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भारत से संबंध मजबूत कर चीन के वर्चस्व को तोड़ना चाहता है मंगोलिया

मंगोलिया अपने नए राष्ट्रपति बटुलगा खाल्तमा की अगुवाई में बाकी मित्र देशों से अपने संबंध और मजबूत करने को लेकर उत्सुक है, ताकि वर्चस्व वाले अपने पड़ोसी चीन के मुकाबले संतुलन बना सके

shubha singh Updated On: Apr 24, 2018 10:41 AM IST

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भारत से संबंध मजबूत कर चीन के वर्चस्व को तोड़ना चाहता है मंगोलिया

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 25-26 अप्रैल को मंगोलिया दौरे पर रहेंगी. उनकी इस यात्रा का मकसद उस सिलसिले को आगे बढ़ाना है, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2015 में इस मुल्क के दौरे के साथ हुई थी. यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की तरफ से इस उत्तरपूर्व एशियाई देश का पहला दौरा था.  स्वराज मंगोलिया के विदेश मंत्री डैमडिन सोगतबातर (Damdin Tsogtbaatar) के साथ मिलकर भारत-मंगोलिया की संयुक्त सलाहकार समिति के छठे दौर की बैठक की सह-अध्यक्षता करेंगी.

भारत और मंगोलिया ने 2015 में सामारिक साझेदारी के लिए संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए थे. उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी मंगोलिया यात्रा के दौरान इस मुल्क के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए 1 अरब डॉलर के कर्ज का ऐलान किया था. मंगोलिया इस कर्ज का इस्तेमाल अपनी पहली ऑयल रिफाइनरी बनाने में कर रहा है. दोनों देशों के मंत्रियों की मुलाकात में उन परियोजनाओं की समीक्षा की जाएगी, जिन पर काम चल रहा है.

पूर्व भारतीय राजदूत की याद में होने वाले कार्यक्रम में शामिल होंगी स्वराज

स्वराज मंगोलिया की राजधानी उलान बतोर में पूर्व भारतीय राजदूत की याद में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी. वह स्वर्गीय कुशोक बकुला की जन्म शताब्दी समारोह के मौके पर भाषण भी देंगी. कुशोक बकुला रिनपोछे का मंगोलिया में काफी सम्मान है. उन्हें भारत-मंगोलिया संबंधों को मजबूत करने का श्रेय जाता है. वह उलान बतोर में दस साल तक भारत के राजदूत रहे. इस दौरान उन्होंने लंबे समय तक कम्युनिस्ट शासन का हिस्सा रहे इस देश में बौद्ध परंपराओं को पुनर्जीवित करने में अहम भूमिका निभाई.

19वें रिनपोछे भारत के राजदूत के तौर पर गैर-परंपरागत लेकिन शानदार पसंद थे. वह लद्दाख के बड़े लामा, बौद्ध दर्शन के बड़े जानकार और लद्दाख के हितों के लिए काम करने कार्यकर्ता थे. कुशोक बकुला 1990 में उलान बतोर पहुंचे थे. उस वक्त मंगोलिया में सात दशकों के कम्युनिस्ट शासन के तुरंत बाद बहुदलीय प्रणाली वाले लोकतंत्र की स्थापना हुई थी और मंगोलियाई समाज नई आजादी (इसमें धार्मिक आजादी का मामला भी शामिल था) के हिसाब से खुद को तैयार कर रहा था.

मंगोलिया में फिर से धर्म में दिलचस्पी देखने को मिल रही थी, लेकिन वहां धार्मिक शिक्षकों की भारी कमी थी. मंगोलिया में लंबे समय तक चले कम्युनिस्ट शासन के दौरान धर्म के तमाम नामोनिशान को तकरीबन मिटाया जा चुका था, बौद्ध मठों को तोड़ दिया गया था, पुराने धार्मिक ग्रंथों को जला दिया था और बौद्ध भिक्षुओं को भगा दिया गया था.

मंगोलिया के लोग बौद्ध धर्म की महायान परंपरा का पालन करते हैं और लद्दाख में भी इस धारा का पालन होता है. कुशोक बकुला जब मंगोलिया पहुंचे, वह वह बौद्ध धर्म से जुड़े धार्मिक ग्रंथों को भी अपने साथ वहां ले गए और उन्होंने पेथब मठ बनाने में मदद की. उन्होंने युवा बौद्ध भिक्षुओं को प्रशिक्षण के लिए भारत स्थित सारनाथ भेजने का इंतजाम किया और बौद्ध धर्म से जुड़े भारत के विद्वानों को मंगोलिया आने का न्योता दिया. उन्होंने मंगोलिया का व्यापक दौरा किया, छोटे-छोटे समुदायों के बीच गए और वहां भाषण और प्रवचन दिया.

लद्दाख के बड़े लामा को मंगोलिया की आम जनता पूजती था और वह जहां भी जाते थे, उनके आर्शीवाद के लिए लोगों की भीड़ लग जाती थी. भारत के राजदूत के तौर पर उन्होंने दोनों देशों की सरकार के बीच संबंध बेहतर बनाने को लेकर काम किया. यहां तक कि भारत लौटने के बाद भी कुशोक बकुला ने पूरी जिंदगी मंगोलिया के साथ मजबूत संबंध बनाए रखा. 6 नवंबर 2003 को 87 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

उलान बतोर, लद्दाख और देश के अन्य हिस्सा में कुशोक बकुला का जन्म शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है. भारत और मंगोलिया के बीच बौद्ध धर्म से जुड़े रिश्ते कई सौ साल से हैं. 1978 में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि मंगोलिया ने भारतीय दर्शन, कविता, तर्क और खगोल शास्त्र से जुड़ी संस्कृत में उपलब्ध सामग्री, अनुवाद और पांडुलिपियां सुरक्षित रखी हैं, जिसे भारत ने सदियों पहले गंवा दिया था. इस वजह से मंगोलिया के लोगों के प्रति भारत के मन में काफी सम्मान है.

2015 में अपने मंगोलिया के दौरे पर पीएम मोदी. (फोटो- रॉयटर्स)

2015 में अपने मंगोलिया के दौरे पर पीएम मोदी. (फोटो- रॉयटर्स)

मंगोलिया से कूटनीतिक रिश्ते स्थापित करने वाला दूसरा मुल्क था भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2015 में मंगोलिया का ऐतिहासक दौरा हुआ. उसी साल भारत-मंगोलिया के कूटनीतिक रिश्तों की 60वीं वर्षगांठ भी थी. ऐसे में मोदी के मंगोलियाई दौरे से दोनों देशों के रिश्तों में एक और आयाम जुड़ गया. तकरीबन छह दशक पहले सोवियत संघ के अलावा भारत पहला ऐसा देश था, जिसने मंगोलिया के साथ कूटनीतिक रिश्ते स्थापित किए थे. इस घटनाक्रम के कुछ साल बाद भारत ने संयुक्त राष्ट्र में मंगोलिया की सदस्यता का समर्थन किया, जबकि चीन और ताइवान इसके खिलाफ थे.

दोनों देशों के बीच तमाम दूरी के बावजूद मंगोलिया की तरफ से भारत को 'तीसरे पड़ोसी' के अलावा 'आध्यात्मिक पड़ोसी' भी माना जाता है. मंगोलिया दो बड़े पड़ोसी देशों के बीच घिरा है. इसके तीन तरफ में चीन है, जबकि बाकी रूस के इलाके हैं. ऐसे में यह मुल्क दोनों पड़ोसियों के बीच संतुलन स्थापित करने में जुटा है और उसने उन देशों को अपना करीबी दोस्त बनाया है जिन्हें तीसरा पड़ोसी बताया जाता है.

दलाई लामा के दौरे पर काफी नाराज हो गया था चीन

मंगोलिया अपने नए राष्ट्रपति बटुलगा खाल्तमा की अगुवाई में बाकी मित्र देशों से अपने संबंध और मजबूत करने को लेकर उत्सुक है, ताकि वर्चस्व वाले अपने पड़ोसी चीन के मुकाबले संतुलन बना सके. चीन ने 2016 में मंगोलिया को जरूरी सामानों की सप्लाई पर रोक लगा दी थी. मंगोलिया द्वारा एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए दलाई लामा को बुलाए जाने के खिलाफ चीन ने यह कदम उठाया था. ऐसे में मंगोलियाई सरकार को चीन को यह आश्वासन देने पर मजबूर होना पड़ा कि वह आगे से तिब्बती नेता दलाई लामा के दौरे की इजाजत नहीं देगा. मंगोलिया के विदेशी व्यापार में चीन की हिस्सेदारी तकरीबन 70 फीसदी है.

मंगोलिया के पास बड़ी मात्रा में ऐसे संसाधन है, जिनका अब तक इस्तेमाल नहीं किया गया है. उसके पास खनिज का बड़ा भंडार है और मंगोलियाई सरकार खनन समेत अलग-अलग क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने को लेकर उत्सुक है. पिछले तीन साल में भारत-मंगोलिया के बीच रिश्तों में काफी प्रगति आई है. मंगोलिया भारत की 'पूरब पर फोकस' की नीति का हिस्सा है और दोनों देशों के बीच संबंध सामारिक साझेदारी से व्यापक साझेदारी की तरफ बढ़ चुके हैं.

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