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आजादी से पहले ही आज के पाकिस्तान का भविष्य बता गए थे मौलाना आज़ाद

9/11 की बरसी पर पाकिस्तान की अमेरिका से कही गई बात हास्यास्पद है.

Nazim Naqvi Updated On: Sep 13, 2017 09:43 AM IST

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आजादी से पहले ही आज के पाकिस्तान का भविष्य बता गए थे मौलाना आज़ाद

ये किस्सा काफी पुराना हो चुका है. एक बस्ती के कुछ घरों पर चूहों ने कब्जा कर लिया और ऐलान कर दिया कि ये आज से ‘रैट-लैंड’ है और अब इस जगह पर उनका कानून होगा. इस ऐलान के बाद चूहों ने उस इलाके से दूसरे जानवरों को खदेड़ना शुरू कर दिया. चूहों की एक अच्छी-खासी तादाद, जो बाहर से उस इलाके में आई थी उसे अपने सिवा किसी की फिक्र नहीं थी. उन्होंने हर तरफ अपने लिए लम्बी-लम्बी सुरंगे खोद लीं.

इस बीच चूहों की अपनी नस्ली लड़ाई, जो काफी पुरानी थी, उसमें भी उफान आया. जैसे इंसानों में अरबी, गैर-अरबी होते हैं वैसे ही काले चूहे, गोरे चूहे, संशोधित चूहे, वगैरह-वगैरह में आपसी रिश्ते इतने कड़वे हो गए कि सांप्रदायिक दंगों में बदल गए. जब चूहों में ये हाल था तो सोचिए दूसरे जानवर, जो इनके बीच फंसे हुए थे, उनकी क्या हालत होगी.

फिर ये हुआ कि जो चूहे बहुमत में थे, उनकी सुरक्षा के नाम पर कुछ चूहों ने खुद को जहरीले नागों में बदल लिया और उन्हीं बिलों में, उनके साथ रहने लगे. जब तक नाग छोटे थे, उनके खाने-पीने का इंतजाम चूहे आसानी से कर लेते थे लेकिन जब वो बड़े और खौफनाक हो गए और उनकी नस्ल भी बढ़ने लगी तो चूहों के लिए ये भारी पड़ने लगा क्योंकि भूख में वो उन्हें ही खा जाएंगे, ये खौफ भी गलत नहीं था.

बस्ती के पड़ोस में, पहाड़ी इलाके को, जिसे तेंदुओं की बस्ती (जैसे अफ़गानिस्तान के स्नो-लेपर्ड) के नाम से जाना जाता था, पर दूसरे इलाके के भालूओं ने (जो रशियन बेयर जैसे थे) कब्जा कर रखा था. ये बात बहुत दिनों से एक और इलाके में रहने वाले जंगली-भैंसों (जो अमरीकन-बाइसन नस्ल के थे) को बड़ी नागवार गुजर रही थी. सुविधा-संपन्न होने की वजह से वो खुद को पूरे जंगल का बादशाह समझते थे.

जब इन जंगली भैंसों को पड़ोस में पल रहे इन नागों और इनसे पैदा होने वाले चूहों के भय का पता चला तो, उन्होंने इनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठाते हुए शर्त ये रखी कि बदले में ये भालूओं को तेंदुओं की बस्ती से निकालने में उनकी मदद करेंगे.

ये कहानी तो बड़ी लंबी है, अंततः भालूओं को इन नागों ने निकाल बहार किया, लेकिन सारांश में इसका वर्तमान हिस्सा ये है कि भैंसे अब चूहों से कह रहे हैं कि जब इन नागों का काम खत्म हो चुका है तो इनको मार डालो क्योंकि ये पूरे जंगल के लिए खतरा हैं. इधर चतुर-चालाक चूहों को जबसे ये पता चला है कि भैंसों के राजा अब नागों के नाम पर आने वाला सालाना खर्च नहीं देंगे तो वह बेचैन हो गए हैं क्योंकि जो मदद आती थी उसका एक बड़ा हिस्सा वो खुद अपने लिए बचा लेते थे.

अब चूहों ने एक नई चाल निकाली है, इसमें नाग भी उनके साथ हैं. चूहों ने भैंसों के राजा और सभी पड़ोसी जानवरों से कह दिया है कि दरअसल वे खुद भी नागों से बहुत परेशान हैं लेकिन अपने संसाधनों के दम पर वे अपने ही इन नागों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं इसके लिए उन्हें विदेशी मदद की दरकार है. भैंसों के पिछले राजाओं ने तो चूहों की बात मानकर उन्हें हर तरह की मदद दी लेकिन आजकल जो नया राजा आया है उसने कह दिया है कि ‘बहुत हो चुका बंद करो ये नाटक, अब कोई मदद नहीं मिलेगी’.

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सुनते हैं कि चूहों को इस बात का अंदेशा पहले से था, इसीलिए उन्होंने पड़ोस में रहने वाले ड्रैगनों के साथ -जिनकी भैंसों से नहीं बनती– दोस्ती का वही खेल खेलना शुरू दिया है जो पहले वो भैंसों के साथ खेलते थे. वो भैंसों से मिलने वाली मदद में जैसे ही कमी आती है, धमकी देते हैं कि उन्हें तो इन नागों से लड़ना है, उसके लिए हथियार अगर भैंसों से नहीं मिलेंगे तो वो मजबूरन ड्रैगन राजा के पास जाएंगे. भैसों का इलाका, बढ़ते हुए ड्रैगनीय अस्तित्व से पहले ही चौकन्ना है. उससे चूहों की ये धमकी निगली नहीं जा रही है.

अब जैसे ही मदद में कमी आती है, नाग बिलों से निकलकर दो-चार घटनाएं अंजाम दे देते हैं. चूहे पहले ही एलान कर चुके हैं कि वे खुद इन नागों से परेशान हैं और उनसे लड़ रहे हैं. लेकिन इन चालाक चूहों की कलई अब खिल रही है. चूहों के बीच भी एक वर्ग ऐसा है जो अब खुले आम ये कहने लगा है कि सत्ता में बैठे चूहे और बिलों में छुपे हुए नाग, दोनों ने इस जहरीली दहशत को अपना कारोबार बना लिया है, और दोनों, पड़ोस को बेवकूफ बनाकर मजे कर रहे हैं.

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9/11 की बरसी पर पाकिस्तान का बयान

मुझे ये किस्सा इसलिए याद आया कि बीते मंगलवार को पकिस्तान के नए प्रधानमंत्री ‘शाहिद खाकान अब्बासी’ ने 9/11 की सोलहवीं बरसी के दिन कहा कि पिछले महीने अमरीका ने नई ‘अफगान-नीति’ के तहत पाकिस्तान पर जो प्रतिबंध लगाने की बात कही है उससे ‘आतंक के खिलाफ दोनों देशों की साझी लड़ाई में रुकावट आएगी. सैन्य-सहायता और एफ-16 जहाज़ों की खरीद में मिलने वाली छूट अगर बंद हुई तो उन्हें मजबूरन ये हथियार चीन से लेने पड़ेंगे’.

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विभाजन के बाद से पकिस्तान जिस तरह से अपना कारोबार कर रहा है और आतंक के नाम पर पूरी दुनिया के लिए सरदर्द बन गया है, इसकी निशानदही तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने विभाजन से पहले ही कर दी थी. हैरत तो ये है कि उस समय न तो मुस्लिम लीग ने और न ही दूसरे मुसलामानों ने उनकी बातों पर ध्यान दिया.

'धर्म और विदेशी कर्जों जैसी समस्याओं से ग्रस्त होगा पाकिस्तान'

1946 में, लाहौर से निकलने वाली एक पत्रिका ‘चट्टान’ में पत्रकार ‘शोरिश काश्मीरी’ ने उनसे एक लम्बा इंटरव्यू किया जिसमें मौलाना आज़ाद ने उस समय पेशिनगोई कर दी थी जिसे आज 70 साल बाद हम सब देख रहे हैं. ये नायाब इंटरव्यू को आरिफ मुहम्मद खान ने अथक प्रयास करके ढूंढ निकाला और ये उनकी हिंदी में आने वाली पुस्तक का हिस्सा है. इस पूरे साक्षात्कार पर फिर कभी चर्चा करेंगे, फिलहाल पकिस्तान के भविष्य पर मौलाना के विचार पेश हैं.

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पहले तो उन्होंने मुस्लिम लीग के उस आरोप का जवाब देते हुए कि ब्रिटिशों के जाने के बाद जो नया भारत होगा वो ‘हिन्दू-राज्य’ होगा, पर कहा- ‘आप ये उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि एक समाज जो 90 प्रतिशत हिन्दू-आबादी पर आधारित है, जो अपने स्वभाव और मूल्यों के साथ, आदिकाल से रहता चला आ रहा है, अब अलग तरह से विकसित होगा’.

दरअसल मौलाना आज़ाद, तकसीम से पहले ही महसूस कर रहे थे सांप्रदायिक सियासत के उस नासूर को जिसका इलाज नामुमकिन था. उन्होंने कहा- ‘जैसा कि मैं साफ़ देख सकता हूं, जिनके हाथों में हुकूमत की लगाम होगी, वे इस्लाम को गंभीर नुकसान पहुंचाएंगे. आप देखेंगे कि उलेमाओं की बढ़ती हुई भूमिका के बावजूद, पकिस्तान में धर्म अपनी अपनी चमक खो देगा’.

‘मैं शुरुआत से ये महसूस कर रहा हूं कि जो गंभीर दिक्कतें पकिस्तान बन जाने के बाद आएंगी’. उसके बाद मौलाना आज़ाद ने एक–एक करके उन दिक्कतों को भी गिनाया.

सियासी नेतृत्व की अयोग्यता आखिरकार सैनिक-शासन के लिए रास्ता बना देगी जैसा कि कई मुस्लिम-देशों में हो चुका है.

विदेशी कर्जे का भयानक-बोझ बढ़ेगा.

पड़ोसियों से दोस्ताना रिश्तों का अभाव और युद्ध की आशंका रहेगी.

आतंरिक विरोध और धार्मिक-संघर्ष होंगे.

पकिस्तान के नव-दौलतियों और उद्द्योगपतियों द्वारा राष्ट्रीय-संसाधनों की लूट होगी.

अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों द्वारा पकिस्तान को कंट्रोल करने की साजिशें की जाएंगी. दो हफ्तों तक शोरिश काश्मीरी से लगातार बात करते हुए, मौलाना आज़ाद ने विभाजन से एक साल पहले, जैसा पकिस्तान दिखा दिया, वो हमें ये सोचने पर मजबूर करता है कि अगर हालात का तटस्था के साथ जायजा लिया जाए तो भविष्य में होने वाले परिवर्तनों का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है. मौलाना ने तो पकिस्तान का ख्वाब देखने से पहले ही उसकी ताबीर (स्वप्नफल) बता दी थी, जो सौ फीसद सच निकली.

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