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श्रीलंका: राजपक्षे ने अपनी पार्टी से 50 साल पुराना नाता तोड़ा, नई पार्टी के साथ जुड़े

राजपक्षे के इस कदम से कयास लगाए जा रहे हैं कि वो 5 जनवरी को होने वाले चुनावों में वो अपनी ही पार्टी से चुनाव लड़ेगे न कि श्रीसेना के श्रीलंका फ्रीडम पार्टी की तरफ से

Updated On: Nov 11, 2018 08:34 PM IST

FP Staff

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श्रीलंका: राजपक्षे ने अपनी पार्टी से 50 साल पुराना नाता तोड़ा, नई पार्टी के साथ जुड़े

महिंदा राजपक्षे ने एसएलएफपी पार्टी के साथ अपना पांच दिन पुराना गठबंधन खत्म करके नई बनी एसएलपीपी पार्टी का हाथ पकड़ लिया है. रविवार को महिंदा राजपक्षे को श्रीलंका का पीएम बनाया गया था. राजपक्षे के इस कदम से कयास लगाए जा रहे हैं कि वो 5 जनवरी को होने वाले चुनावों में वो अपनी ही पार्टी से चुनाव लड़ेगे न कि श्रीसेना के श्रीलंका फ्रीडम पार्टी की तरफ से.

श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति ने रविवार को अपने समर्थकों द्वारा लॉन्च की गई एसएलपीपी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की. 1951 में महिंदा राजपक्षे के पिता डॉन एल्विन राजपक्षे ने श्रीलंका फ्रीडम पार्टी की स्थापना की थी. राजनीति में राजपक्षे की फिर से वापसी के मकसद से पिछले साल एसएलपीपी की स्थापना उनके समर्थकों ने की थी. इस साल फरवरी में हुए स्थानीय चुनाव में पार्टी ने 340 सीटों में से दो तिहाई सीटें जीतीं.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 2005 से एक दशक तक श्रीलंका की सत्ता संभालने वाले राजपक्षे को 2015 के राष्ट्रपति चुनावों में श्रीसेना के हाथों अप्रत्याशित रुप से हार का सामना करना पड़ा था. श्रीसेना को विक्रमासिंघे की यूनाईटेड नेशनल पार्टी का समर्थन प्राप्त था. लेकिन समय बीतने के साथ श्रीसेना और विक्रमासिंघे के बीच मतभेद बढ़ने लगे. खासकर अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के मुद्दे पर दोनों ही दल एक दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए.

26 अक्टूबर से शुरु हुआ था राजनीतिक घमासान:

इसके बाद अंतत: 26 अक्टूबर को श्रीसेना ने विक्रमासिंघे को अपदस्थ कर राजपक्षे को पीएम पद सौंप दिया. जिसके बाद श्रीलंका में राजनीतिक और संवैधानिक संकट खड़ा हो गया. श्रीसेना ने 16 नवंबर तक संसद को भी स्थगित कर दिया था. हालांकि स्थानीय और विदेशी दबाव के कारण श्रीसेना को झुकना पड़ा और 14 नवंबर को उन्होंने फिर से संसद बहाल कर दी.

लेकिन जब यह साफ हो गया कि राजपक्षे को संसद में बहुमत नहीं मिल पाएगा तो उसके बाद श्रीसेना ने संसद भंग कर दिया और अगले साल 5 जनवरी को चुनावों की घोषणा कर दी. श्रीलंका की 225 सदस्यीय संसद में राजपक्षे को बहुमत साबित करने के लिए 113 सांसदों का वोट चाहिए था.

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