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अफ्रीकी देशों के साथ रिश्ते आखिर पूरी दुनिया क्यों बनाना चाहती है?

मुश्किल हालातों के बीच रवांडा फिर से उठ खड़ा हुआ है और आज ये मुल्क भी तमाम अफ्रीकी देशों की तरह विकास के लिये मजबूत देशों से हर क्षेत्र में सहयोग चाहता है

Updated On: Jul 24, 2018 09:27 AM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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अफ्रीकी देशों के साथ रिश्ते आखिर पूरी दुनिया क्यों बनाना चाहती है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अफ्रीकी महाद्वीप के तीन देशों के दौरे पर हैं. उनकी इस यात्रा में रवांडा पहला पड़ाव है. रवांडा जाने वाले मोदी देश के पहले पीएम हैं. रवांडा की यात्रा से मोदी अफ्रीकी देशों के साथ भारत की विदेश नीति की नई प्रस्तावना लिखेंगे. इस यात्रा के जरिये ये संकेत दिया जा रहा है कि भारत के लिए अफ्रीकी देशों की महत्ता सिर्फ व्यापारिक हितों तक ही सीमित नहीं है. बल्कि भारत भावनात्मक रूप से भी अफ्रीकी देशों के साथ अपने संबंधों को महसूस करता है.

रवांडा को पूर्वी अफ्रीका का द्वार कहा जाता है. रवांडा का क्षेत्रफल केरल राज्य से भी छोटा है. 1962 में इसे संयुक्त राष्ट्र ने औपचारिक रूप से देश का दर्जा दिया था. लेकिन रवांडा की तकदीर में गरीबी-भुखमरी के अलावा रक्तरंजित इतिहास भी लिखा था. साल 1994 को हुए नरसंहार में दस लाख लोग मारे गए. यहां के हुतु और तुत्सी समुदाय के बीच हुए नरसंहार ने रवांडा के इतिहास को खून से रंग दिया था. लाखों लोग देश छोड़कर भागने को मजबूर हुए थे.

लेकिन बाद में दोनों समुदायों को राजनीतिक नफरत भुला कर आगे बढ़ने में ही समझदारी दिखी. मुश्किल हालातों के बीच रवांडा फिर से उठ खड़ा हुआ और आज ये मुल्क भी तमाम अफ्रीकी देशों की तरह विकास के लिये आर्थिक रूप से मजबूत देशों से सहयोग चाहता है. भारत से इसकी भी अपेक्षाएं हैं.रवांडा को लेकर भारत अपनी रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने के लिये पहला मिशन शुरू करने जा रहा है.

पीएम मोदी रवांडा के राष्‍ट्रपति पॉल कागामे को 200 गायें तोहफे के रूप में देंगे. पीएम मोदी के गायों के तोहफे के पीछे व्यावहारिक और भावनात्मक संदेश निहित है. साथ ही मोदी रवेरु मॉडल गांव का दौरा भी करेंगे. रवांडा सरकार ने गरीबी हटाने के लिये गिरिंका नाम से एक योजना शुरू की है. इसके तहत हर गरीब परिवार को सरकार एक गाय दान करती है. गाय दान करने के पीछे उद्देश्य है कि गरीब परिवार दूध उत्पादन कर आय का स्रोत बना सके. रवांडा की सरकार का दावा है कि इस योजना से तकरीबन साढ़े तीन लाख लोगों को फायदा पहुंचा है.

पूर्वी अफ्रीकी देश युगांडा के साथ भी भारत के पुराने रिश्ते हैं. इन रिश्तों में ताजगी भरने के लिये पीएम मोदी युगांडा की भी यात्रा कर रहे हैं. 21 साल बाद देश का कोई पीएम युगांडा के दौर पर है. मोदी युगांडा की संसद को संबोधित करेंगे. ऐसा करने वाले वो देश के पहले पीएम होंगे. युगांडा के दौरे पर रक्षा और कृषि क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने की बात होगी.

अफ्रीकी देशों के साथ भारत का कृषि सहयोग पर बड़ा जोर है. अफ्रीका के पास दुनिया की 60 फीसदी कृषि योग्य जमीन है. अगर इस जमीन पर खाद्य उत्पादन समुचित तकनीक के साथ किया जाए तो अफ्रीका दुनिया के लिये खाद्यान्न का कटोरा बन सकता है लेकिन यहां सिर्फ 10 प्रतिशत ही उत्‍पादन होता है.

भारत और अफ्रीकी देशों का आजादी से पहले का इतिहास उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, नस्लभेदी और रंगभेद जैसे कारणों की वजह से एक ही आग में झुलसा है. गांधी-मंडेला के विचार, आदर्श और स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष ने दोनों देशों को समान रूप से जोड़ने का काम किया है. भारत की आजादी की महागाथा में दक्षिण अफ्रीका का भी वो अध्याय है जिसमें बैरिस्टर मोहन दास करमचंद गांधी के 'साबरमति के संत' बनने का दस्तावेज दर्ज है. गांधी जी के ही आदर्शों को नेल्सन मंडेला ने आत्मसात किया था और मंडेला को अफ्रीकी देशों का गांधी कहा जाता है.

बदलते वैश्विक दौर के बावजूद भारत ने अफ्रीकी देशों के साथ ऐतिहासिक संबंधों में कभी शिथिलता नहीं दिखाई. मोदी की रवांडा यात्रा को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है. अफ्रीकी देशों के प्रति विदेश नीति को भारत ने हमेशा प्राथमिकता दी है. आजादी के बाद के सत्तर साल में अफ्रीकी देशों के साथ भारत के रिश्तों का जुड़ाव स्वाभाविक रूप में आगे बढ़ता रहा.

भारत और अफ्रीका के बीच पिछले कुछ साल में व्यापार में 10 गुना बढ़ोतरी हुई है. भारत और अफ्रीका के बीच व्यापार 72 अरब डॉलर पहुंच चुका है. अफ्रीका के 34 देश शुल्क मुक्त हो कर भारत में व्यापार कर रहे हैं.

अफ्रीका में भारत एक बड़ा निवेशक देश है. अफ्रीकी अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी बहुत है. भारत की ही तरह अफ्रीका आधुनिकीकरण और शहरीकरण की दिशा में तेजी से विकास कर रहा है.

नेहरू-इंदिरा काल से मोदी सरकार के दौर तक अफ्रीकी देशों के साथ सामरिक, व्यापारिक, आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को लेकर कभी कसर नहीं छोड़ी. पीएम मोदी का यह दूसरा अफ्रीका दौरा है. इससे पहले साल 2016 में मोजाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया और केन्या के दौरे पर गए थे. पिछले चार साल में अबतक कुल 23 बार भारत सरकार के प्रतिनिधि, राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री अफ्रीका की यात्रा कर चुके हैं.

अफ्रीकी देशों के साथ मजबूती संबंधों को आगे बढ़ाने के लिये भारत ने साल 2015 में भारत-अफ्रीका मंच शिखर सम्मेलन का आयोजन किया था. इस सम्मेलन में अफ्रीका के सभी 54 देशों को आमंत्रित किया गया था. साल 1983 में भारत में हुए गुट-निरपेक्ष देशों के सम्मेलन के बाद ये सबसे बड़ा आयोजन था.

अफ्रीकी देशों के साथ संबंधों को लेकर सहयोग की तेजी के पीछे दरअसल भारत की रणनीतिक मजबूरी भी है. इस रणनीति के तहत अफ्रीकी देशों में चीन के प्रभुत्व को टक्कर भी देनी है. भारत नहीं चाहता कि श्रीलंका,नेपाल और बांग्लादेश की तरह ही अफ्रीकी देशों में भी चीन भारत के लिये चुनौती बने. पीएम मोदी के रवांडा दौरे से पहले चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग भी रवांडा जा रहे हैं. दरअसल दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में होने वाले ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में वो शिरकत कर रहे हैं. लेकिन उससे पहले अफ्रीकी देशों में चीन के बढ़ते प्रभुत्व का वो आंकलन कर रहे हैं. .

चीन के लिये अफ्रीकी देश संभावनाओं से भरे हुए बाजार हैं. अफ्रीकी देशों से चीन को कच्चा माल बेहद सस्ता मिलता है. अफ्रीकी देशों  से चीन को जमीन, फैक्ट्रियां, मजदूर और कच्चा माल आसानी से मिल रहा है. चीन लगातार अफ्रीका में ढांचागत निर्माण में अपनी अग्रणी भूमिका निभा रहा है.

वहीं हिंद महासागर से अफ्रीकी देशों के जुड़े होने की वजह से चीन की मौजूदगी के चलते भारत की सुरक्षा के लिहाज से सामरिक महत्व बढ़ जाता है. अफ्रीका का पूर्वी तट और भारत का पश्चिमी तट समुद्र के जरिये एक दूसरे से जुड़े हुए हैं.ऐसे में अफ्रीकी देशों के साथ भारत के रिश्तों का सामरिक महत्व बढ़ जाता है.

 

अफ्रीका के प्रचुर प्राकृतिक संसाधन और उसकी कृषि योग्य जमीन सबसे बड़ी ताकत हैं. अपने  प्राकृतिक संसाधनों और युवा जनसंख्या की वजह से अफ्रीका दुनिया में एक बड़े उत्पादन स्थल के रूप में उभर रहा है. अफ्रीका के पास खनिज संपदा, तेल और गैस की खदानों का खजाना है. यही वजह है कि अफ्रीकी देशों की अहमियत को देखते हुए ही अमेरिका, जापान और दूसरे यूरोपीय देश यहां संभावनाएं तलाश रहे हैं.

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