S M L

यूएन में सुषमा स्वराज का पाकिस्तान को नजरअंदाज करना बेहतर होता

यूएन जैसे मंचों पर हमें पाकिस्तान को बराबरी पर नहीं लाना चाहिए

Bikram Vohra Updated On: Sep 25, 2017 12:34 PM IST

0
यूएन में सुषमा स्वराज का पाकिस्तान को नजरअंदाज करना बेहतर होता

अगर आपको संयुक्त राष्ट्र की महासभा को संबोधित करने का अवसर मिलता है, आप ये सुनिश्चित कर लें कि खुद को विश्वमंच पर एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर पोजिशन लेते हुए आप दांव खेलने जा रहे हैं. आप ऐसा कर सकते हैं अपने आवेग को थाम कर कि वह उसी पुराने तत्वों के साथ आगे बढ़ने के लिए जोर न लगाएं और यह आपकी विदेश नीति को आदत की वजह से संकुचित ना कर दे.

जब कभी भी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज बोलती और करती हैं तो हम उन्हें सर्वश्रेष्ठ देखने के आदी हो गए हैं. अक्सर वैसा ही होता है, लेकिन इस बार उनको मिल रहीं तालियां तर्कसंगत नहीं रहीं, क्योंकि विज़न की कमी दिखी. इस वजह से यह बड़ा मौका पाकिस्तान केन्द्रित होकर बर्बाद हो गया.

भाषण का सबसे उद्धृत करने वाला हिस्सा अपने भद्दे पड़ोसी के बारे में है. खेद की बात ये है कि हमारी विदेश नीति हमेशा निकट की चीजें देख पाती हैं और हम लगातार पाकिस्तान के लिए ऐसा मंच तैयार कर देते हैं कि वह और बुरे तरीके से जवाबी हमला करता है.

यद्यपि संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी प्रतिनिधि महिला लोधी ने मूर्खतापूर्ण तब गड़बड़ी कर दी, जब उसने युवा रॉया अबू जोमा की गाज़ा में 2012 में ली गयी तस्वीर को भुनाने का प्रयास किया और उसे इस रूप में बतौर प्रमाण रखने की कोशिश की कि भारतीय सैनिक जम्मू और कश्मीर में नागरिकों पर पैलेट फायरिंग कर रहे हैं. ये शर्मनाक गलती भी एक बड़ी वजह है ये बताने के लिए कि हमारे स्टान्स या मुद्रा अथवा हावभाव के केन्द्र में पाकिस्तान को क्यों नहीं आना चाहिए.

एक ही प्लेटफॉर्म पर अपमानों का आदान-प्रदान करके हमने पाकिस्तान को अपने आप से भी आकार, ताकत और ओहदे में बड़ा बना दिया और इसे बराबरी की लड़ाई में बदल दिया. भारत की अपने लिए मार्केटिंग करते हुए यह आंतरिक दोष रह गया है जो 70 साल से जिन्दा है और अब भी हम इससे छुटकारा नहीं पा सकते.

हम ईमानदार होकर सोचें तो पाकिस्तान हमारे खेमे में नहीं है और न कभी होगा. फिर क्यों इसे वैधता दी जाए? कयों नहीं हम इन्हें हमारी विदेश नीति की किताब में एक-दो पन्नों तक समेट दें और आगे की ओर और ऊपर की ओर बढ़ें?

हम यह भी तय करें कि हमें विश्व निकाय में गए बिना पाकिस्तान को अपनी पिच पर कब और कैसे हैंडल करना है. हमें किसी को स्पष्टीकरण देने की भी जरूरत नहीं.

दरअसल होता ये है कि हमें शब्दों के इस युद्ध में एक प्रकार की सांत्वना मिलती है. सुषमा को उनके पक्ष से सलामी मिल रही है क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान को ‘टेररिस्तान’ का तमगा दिया है. यह बस शब्दों का लोकप्रिय खेल है. उन्होंने आगे कहा कि जबकि भारत आईआईटी, आईआईएम और डॉक्टर बना रहे हैं, पाकिस्तान लश्कर-ए-तोएबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिज्बुल मुजाहिदीन, हक्कानी नेटवर्क बना रहा है. लोदी ने भारत को आतंकवाद की माता कहकर मूर्खतापूर्ण हमला बोला जिसे किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया.

एक मौका कम हो गया जब हम खुद को बहुत बड़े रूप में पेश कर सकते थे. यह मौका ‘तू-तू मैं-मैं’ में बदल गया.

शायद महासभा के 72वें सत्र में स्वराज को बड़े मुद्दों जैसे क्लाइमेट चेंज, मैरीटाइम सिक्योरिटी, बेरोजगारी, महिला सशक्तिकरण, परमाणु प्रसार, और साइबर सिक्योरिटी पर ध्यान देना चाहिए था. उन्हें पाकिस्तान को इसके बीच मिक्स नहीं करना चाहिए था. इसके बजाए अवमानना का इस्तेमाल करना चाहिए था. कारण यही है कि इस देश पर फोकस करना ठीक नहीं है. इससे कोई लाभ नहीं होता. कुछ बदलता नहीं है.

भारत को अपनी सेवाएं उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच एक मध्यस्थ के रूप में रखना चाहिए था. 65 मिलियन विस्थापितों को दोबारा बसाने के सवाल पर लीड लेते. यह संख्या इस साल के अंत तक और बढ़ने वाली है. गरीबी पर चर्चा होती और बीमारियों व बेरोजगारी पर और वैश्विक आतंकवाद पर भी आते बिना पाकिस्तान का नाम लिए, तो यह नई शुरूआत होती. कई बार दुश्मन को नजरअंदाज करके आप बहुत ज्यादा कूटनीतिक प्वाइन्ट पा लेते हैं.

हमें ऐसे अवसरों का इस्तेमाल करना सीखना होगा ताकि बड़ी तस्वीर दबी न रह जाए. बाकी सभी दूसरे मुद्दे जिनमें यूएन से रिफॉर्म की अपील तक शामिल हैं, और अधिक सटीक होते अगर पाकिस्तान मुद्दे का ग्रहण नहीं लगा होता.

जिस तरीके से इस घटना की रिपोर्ट हुई, ऐसा लगा कि स्कूल परिसर में ब्रेक के दौरान दो बिगड़ैल लड़ रहे हैं और कोई बस यह उम्मीद ही कर सकता है कि उस स्कूल से भारत ने बहुत समय पहले ही ग्रैजुएशन कर लिया है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
SACRED GAMES: Anurag Kashyap और Nawazuddin Siddiqui से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi