी लंबे वक्त तक पनाह दी. इस आतंकी 'जलालुद्दीन हक्कानी' के इकट्ठा किए लड़ाके कभी अमेरिका की शह लेकर अफगानिस्तान में फैल रहे सोवियत रूस के कब्जे के खिलाफ लड़ रहे थे. बाद में जलालुद्दीन ने तालिबान के साथ हाथ मिला लिया और 1990 में जब तालिबान अफगानिस्तान में सत्ता में आने में कामयाब हो गए तब हक्कानी मंत्री भी बना.

कभी इतने शक्तिशाली नेटवर्क के आका रहे जलालुद्दीन हक्कानी की मौत की खबरें आई हैं. कई अमेरिकी रिपोर्ट्स के मुताबिक जलालुद्दीन वाकई मर चुका है. वैसे जलालुद्दीन की मौत की ख़बरें 2015 में भी आई थीं. लेकिन बाद में तालिबान ने ऐसी रिपोर्ट्स का खंडन किया था.

सोवियत-अफगान युद्ध ने बना दिया था हक्कानी के लिए माहौल

1979 से फरवरी, 1989 के बीच दस सालों तक चले सोवियत-अफगान युद्ध ने एशिया के इस हिस्से के इतिहास और भविष्य दोनों को ही हमेशा के लिए बदलकर रख दिया. उस दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA छिपकर पाकिस्तानी खूफिया एजेंसियों के साथ काम कर रही थी ताकि वह अफगान विद्रोही लड़ाकों के साथ संपर्क में रह सकें. इन लड़ाकों को मुजाहिदीन कहा जाता था.

उस वक्त सोवियत रूस की सेना ने अफगानिस्तान के प्रमुख शहरों और उन तक पहुंचने वाली सड़कों को घेर रखा था. इसी दौरान इन मुजाहिदों ने खुद को छोटे-छोटे गुरिल्ला ग्रुप्स में बांटकर पूरे अफगानिस्तान के करीब 80 फीसदी हिस्से में युद्ध छेड़ दिया. यह भाग अफगानिस्तान और सोवियत दोनों के ही कंट्रोल से बाहर हो चुका था.

उस दौरान इन विद्रोही लड़ाकों को अमेरिका और खाड़ी के अरब देशों से भारी मात्रा में आर्थिक मदद मिली. साथ ही इन देशों से इन विद्रोही लड़ाकों को ट्रेनिंग भी मिली. इन लड़ाकों का सरगना था जलालुद्दीन हक्कानी.

कहा जाता है अमेरिकी राष्ट्रपति से भी मिलता था हक्कानी

इसी बीच जलालुद्दीन हक्कानी का उभार इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण हस्ती के तौर पर हुआ. वह उस दौरान सोवियत रूस की शह पाई हुई अफगान सरकार से टकराने के लिए अमेरिका और पाकिस्तान का सबसे खास हथियार था. उस दौरान कुछ मीडिया हाउस ने यह अंदेशा भी जताया था कि जलालुद्दीन हक्कानी को व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया गया था. तो कुछ ने यहां तक भी कहा कि वह अमेरिका के व्हाइट हाउस गया था और वहां जाकर वह तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से मिला भी था.

इन दूसरे देशों के युद्ध में अमेरिका क्या कर रहा था? इस प्रश्न का जवाब पेंचीदा है. कुछ लोग कहते हैं कि इस तरह से पाकिस्तान के पड़ोसी देश को किसी दूसरे शक्तिशाली देश के प्रभाव से बचाकर अमेरिका पाकिस्तान से अपनी दोस्ती को सुदृढ़ कर रहा था. वहीं कुछ दूसरे विदेशी मसलों के जानकार कहते हैं कि अमेरिका के इस मामले में शामिल होने का एकमात्र मकसद सोवियत रूस को ठेस पहुंचाना था. अमेरिका चाहता था कि जिस तरह से उसकी वियतनाम के युद्ध के दौरान पूरी दुनिया में फजीहत हुई, उसी तरह से अफगानिस्तान को सोवियत रूस का वियतनाम बना दिया जाए.

सोवियत-अफगान युद्ध के बाद

सोवियत-अफगान युद्ध तो खत्म हो गया. लेकिन हक्कानी और उसके साथी बाकी थे. और सभी को हथियारों और पैसों का चस्का लग चुका था. ऐसे में अमेरिकी पैसे आने बंद होने के बाद जलालुद्दीन ने खुद कुछ करके पैसा कमाने की सोची. उसने ऐसे विदेशी लड़ाकों, आतंकियों और नेताओं के साथ हाथ मिला लिए जिनके पास पैसे थे. उसने जिन लोगों से हाथ मिलाए, उनमें ओसामा-बिन-लादेन भी शामिल था, जो आगे चलकर अलकायदा का प्रमुख बनने वाला था.

1992 में इन मुजाहिदों ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया और इसके बाद जब मुजाहिद नेताओं ने वहां सरकार बना ली तो जलालुद्दीन हक्कानी को अंतरिम मंत्रिमंडल में मिनिस्टर ऑफ जस्टिस बनाया गया. 1995 में जलालुद्दीन ने तालिबान आंदोलन के साथ हाथ मिला लिए जिसने उसी दौरान मुजाहिदों से राजधानी छीन ली थी. जलालुद्दीन ने उनके साथ जनजातीय मामलों के मिनिस्टर के तौर पर काम किया.

अक्टूबर 2001 में हक्कानी को तालिबान का मिलिट्री कमांडर बना दिया गया. कहा जाता है कि ओसामा बिन लादेन को लंबे समय तक छिपाने में भी उसका हाथ था. कहा जाता है एक दौर में अमेरिका ने तालिबान से जलालुद्दीन को दूर ले जाने का प्रयास भी किया था. लेकिन जलालुद्दीन ने अमेरिका का ऑफर उन्हें 'धोखेबाज घुसपैठिया' कहते हुए ठुकरा दिया. इस मौके पर जलालुद्दीन का कहना था कि यह उसका कर्तव्य है कि वह अमेरिकियों को वैसे ही रोके जैसे वह एक दशक पहले सोवियत को रोक रहा था.

कैसे चलता था हक्कानी नेटवर्क?

2001 में अमेरिका के नेतृत्व में जो चढ़ाई अफगानिस्तान पर की गई, उससे तालिबान को गद्दी से हटा दिया. ऐसे में हक्कानी नेटवर्क के नेताओं ने भागकर पाकिस्तान के कबायली इलाकों में शरण ली. और जल्द ही उसने फिर से अंतरराष्ट्रीय ताकतों के खिलाफ तालिबान की विद्रोहियों को फिर से ज्वाइन कर लिया. कहा जाता है इसमें अफगानिस्तान सरकार से भी उसे मदद मिली. जो हामिद करजई के हाथ में थी. लेकिन आगे के ऑपरेशन चलाने की जिम्मेदारी अब हक्कानी से लेकर उसके बेटे सिराजुद्दीन को दे दी गई थी. क्योंकि हक्कानी बूढ़ा हो चुका था और उस दौर की रिपोर्ट्स की मानें तो बीमार भी था. इस नेटवर्क को की सारे हाई-प्रोफाइल अटैक कराने के चलते जाना जाता है. इन अटैक में बम से उड़ाना, राजनीतिक हत्या और छापामार हमले शामिल हैं. इन हमलों का केंद्र खासकर काबुल होता है.

रिपोर्ट्स के अनुसार हक्कानी नेटवर्क अपने ट्रेनिंग कैंप भी चलाता है. इन कैंप में विदेशी लड़ाकों को भी ट्रेनिंग दी जाती है. साथ ही इस नेटवर्क के लोग अपने पुराने कांटैक्ट्स से पैसों और चीजों के मामले में भी सहयोग पाते हैं. इस नेटवर्क में शामिल लोगों के नंबर बदलते रहे हैं. 2009 में छपी न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार इनके नेटवर्क में 4,000 से 12,000 तालिबानियों के होने की आशंका है. जबकि 2011 में आई कॉम्बैटिंग टेरिरिज्म सेंटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक इनकी संख्या 10,000 से 15,000 के बीच है.

सितंबर, 2011 में दिए एक इंटरव्यू के दौरान, सिराजुद्दीन हक्कानी ने अपने नेटवर्क में आतंकियों की संख्या 10,000 बताई थी. लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि उसके लड़कों की संख्या इससे काफी कम है.

वैसे इस ग्रुप का इतिहास ही रहा है कि यह हमेशा छोटे गुटों के जरिए हमले करवाता है. जिसमें ज्यादातर जनजातीय लड़ाके होते हैं. यही जनजातीय लोग कई बार इस ग्रुप के लोगों को मदद भी उपलब्ध कराते हैं. जब तालिबान के खिलाफ कार्रवाई तेज होती है, इसके आतंकियों को पाकिस्तान में शह मिल जाती है. हाल ही में अमेरिका ने पाकिस्तान के आतंक के खिलाफ कार्रवाई न करने से क्रोधित होकर उसकी आर्थिक मदद में कटौती भी की है.

हक्कानी के बारे में पिछले दिनों से कुछ खास पता नहीं था पर लोगों को इस बात की जानकारी थी कि वह काफी दिनों से बीमार चल रहा है. फिलहाल हक्कानी नेटवर्क का कर्ता-धर्ता उसका बेटा सिराजुद्दीन हक्कानी है.

(न्यूज18 के लिए अविनाश द्विवेदी की रिपोर्ट)

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