S M L

ओबामा की जरूरत सिर्फ अमेरिका को नहीं पूरी दुनिया को है

यह दुखद है कि ओबामा हमारे साथ अगले चार साल नहीं रह सकते.

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Jan 13, 2017 08:57 PM IST

0
ओबामा की जरूरत सिर्फ अमेरिका को नहीं पूरी दुनिया को है

मंगलवार रात को जैसे ही राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपना विदाई भाषण शुरू किया, शिकागो में उन्हें आखिरी बार राष्ट्रपति के तौर पर सुनने के लिए जमा हुई भीड़ ने एक साथ हुंकार भरी, ‘चार साल और.’

जिसके जवाब में ओबामा ने कहा, ‘मैं ऐसा नहीं कर सकता.’

आठ साल पहले ‘यस वी कैन’ के ऐतिहासिक नारे के साथ चुनावी कैंपेन की शुरुआत कर राजनीतिक परिदृश्य में उभरे ओबामा से जितनी उम्मीद उस वक्त दुनिया ने की थी, उससे कहीं ज्यादा उम्मीद दुनिया को आज उनसे है.

दुनिया को ओबामा के नैतिक और राजनीतिक नेतृत्व की पहले के मुकाबले आज कहीं ज्यादा जरूरत है.

यहां तक कि भारत को भी उनकी जरूरत है और अपनी विदाई भाषण के दौरान ऐसा लगा कि ओबामा सच में इंडिया से बात कर रहे हैं, यहां के लोगों से बात कर रहे हैं और हमें याद दिला रहे हैं कि, कैसे हम उनके नेतृत्व को याद करेंगे.

ओबामा की विरासत को खत्म करने का दौर शुरू

यह बेहद दुखद है कि हम दुनिया या अमेरिका में ओबामा के शासनकाल के कुछ और साल नहीं पा सकते.

ये भी साफ-तौर पर दिखने लगा है कि ओबामा की विरासत को एक तरह से खत्म करने का दौर शुरू होने जा रहा है. उनके आदर्शों को खत्म किया जाने की कवायद शुरु हो चुकी है.

Barack Obama

अपने अंतिम भाषण में ओबामा ने पूरी अमेरिका के लोगों का धन्यवाद कहा

पिछले कुछ दशकों में, दुनिया ने कई राजनेता और राष्ट्रपति देखे हैं. ऐसे तानाशाह, अत्याचारी, युद्ध भड़काने वाले शासक हुए हैं जिनका एकमात्र मकसद अपनी सत्ता को बचाए रखना और ज्यादा से ज्यादा ताकत हासिल करना रहा है.

अपने लक्ष्य को पाने के लिए इन लोगों ने युद्ध और आक्रमणों का सहारा लिया, लोगों के मन में डर पैदा किया, तानाशाही लागू की और उस लोकतंत्र और समाज की नींव हिला दी जिसने उन्हें चुना था या उन्हें सत्ता तक आने में मदद दी थी.

लेकिन, ओबामा - महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला से बिलकुल अलग हैं. उन्होंने अपनी नैतिक ताकत से लोगों की अगुवाई की. दुनिया उनके मानवीय आदर्शों, शांति के संदेश, सदभाव, बराबरी और प्यार के भावनाओं की कायल है.

ओबामा ने उम्मीद का एक ऐसा आंदोलन शुरू किया जिसमें मानवीयता के लिए उच्च आदर्शों की बात की गई थी.

नैतिक ताकत से दुनिया को दिया संदेश

ऐसे दौर में जब राजनीति का मतलब ही जब तोड़ो और राज करो की नीति पर चल रही है तब बराक ओबामा वैश्विक भाईचारे के एक प्रतीक के तौर पर उभरे. उन्होंने अपने कैंपेन में गोरे, काले, हिस्पैनिक, ईसाई, मुस्लिम, इंडियंस, उत्तर और दक्षिण के अलावा ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के साथ-साथ बेरोजगारों को एक साथ जोड़ा.

आज के दौर में है ओबामा की ज्यादा जरूरत

अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप का उभार हकीकत में पूरी दुनिया में अति-दक्षिणपंथ का उभार है. बाहरी लोगों या विदेशियों को पसंद न करना, आक्रामक राष्ट्रवाद, कट्टरपंथ और हर तरफ डर का माहौल बना हुआ है. ये सब कुछ हमें ये सोचने पर मजबूर करता है कि क्या ओबामा दुनिया को और ज्यादा उदार, समावेशी और आशावादी बनाने की अपनी मुहिम में नाकाम हो गए. और क्या यही निराशा उनकी स्पीच में दिखाई दी.

ओबामा के बाद रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के नए राष्ट्रपति बनेंगे

ओबामा के बाद रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के नए राष्ट्रपति बनेंगे

लेकिन, ओबामा मानवीयता के हर मूल आदर्श का प्रतिनिधित्व करते रहे.

आज भले ही न हो, पर एक दिन पूरी दुनिया उन्हें हमारे भीतर की अच्छाई के प्रतीक के रूप में याद करेगी. एक ऐसा व्यक्ति जिसने आम लोगों के हितों के लिए संघर्ष किया. एक ऐसा नेता जो साधारण चीजों के लिए प्रयासरत नहीं था बल्कि वो हर इंसान के भीतर के सबसे अच्छे और शानदार गुणों की कोशिश करते थे.

एक विनम्र नेता

उनका विदाई भाषण उनकी विरासत को मजबूती से दर्शाता है. विनम्रता जो राजनेताओं में बहुत कम पाया जाता है और भावनात्मकता के मिश्रण से उन्होंने अपने इर्द-गिर्द हरेक की आंखें नम कर दीं. ओबामा ने  एक बार फिर से अपने नेतृत्व की विचारधारा की याद लोगों की दिलायी.

ओबामा की पहचान पिछले 8 सालों में एक विनम्र नेता की बनी है

ओबामा की पहचान पिछले 8 सालों में एक विनम्र नेता की बनी है

ओबामा ने आज के दौर के खतरे के बारे में हमें चेताया. उन्होंने कहा, ‘यह दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर ने हम सबको एक बराबर पैदा किया है, हमें एक जैसे अधिकार मिले हैं. हम सबको जीवन, आजादी और खुशियों की ओर बढ़ने का अधिकार है.’

ओबामा के ये शब्द उनके आदर्शों को व्यक्त करते हैं. ये ट्रंप समेत उन सभी लोगों को यह याद दिलाता है कि रंग, धर्म और राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव को आगे बढ़ाना ठीक नहीं है.

दुनियाभर का प्यार और सम्मान मिला

ऐसे नेता कम ही हुए हैं जिन्हें वैश्विक नेता के तौर पर सम्मान और प्यार मिला हो. जिसे दुनियाभर में उम्मीद की किरण के तौर पर देखा गया हो. यहां तक कि महानतम राष्ट्रपतियों- मिसाल के तौर पर, रोनाल्ड रीगन भी कुछ दीवारों को लांघने में नाकाम रहे. आखिर में उन्हें अपने देश, अपनी पार्टी या फिर बहुत ज्यादा हुआ तो दुनिया के एक छोटे से हिस्से के ही नेता के तौर पर याद किया गया.

ओबामा यह करने में इसलिए सफल रहे क्योंकि उनका संदेश भौगोलिक दीवारों, धर्मों और भाषायी अवरोधों को तोड़ने में सफल रहा. उन्होंने दुनिया से ऐसे बात की जैसे वह हर नागरिक से बात कर रहे हों. उन्होंने अपने चिंताओं में सभी के डर और सपनों की बात की और सबकी खुशहाली की कामना भी.

उनके भाषण की कई बातें तो भारत पर भी लागू हो सकती हैं. उन्होंने कट्टरपंथ का विरोध किया, लोकतांत्रिक संस्थानों की मजबूती की बात की और बहस की अहमियत पर ध्यान दिया.

ओबामा की राजनीति हमेशा हर किसी को बराबरी का दर्जा देने की रही

ओबामा की राजनीति हमेशा हर किसी को बराबरी का दर्जा देने की रही

उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र विचारों का टकराव है न कि कुछ चुनिंदा लोगों और उनके विचारों का एकाधिकार. उन्होंने खुलकर किए जाने वाले पक्षपात के खिलाफ लोगों को चेताया. उन्होंने मीडिया को हरेक की आवाज उठाने का माध्यम बताया और कहा कि मीडिया के उपर किसी ताकतवर को हावी नहीं होने दिया जाना चाहिए. क्योंकि जो सही है या जो सच है उसपर कोई और हावी नहीं हो सकता. ये चीजें जितनी अमेरिका के लिए प्रासंगिक हैं उतनी ही अहमियत इनकी भारत के लिए भी है.

भारत के लिए संदेश

क्या भारत ने उन्हें सुन रहा था जब उन्होंने राष्ट्रभक्ति पर मालिकाना हक जताने वालों की खिंचाई की. उन्होंने इस तथ्य की ओर इशारा किया कि उनका देश जितना एक व्यक्ति का है उतना ही दूसरे का भी. वो हर शख्स को बराबरी का अधिकार देता है फिर चाहे वह प्रवासी हो या मुस्लिम- जिन्होंने भी इस देश को अपना माना है, संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और कड़ी मेहनत से देश को मजबूत किया है.

ओबामा ने कहा, ‘हम जहां भी हैं, हमें कड़ी मेहनत करनी होगी. हमारा हर साथी नागरिक इस देश से उतना ही प्यार करता है जितना हम करते हैं. वे भी कड़ी मेहनत और परिवार का उतना ही सम्मान करते हैं जितना हम करते हैं. उनके बच्चों में भी वही उत्सुकता और उम्मीद है जो हमारे बच्चों में है. उनके बच्चे भी उसी प्यार के भागीदार हैं जिसके हमारे बच्चे.’

ओबामा ने बताया कि कैसे तर्क और साहस में भरोसा और शक्ति के ऊपर अधिकारों की महत्ता पर भरोसे ने फासिज्म और अत्याचार पर ग्रेट डिप्रेशन के दौरान विजय पाई और दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों के साथ विश्व व्यवस्था तैयार की. यह व्यवस्था केवल सैन्य ताकत या राष्ट्रीय गठजोड़ों पर टिकी हुई नहीं थी, बल्कि यह कानून के शासन, मानवीय अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, भाषण, एकजुट होने और स्वतंत्र प्रेस पर टिकी हुई थी.

अतिवाद का खतरा, अधिकारों को कुचलने की कोशिश

उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को अब चुनौती दी जा रही है. पहले इस्लाम के नाम पर धर्मांध हिंसक लोग इसे चुनौती दे रहे हैं. हाल-फिलहाल में कई देशों में सत्ता में बैठे हुए तानाशाह तो मुक्त बाजारों, लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिक समाज को अपनी ताकत के खिलाफ खतरे के तौर पर देखते हैं.

ओबामा ने कट्टरपंथ और अतिवादिता का विरोध किया

ओबामा ने कट्टरपंथ और अतिवादिता का अंतरराष्ट्रीय मंच पर विरोध किया

इनके द्वारा पैदा किया जाने वाला खतरा किसी कार बम या दूर तक जाने वाली मिसाइल के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़ा है. यह बदलाव के डर को दिखाता है. यह अलग राय रखने वाले, अलग दिखने वाले या फिर अलग तरह से पूजा करने वालों की मौजूदगी से होने वाले डर को दिखाता है. कानून का शासन जो नेताओं की जवाबदेही तय करता है उसके प्रति घृणा या अवहेलना की भावना रखना. असहमति, विरोध और स्वतंत्र विचारों के प्रति असहिष्णु होना.

एक तरह की आस्था कि जो लोग हाथ में तलवार, बंदूक या बम उठाए हुए हैं या प्रोपेगैंडा मशीनरी चला रहे हैं वे ही सच और सही तय करने वाले अंतिम न्यायाधीश हैं.

यह संदेश हर भारतीय को गौर से समझना चाहिए. इसे याद रखना चाहिए. यह दुखद है कि ओबामा हमारे साथ अगले चार साल नहीं रह सकते.

निश्चित तौर पर कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें खुद ओबामा भी नहीं कर सकते हैं.

 

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
DRONACHARYA: योगेश्वर दत्त से सीखिए फितले दांव

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi