विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद कितनी बदलेगी अंतरराष्ट्रीय राजनीति की तस्वीर?

अमेरिका के पीछे हटने के बाद चीन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना रोल बढ़ाने के नए मौके खुल गए हैं

SL Narasimhan Updated On: Feb 03, 2017 05:16 PM IST

0
डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद कितनी बदलेगी अंतरराष्ट्रीय राजनीति की तस्वीर?

दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोपीय देशों की मदद के लिए 'मार्शल प्लान' तैयार किया था. इसका आधिकारिक नाम 'यूरोप रिकवरी प्लान' था. इस योजना को अमेरिकी जनरल जॉर्ज सी मार्शल ने तैयार किया था. इसीलिए इसे 'मार्शल प्लान' के नाम से ज्यादा जाना गया.

जॉर्ज मार्शल बाद में अमेरिका के विदेश मंत्री भी बने. उनकी बनाई योजना के तहत अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध से तबाह हुए यूरोपीय देशों को 1948 से 1951 के बीच 13 अरब डॉलर की मदद दी.

इसका मकसद यूरोपीय देशों को सोवियत संघ के पाले में जाने से रोकना था. इसी के साथ शीत युद्ध की शुरुआत हो गई थी. शीत युद्ध 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ खत्म हुआ.

मगर शीत युद्ध के कुछ हिस्से 1991 के बाद भी जारी रहे. जैसे जापान के ओकिनावा, उज्बेकिस्तान के खानाबाद, किर्गिजिस्तान के मनास, कोरिया, गुआम और फिलीपींस के सुबिक-बे में अमेरिकी सैनिक अड्डे इस बात की मिसाल थे.

इनकी मदद से अमेरिका ने रूस और चीन की बढ़ती ताकत पर लगाम लगाने की कोशिश जारी रखी. पिछले एक दशक की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि दूसरा शीत युद्ध शुरू होने को है.

इसे भी पढ़ें: ट्रंप के नक्शेकदम पर कुवैत

सोवियत संघ के पूर्व सदस्यों जॉर्जिया में 2003 में गुलाबी क्रांति, यूक्रेन में 2004 में ऑरेंज क्रांति, 2005 में किर्गीजिस्तान में ट्यूलिप रिवोल्यूशन और लेबनान में सेडार रिवोल्यूशन हुई.

चीन और रूस हमेशा से ये चाहते रहे हैं कि उनके आस-पास के इलाकों से अमेरिकी सेनाएं अपने ठिकाने खत्म करें. रूस में बहुत से लोग कहते हैं कि सोवियत ब्लॉक के देशों में कलर रिवॉल्यूशन के पीछे अमेरिका का हाथ था.

Malcom Turnbull

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ऑस्ट्रेलिया के पीएम मैल्कम टर्नबुल से मुलाकात करते हुए

इसमे कई गैर सरकारी संगठनों की मदद से चुनी हुई सरकारों के खिलाफ जनता को बगावत के लिए उकसाया गया. कुछ जानकार कहते हैं कि चीन को अमेरिका की नीयत पर शक है.

चीन को लगता है कि अमेरिका उसके आस-पास के देशों में सेना तैनात कर के उसकी बढ़ती ताकत पर अंकुश लगाना चाहता है. कुछ जानकार ये भी मानते हैं कि मध्य एशियाई देशों में सैनिक अड्डों के जरिए अमेरिका, रूस पर भी लगाम लगाने की कोशिश कर रहा है.

स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स

अमेरिका की एक वित्तीय रिसर्च फर्म, बूज एलेन हैमिल्टन ने 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नाम का ईजाद किया. 2004 में बूज एलेन हैमिल्टन ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि... किस तरह चीन, डॉलर डिप्लोमेसी के जरिए भारत के इर्द गिर्द अपना दखल और असर बढ़ा रहा है.

इसे ही कंपनी ने 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नाम दिया. हालांकि, भारत सरकार इस थ्योरी को बहुत गंभीरता से नहीं लेती लेकिन हम भारत के पड़ोसी देशों में चीन की बढ़ती दिलचस्पी से इस थ्योरी की सच्चाई खुद देख-समझ सकते हैं.

आमतौर पर ये माना जाता है कि, पश्चिमी देश रूस और चीन की ताकत को एक दायरे में बांधकर रखना चाहते हैं. ऊपर के नक्शे के जरिए हम देख सकते हैं कि किस तरह नैटो का विस्तार कर के रूस की ताकत पर लगाम लगाने की कोशिश की जा रही है.

रूस, पश्चिमी देशों के इस कदम का जवाब यूक्रेन और जॉर्जिया जैसे देशों में दखलंदाजी से दे रहा है. रूस ने 90 के दशक में बंद हो चुकी आर्कटिक इलाकों की गश्त भी फिर से शुरू कर दी है. 2013 से रूस, पश्चिमी देशों की सीमाओं के पास रणनीतिक अभ्यास भी कर रहा है. इस साल का रूस का फौजी अभ्यास जपाड 2017 पश्चिमी रूस में होगा.

जनवरी 2017 की बात करें तो नैटो सेनाएं 14 जनवरी 2017 को पोलैंड में तैनात हो चुकी हैं और 16 जनवरी 2017 को नॉर्वे तक पहुंच गईं. ये नैटो की उस योजना का हिस्सा हैं जिसके तहत 3500 सैनिकों की तैनाती नैटो के पूर्वी इलाके के सदस्य देशों में की जानी है.

Xi jinping

पोलैंड में 2700 और नॉर्वे में 800 सैनिक तैनात किए गए हैं. इससे रूस की फिक्र बढ़ गई है.

जैसे-जैसे चीन की कॉम्प्रिहेंसिव नेशनल पावर यानी आर्थिक और सामरिक ताकत बढ़ रही है. वैसे-वैसे साफ हो रहा है कि आगे चलकर अमेरिका को चीन का मुकाबला भी करना होगा. भले ही ये जंग के मैदान में हो या सोवियत संघ की तरह शीत युद्ध के जरिए.

चीन-अमेरिका रिश्ता

चीन और अमेरिका के संबंध 1972 में हेनरी किसिंजर की चीन यात्रा से बेहतर होने शुरू हुए थे. इसमें पाकिस्तान ने अमेरिका की मदद की थी. मगर 1979 में ही ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के रिश्ते में कड़वाहट आ गई थी.

साफ था कि अमेरिका को चीन पर भरोसा नहीं. हालांकि ये शीत युद्ध के दौर की बात थी. मगर तब से ही अमेरिका ने चीन पर लगाम लगाने की नीति पर काम करना शुरू कर दिया है.

मध्य एशियाई देशों में फौज की तैनाती के साथ-साथ अमेरिका चीन के पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते सुधारने पर भी जोर दे रहा है. जैसे कि अमेरिका, चीन और रूस के बीच में बसे मंगोलिया से बेहतर रिश्तों के लिए जोर लगा रहा है. चीन को अमेरिका की ये चाल अपने खिलाफ लगती है.

इसे भी पढ़ें: सीआईए ने ऑनलाइन जारी किया खुफिया दस्तावेज

इसी तरह अमेरिका ने दक्षिण कोरिया में टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस यानी THAAD को तैनात करने का प्रस्ताव रखा है. चीन ने इसका कड़ा विरोध किया है. चीन, उत्तर कोरिया से बेहतर रिश्तों के जरिए उत्तर और दक्षिण कोरिया की ताकत के बीच तालमेल बैठाने का काम करता रहा है. उसे लगता है कि THAAD की तैनाती से दक्षिण कोरिया की ताकत बढ़ जाएगी.

इसी तरह चीन पूर्व और दक्षिणी चीन सागर को लेकर बेहद संवेदनशील है. जमीनी ताकत के मामले में तो चीन को ज्यादा फिक्र नहीं. मगर पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर में विदेशी ताकतों का दखल उसे परेशान कर देता है.

गुआम में अमेरिका का सैन्य अड्डा उस इलाके में है जिस पर चीन अपना दावा ठोंकता रहा है. हाल ही में चीन ने DF 26 मिसाइल का परीक्षण किया है.

Pakistan Missile

चीन के मीडिया ने कहा कि इससे गुआम का अमेरिकी अड्डा अमेरिकी मिसाइल की रेंज में आ गया है. साफ है कि गुआम के अमेरिकी अड्डे को लेकर चीन नई रणनीति बना रहा है.

12 जुलाई 2016 को पर्मानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिटरेशन ने दक्षिणी चीन सागर के मामले में फिलीपींस के हक में फैसला सुनाया. हेग स्थित पंचायत के फैसले पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और कहा कि वो इसे नहीं मानेगा.

हालांकि, अमेरिका  और दक्षिणी चीन सागर से जुड़े दूसरे देशों ने संभली हुई प्रतिक्रिया दी. मगर जापान ने चीन को हेग की अदालत का फैसला मानने की सलाह दी. फैसला आने के तुरंत बाद, चीन ने फिलीपींस को इस बात के लिए राजी कर लिया कि दोनों देश मिलकर इस विवाद को सुलझाएंगे.

फिलीपींस के राष्ट्रपति दुतेर्ते के अमेरिका विरोधी रुख से भी चीन को ऐसा करने में मदद मिली. चीन और अमेरिका की नूरा कुश्ती में वियतनाम भी एक मोहरा है. वियतनाम युद्ध के बाद वहां से अपनी सेनाएं हटाने के करीब दो दशक बाद 1995 में अमेरिका ने वियतनाम से फिर से रिश्ते जोड़े थे.

तब से अमेरिका और वियतनाम के रिश्ते बेहतर हो रहे हैं. चीन भी वियतनाम से अपने रिश्ते सुधारने में लगा है. इसी महीने वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता नग्यूयेन-फू-ट्रॉन्ग ने चीन का दौरा किया था.

तब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वियतनाम को कॉमरेड और दोस्त करार दिया था. हालांकि, चीन और वियतनाम दोनों ही दक्षिणी चीन सागर पर अपना-अपना दावा ठोंकते हैं. इस मुद्दे पर दोनों देशों में जबरदस्त तनातनी हो चुकी है.

फिर भी चीन, वियतनाम से बेहतर रिश्तों की कोशिश कर रहा है.

म्यांमर में आमने-सामने

म्यांमार में अमेरिका और चीन आमने-सामने दिखते हैं. नेपाल में माओवादी संघर्ष के दौरान वहां भी अमेरिका लगातार सक्रिय रहा है. भारत और अमेरिका के दिनों-दिन बेहतर होते रिश्तों को भी चीन शक की नजर से देखता है.

पाकिस्तान में भी चीन और अमेरिका अपना प्रभाव बढ़ाने में जुटे हुए हैं. इसी तरह अफगानिस्तान में भी चीन और अमेरिका अपनी-अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं.

साफ है कि दुनिया में दूसरे शीत युद्ध की भूमिका पूरी तरह से तैयार है.

शीत युद्ध की कहानी यहीं खत्म नहीं होती. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में अनिश्चितता का माहौल है. अमेरिका ने ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप से अपना हाथ खींच लिया है. अब इस इलाके में चीन को अपना असर बढ़ाने की खुली छूट है.

cold war

 

चीन को लेकर ट्रंप की नीतियां, उनकी ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन से फोन पर बातचीत और दक्षिणी चीन सागर पर ट्रंप सरकार की नीति सब मिलाकर चीन और अमेरिका के बीच तनातनी बढ़ने के ही संकेत दे रहे हैं.

वहीं, ट्रंप सरकार, रूस से रिश्ते सुधारने की हामी दिखती है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने बताया है कि, राष्ट्रपति ट्रंप जल्द ही संयुक्त राष्ट्र को अमेरिकी मदद घटाने का आदेश जारी करने वाले हैं. साथ ही वो कई और ऐसे समझौतों की समीक्षा करेंगे जिनमें अमेरिका साझीदार है.

शीत युद्ध और शीत युद्ध 2.0 का मुख्य किरदार अमेरिका ही है. तो क्या शीत युद्ध 3.0 में मुख्य रोल चीन का होगा?

ये देखना दिलचस्प होगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो जगह अमेरिका खाली कर रहा है वो रोल निभाने के लिए चीन तैयार है.

कई समझौतों से अमेरिका के पीछे हटने के बाद चीन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना रोल बढ़ाने के नए मौके खुल गए हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi