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पेरिस जलवायु समझौता: अमेरिका के बाहर जाने का असर क्या होगा

ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबले में अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से अमेरिका अलग हो गया

Updated On: Jun 02, 2017 08:20 AM IST

FP Staff

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पेरिस जलवायु समझौता: अमेरिका के बाहर जाने का असर क्या होगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से अलग कर लिया है. इस तरह ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबले में अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से अमेरिका अलग हो गया. इस तरह अमेरिका ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ इस डील से बाहर तीसरा देश बन गया है. इसके अलावा निकारागुआ और सीरिया डील से बाहर हैं.

क्या है पेरिस जलवायु समझौता

पेरिस जलवायु समझौता लगभग 200 देशों के बीच में हुआ. इन देशों ने अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने का निश्चय किया था. पूरे विश्व का में बढ़ते तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस तक रोकने के मकसद से यह समझौता हुआ था. ग्रीन हाउस गैसेस के उत्सर्जन में 28% की कमी लाने का निश्चय किया था. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सितंबर 2016 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

समझौते पर भारत के साथ-साथ लगभग 200 देश हस्ताक्षर कर चुके हैं. 4 नवंबर 2016 से यह समझौता लागू भी हो गया. पेरिस समझौते का मुख्य लक्ष्य 2100 तक ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित रखना था.

अमेरिका के बाहर होने का मतलब

अमेरिका पिछले कई दशकों से दुनिया का सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जक देश है. दुनिया के कार्बन उत्सर्जन का करीब 15 फीसदी हिस्सा अमेरिका से आता है. साथ ही वह उन विकासशील देसों के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद का बड़ा स्रोत है जो जलवायु परिवर्तन से लड़ना चाहते हैं.

राष्ट्रपति ओबामा ने पेरिस समझौते के बारे में कहा था कि इसमें सबकी जीत है. उन्होंने कहा था कि अमेरिका के लिए ये नई टेक्नोलॉजी और नए शोध में पैसा लगाकर लाखों नौकरियां पैदा करने का मौका है. उन्होंने यह भी कहा था विकासशील देशों के लिए इन नए आविष्कारों का फायदा उठाने का मौका है.

लेकिन ट्रंप के इस कदम से सवाल खड़े हो गए हैं कि क्लाइमेट चेंज के खिलाफ लड़ाई में अब अमेरिका से कितना सहयोग मिलेगा. साथ ही ऐसा भी लगता है कि क्लाइमेट चेंज की लड़ाई में अब अग्रणी भूमिका भारत और चीन जैसे देशों को निभानी होगी.

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