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क्या लंबे समय तक चलेगा श्रीलंका में राजनीतिक अस्थिरता का दौर?

संसद की बैठक कितनी जल्दी बुलाई जाएगी और कौन सी पार्टी सबसे ज्यादा नंबर पेश करने में सक्षम होगी, ये बातें काफी निर्णायक हैं. तब तक श्रीलंका में अस्थिरता का दौर जारी रहेगा.

Updated On: Oct 30, 2018 03:48 PM IST

Raisa Wickrematunge

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क्या लंबे समय तक चलेगा श्रीलंका में राजनीतिक अस्थिरता का दौर?
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श्रीलंका के राष्ट्रपति सिरिसेना ने कुछ दिन पहले एक रैली में पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त करने संबंधी वजहों के बारे में बताया था. उनका कहना था कि हत्या की साजिश के कारण इस तरह का फैसला लिया गया. अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' ने 16 अक्टूबर को खबर दी थी कि सिरिसेना ने साप्ताहिक कैबिनेट बैठक में इस साजिश में भारत के रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के शामिल होने के संकेत दिए थे. हालांकि, इसके बाद सरकार ने तुरंत इन खबरों को खारिज कर दिया और सिरिसेना ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन कर उन्हें अच्छे संबंधों को लेकर आश्वासन दिया. बहरहाल, 'द हिंदू' अखबार का दावा था कि उन्हें कई सूत्रों ने इस खबर की पुष्टि और जांच-पड़ताल की थी.

भारत को छोड़कर चीन को तवज्जो दे रही सरकार !

कैबिनेट की बैठक संबंधी गतिविधियों को लेकर मचा हड़कंप इस बात की तरफ इशारा करता है कि भौगोलिक-सामरिक लिहाज से बेहतर ठिकाने के कारण श्रीलंका किस तरह से बारीक संतुलन साधने में जुटा है. श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे के अपने शहर- हम्बनटोटा के दक्षिणी बंदरगाह में मौजूद हवाई अड्डे को खरीदने के लिए हाल में भारत ने बातचीत शुरू की थी. इसे 'दुनिया का सबसे खाली हवाई अड्डा' कहा जाता है. जहां भारत के नागरिक उड्ड्यन मंत्री ने इस संबंध में बातचीत के जारी रहने से इनकार किया है, वहीं श्रीलंका का कहना है कि इस दिशा में बातचीत आगे बढ़ रही है.

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग

चीन भी वन बेल्ट और वन रोड पहल के तहत वहां इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है. उसका निवेश हम्बनटोटा बंदरगाह में है और इस वजह से श्रीलंका की सरकार ने 99 साल की लीज पर चीन को यह बंदरगाह सौंप दिया है. इस मामले को कर्ज के जरिये शोषण के उदाहरण के रूप में पेश किया जा रहा है. हाल में अमेरिका ने भी श्रीलंका में कुछ दिलचस्पी दिखाई थी. इस तरह से यह संकेत दिया गया था कि वह नई हिंद-प्रशांत नीति में अहम खिलाड़ी होगा. इस नीति के तहत मुक्त और खुले व्यापार की बात है.

इस तरह की दिलचस्पी यानी सभी तीन पक्षों से व्यापार को प्रोत्साहन के जरिये श्रीलंका को फायदा होगा. कैबिनेट की बैठक के बाद यह संतुलन जोखिम में फंसता हुआ नजर आ रहा था.

चीन के राजदूत चेंग जुएयुआन ने शपथ ग्रहण के अवसर पर श्रीलंकाई दौरे में राजपक्षे और विक्रमसिंघे दोनों से मुलाकात की थी. चेंगजुएयुआन ने राजपक्षे की नियुक्ति पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तरफ से उन्हें बधाई दी थी. वह ऐसा करने वाले शुरुआती नेताओं में शामिल थे. हालांकि, चीनी राजदूत का यह कदम बिना किसी प्रेरणा के नहीं था. दरअसल, राजपक्षे ने श्रीलंका में फिलहाल चल रही चीन की फंडिंग वाली कई परियोजनाओं की शुरुआत की थी.

तमाम घटनाक्रम पर भारत की नजर, लेकिन ज्यादा बयानबाजी से परहेज

इस पूरे मामले में संक्षिप्त लेकिन सख्त शब्दों वाला बयान जारी करने से पहले भारत पूरी तरह चुप था, लेकिन इन तमाम राजनीतिक घटनाक्रमों पर उसकी नजर बनी हुई थी. साथ ही, भारत का कहना था कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान किया जाना चाहिए. अमेरिका के दक्षिणी और मध्य एशियाई मामलों के ब्यूरो ने सभी पार्टियों से संविधान के मुताबिक काम करने और हिंसा से परहेज करने की सलाह दी. अमेरिकी सरकार का यह भी कहना था कि वह श्रीलंकाई सरकार से संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों से संबंधित शर्तों के पालन की अपेक्षा भी करती है.

सिरिसेना ने अपने भाषण में इसका जिक्र नहीं किया. इसकी बजाय उन्होंने जांच और नीति में गड़बड़ियों और यूएनपी के नेता रनिल विक्रमसिंघे के साथ मतभेदों की तरफ इशारा किया.

फरवरी 2018 से ये मतभेद पूरी तरह से सार्वजनिक हैं. उसी समय में श्रीलंका पुडजाना परमुना (श्रीलंका पीपुल्स फ्रंट) पार्टी को स्थानीय चुनावों में 44 फीसदी से भी ज्यादा वोट हासिल हुए थे. श्रीलंका पुडजाना परमुना नई पार्टी थी, जो सिरिसेना की श्रीलंका फ्रीडम पार्टी से टूटकर बनी थी. सिरिसेना की पार्टी को सिर्फ 8 फीसदी से कुछ ज्यादा वोट मिले थे. इन चुनाव नतीजों को गठबंधन सरकार के लिए झटका माना जा रहा था. अप्रैल 2018 में जब प्रधानमंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तो आश्चर्यजनक कदम के तहत सिरिसेना की श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के 16 सांसदों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान कर दिया. हालांकि, यूएनपी के सांसद अपने नेता के साथ खड़े रहे और इस तरह से प्रस्ताव गिर गया. साथ ही, 16 सांसदों को गठबंधन सरकार के भीतर अपने विभाग और हैसियत गंवानी पड़ी.

जाहिर तौर पर इन तमाम वजहों से सिरिसेना ने राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त करने का फैसला किया. कइयों के लिए यह हैरानी वाली बात थी. खास तौर पर इस बात को लेकर कि राजपक्षे की कैबिनेट के पूर्व सदस्य सिरिसेना दिसंबर 2014 में अलग होते हुए संयुक्त विपक्ष की तरफ से राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बने थे और राजपक्षे ने इस कदम को विश्वासघात माना था.

कई वकीलों की राय में यह असंवैधानिक कदम है

बहरहाल, तमाम घटनाक्रम के बारे में सुनियोजित तरीके से प्लानिंग की गई थी. यूपीएफए के गठबंधन छोड़ने की खबर आने के तुरंत बाद राजपक्षे के शपथ ग्रहण का मामला हुआ. विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से हटाने और उनकी जगह पर राजपक्षे को नियुक्त करने के लिए गजट नोटिफिकेशन हुआ.

इसके बावजूद, कई वकीलों ने इस कदम को असंवैधानिक करार दिया. विशेष तौर पर संविधान के 19वें संशोधन के सिलसिले में यह बात कही गई, जहां खास तौर पर उन परिस्थितियों का जिक्र है, जब प्रधानमंत्री पद संभालने में सक्षम नहीं रह जाते. हालांकि, यूपीएफए का दावा है कि यह कदम कानून सम्मत था.

पार्टी के मुताबिक, संविधान के एक सेक्शन के तहत राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री को हटाने का अधिकार है, अगर उनको ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री ने जनता का भरोसा खो दिया है. बहरहाल, राजनीतिक पहलू के हावी होने के मद्देनजर इस सिलसिले में कानूनी मामलों को लेकर बहस को पहले ही भुला दिया गया है.

विक्रमसिंघे और राजपक्षे, दोनों दावा कर रहे हैं कि उनके पास संसद में बहुमत था. राष्ट्रपति सिरिसेना ने संसद को 16 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दिया था. उसके बाद सदन के पटल पर मतदान कराया जाएगा. हालांकि, राजपक्षे के समर्थक इस कदम से संतुष्ट नहीं थे और वे सरकार द्वारा संचालित मीडिया पर नियंत्रण के लिए तेजी से आगे बढ़ने लगे.

सरकार की तरफ से संचालित प्रिंट, ब्रॉडकास्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों में नए चेयरमैन की नियुक्त की गई. सरकारी टेलीविजन चैनल रूपावाहिनी ने हिंसा फैलने के बाद 26 अक्टूबर को अपना प्रसारण रोक दिया, जबकि सूचना और मीडिया मामलों के पूर्व मंत्री और राजपक्षे के समर्थक केहेलिया रम्बुकवेल्ला सब कुछ देख रहे थे. सरकारी अखबार संडे ऑब्जर्बर की संपादक धारिशा बैस्टियंस ने बताया कि उन्हें संपादकीय नियंत्रण छोड़ने को कहा गया.

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सांसद अर्जुन रणतुंगा और राष्ट्रपति सिरिसेना के समर्थक सीलॉन पेट्रोलियम कॉरपोरेशन के कर्मचारियों के बीच गोली-बारी की घटना उग्र हिंसा में बदल गई. इस दौरान रणतुंगा के बॉडीगार्ड की गोली से एक शख्स की मौत हो गई, जबकि दो अन्य जख्मी हो गए.

इस बीच, यूपीएफए ने अपने अगले कदम का खुलासा कर दिया है. महिंदा और उनके बेटे निर्मल, दोनों ने संकेत दिए हैं कि संसद में बहुमत दिखाने के बाद उनकी योजना मध्यावधि चुनाव कराने की है. यूएनपी संसद की बैठक बुलाने की मांग पर डटी हुई है. स्पीकर कारू जयसूर्या ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर कहा कि संसद को स्थगित करने का उनका (राष्ट्रपति) का फैसला उनसे सलाह-मशविरे के बिना किया गया. चिट्ठी में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रपति के इस कदम से देश को गंभीर और अवांछित नतीजे भुगतने होंगे. जयसूर्या ने विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री भी माना है.

इस बीच, आईजीपी ने विक्रमसिंघे की सुरक्षा वापस ले ली है और अब उनके पास स्पेशल टास्क फोर्स के 10 कर्मी ही रह गए हैं. इस पूरे घटनाक्रम में पहले ही कई जनप्रतिनिधि पाला बदल चुके हैं, जो इस बात का संकेत है कि बंद दरवाजों के पीछे सौदेबाजी का दौर जारी है.

संसद की बैठक कितनी जल्दी बुलाई जाएगी और कौन सी पार्टी सबसे ज्यादा नंबर पेश करने में सक्षम होगी, ये बातें काफी निर्णायक हैं. तब तक श्रीलंका में अस्थिरता का दौर जारी रहेगा.

(लेखक ग्राउंडव्यूज के संपादक हैं.)

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