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भारत के कड़े रुख के बाद खालिस्तान रैली से अलग हुआ ब्रिटेन

भारत ने ब्रिटिश सरकार को यह चेतावनी दी थी कि वो इस समूह को रैली आयोजित करने की अनुमति देने से पहले दोनों देशों के बीच के द्विपक्षीय संबंध के बारे में सोचे

Updated On: Aug 19, 2018 01:48 PM IST

Bhasha

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भारत के कड़े रुख के बाद खालिस्तान रैली से अलग हुआ ब्रिटेन

ब्रिटेन की सरकार ने लंदन के ट्राफ्लगार स्क्वायर में सिख अलगाववादी समूह के खालिस्तान के समर्थन में आयोजित की गई रैली से खुद को अलग कर लिया है.

सिख फॉर जस्टिस समूह ने 12 अगस्त को ‘लंदन डिक्लरेशन ऑन रेफ्ररेंडम 2020 रैली' यानी '2020 में खालिस्तान देश बनाने के लिए जनमतसंग्रह रैली'  आयोजित की थी.

इसे लेकर भारत और ब्रिटेन के बीच राजनयिक गतिरोध पैदा हो गया था. क्योंकि भारत ने ब्रिटेन को चेतावनी दी थी कि इस समूह को रैली आयोजित करने की अनुमति देने से पहले वो दोनों देशों के बीच के द्विपक्षीय संबंध के बारे में सोचे. भारत का कहना था कि यह रैली ‘हिंसा, अलगाववाद और हिंसा’ का प्रचार करती है.

ब्रिटेन सरकार के एक सूत्र ने बताया, 'हालांकि हमने रैली को आयोजित करने की मंजूरी दी लेकिन इसे इस तरह से नहीं देखा जाना चाहिए कि हम इसके समर्थन या विरोध में हैं. हम इस बात को लेकर स्पष्ट हैं कि यह भारत के लोगों और भारत सरकार का प्रश्न है.'

ब्रिटेन सरकार का यह बयान सिख फॉर जस्टिस समूह और ब्रिटेन के विदेश और राष्ट्रमंडल कार्यालय (एफसीओ) के बीच हुए पत्रों के आदान-प्रदान की खबर के बाद आया है. बताया जा रहा है कि यह पत्र ‘सिख आत्मनिर्भरता के लिए अभियान’ के बारे में लिखा गया था.

भारत और ब्रिटेन के बीच क्यों शुरू हो गए थे गतिरोध?

सिख फॉर जस्टिस समूह ने ब्रिटेन सरकार के प्रतिनिधियों के साथ एक छोटी बैठक की अपील की थी, जिसमें वो सिख समुदाय के मुद्दे उठाने वाले थे. लेकिन एफसीओ ने इस बैठक से इनकार कर दिया था.

17 अगस्त को एक अज्ञात पत्र मिला जिसमें ‘डेस्क ऑफिसर फॉर इंडिया' लिखा हुआ था. इसमें कहा गया कि ब्रिटेन को अपने देश में पुराने समय से चल रही इस परंपरा पर गर्व है कि लोग स्वतंत्रतापूर्वक जमा हो सकते हैं और अपने विचारों का प्रदर्शन कर सकते हैं.

पत्र में यह भी कहा गया है, 'ब्रिटेन सरकार अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हुई घटनाओं के साथ ही 1984 में हुए घटनाक्रम के संबंध में सिख समुदाय की भावनाओं से भली-भांति परिचित है. हम सभी पक्षों को यह सुनिश्चित करने को कहते हैं कि उनका घरेलू कानून अतंरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप हों.'

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