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आतंकवादी विचारधारा रखने वालों को चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता पाकिस्तान

आने वाले 40 दिनों में (25 जुलाई) पाकिस्तान में आयोजित होने वाले आम-चुनावों और प्रांतीय चुनावों में ‘मुंबई-ब्लास्ट’ का अपराधी हाफ़िज़ सईद अपनी पार्टी जमात-उद-दावा (जेयूडी) के 200 उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगा

Nazim Naqvi Updated On: Jun 15, 2018 08:35 AM IST

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आतंकवादी विचारधारा रखने वालों को चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता पाकिस्तान

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं में अपने लिए समर्थन ढूंढने वाले पाकिस्तान ने फिर आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की है. इस सिलसिले की ताज़ा खबर यह है कि पाकिस्तान चुनाव आयोग ने 26/11 मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड हाफ़िज़ सईद की पार्टी ‘मिल्ली मुस्लिम लीग’ (एमएमएल) को पंजीकृत करने से इनकार कर दिया है.

सूचना-क्रांति ने दुनिया को एक ग्लोबल-विलेज बना दिया है

संदेश बिलकुल साफ है कि चुनाव-आयोग, पाकिस्तान तहरीक-ए-ताइबा की विचारधारा पर खड़ी की गई पार्टी को आगामी 25 जुलाई में होने वाले आम चुनावों में शिरकत करने की इजाज़त नहीं दे सकता. लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने भर से वह दहशतगर्दों को और आतंकवादी विचारधारा रखने वालों को रोक पाएगा? जवाब है नहीं. क्योंकि पाकिस्तान की फौजी व्यवस्था और संकीर्ण सोच का व्यापार करने वालों की ताकत इतनी ज्यादा है कि उन्हें रोका ही नहीं जा सकता.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने आपको लोकतांत्रिक मूल्यों वाला देश कहलवाने की लालच में पाकिस्तान किसी न किसी झूठ का सहारा लेता ही रहा है. उसके समर्थन में ‘हर-मौसम का साथी’ चीन को छोड़कर कोई भी देश आने से कतराता है और अमरीका ने तो खुले तौर पर उसको चेतावनी दे दी है. आज जिस दुनिया में हम रह रहे हैं उसमें अब कोई भी देश किसी विषय को अपना आंतरिक विषय कहकर जो चाहे वह नहीं कर सकता. मानवाधिकारों का संरक्षण अब किसी देश का अपना माला भर नहीं रह गया है. अब दुनिया बहुत बदल गई है. यही वजह है की म्यांमार को भी रोहिंग्या मुसलामान शरणार्थियों की वापसी के लिए अपने दरवाजे खोलने पड़े हैं.

सूचना-क्रांति ने दुनिया को एक ग्लोबल-विलेज बना दिया है. अब सिर्फ जुमले नहीं बल्कि नीयत पर बात होने लगी है. ऐसे में अगर पाकिस्तान और उसका चुनाव-आयोग वास्तव में चाहता है कि दहशतगर्द या आतंकवादियों को चुनावों के ज़रिए पाकिस्तानी सत्ता में आने से रोका जाए तो उसे अपनी नीयत में बदलाव लाना होगा. जिसके लक्षण दूर-दूर तक नहीं दिखाई देते.

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अब इसमें किसी शक की कोई गुंजाइश नहीं है और यह लगभग अब साफ़ हो गया है कि आने वाले 40 दिनों में (25 जुलाई) पाकिस्तान में आयोजित होने वाले आम-चुनावों और प्रांतीय चुनावों में ‘मुंबई-ब्लास्ट’ का अपराधी हाफ़िज़ सईद अपनी पार्टी जमात-उद-दावा (जेयूडी) के 200 उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगा.

Hafiz Muhammad Saeed, chief of the Islamic charity organization Jamaat-ud-Dawa (JuD), sits during a rally against India and in support of Kashmir, in Karachi,

एएपी का चुनाव निशान ‘कुर्सी’ ही एमएमएल के उमीदवारों का भी निशान होगा

जमात-उद-दावा, लश्कर-ए-तैयबा का चेहरा है. वही लश्कर-ए-तैयबा जिनके आतंकवादियों ने 2008 में मुंबई में हमला किया था. पिछले वर्ष जमात-उद-दावा ने एमएमएल के नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी की घोषणा करने के साथ ही पाकिस्तान चुनाव आयोग में अपने आपको पंजीकृत कराने की तैयारी शुरू कर दी थी.

लेकिन जैसे ही उन्हें लगा कि चुनाव-आयोग उनके पंजीकरण को टाल सकता है उन्होंने एक दूसरे मंच ‘अल्लाह-ओ-अकबर तहरीक’ (ए.ए.टी.), जो चुनाव-आयोग से पंजीकृत भी है, के बैनर तले चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया.

खबर यह है कि एमएमएल के अध्यक्ष सैफुल्लाह खालिद और एएटी के प्रमुख एहसान बारी, ए.ए.टी के झंडे तले होने वाले आगामी चुनाव में संयुक्त उमीदवार उतारने की बात पर सहमत हो गए हैं. समझौते के मुताबिक, एमएमएल अपने 200 उमीदवार खड़े करेगा और एएपी का चुनाव निशान ‘कुर्सी’ ही एमएमएल के उमीदवारों का भी निशान होगा.

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अक्टूबर 2017 से हाफ़िज़ सईद की एमएमएल पूरे पाकिस्तान में अपनी पार्टी की सदस्यता अभियान में लगी हुई है जिसकी शुरुआत उसने पेशावर से की थी और उसका यह काम ब-दस्तूर जारी है. हालांकि पाकिस्तानी मतदाता जिसने हमेशा रुढ़िवादी संगठनों को चुनावों में मात दी है, इसबार भी इन ताकतों को नकारने में कोई कसार नहीं छोड़ेगा लेकिन उससे पहले भी क्या हो सका है जो अब होगा.

हाफ़िज़ सईद, जिसके दामन पर 2008 में हुए मुंबई हमले का खून लगा हुआ है

भारत-विरोधी आतंकी संगठनों का पाकिस्तान की सियासत में प्रवेश सिर्फ अंतरराष्ट्रीय आलोचना का ही शिकार हुआ है बल्कि पाकिस्तानी अवाम भी इसपर चिताएं जता रही है. आतंकवादियों की इन सियासी चालों को रोकने में नाकाम रही पाकिस्तानी-व्यवस्था की अमरीका खुलेआम आलोचना करने लगा है.

25 जुलाई के होने वाले चुनावों से पहले अब पाकिस्तान में भी यह बहस शुरू हो गई है कि इन चरमपंथियों के मुख्यधारा में आने के नतीजे किसी भी हाल में बेहतर नहीं होंगे. क्योंकि फ़ौजी-व्यवस्था की शह पर वह आतंकी पंजे जो भारत को लहूलुहान कर रहे हैं उनसे ख़ुद पाकिस्तान भी लहूलुहान होता रहा है.

कश्मीर की सीमा पर पाकिस्तानी फायरिंग की घटनाएं रोज़ भारतीय सैनिकों की जान ले रही हैं. जिसे पाकिस्तान में होने वाले चुनावों से जोड़कर भी देखा जा रहा है. क्योंकि इसी माहौल में आतंकवादी और चरमपंथी संगठन मतपेटियों पर कब्ज़ा कर सकेंगे.

कुल मिलाकर आज नहीं तो कल लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पाकिस्तान को आखिरकार इसका जवाब देना ही पड़ेगा कि हाफ़िज़ सईद, जिसके दामन पर 2008 में हुए मुंबई हमले का खून लगा हुआ है, जिसके सिर पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम घोषित है, उसे वह क्यों बचाने की हर संभव कोशिश करता है?

आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आंखें लाहौर स्थित ‘कद्दासिया मस्जिद’ पर लगी रहेंगी जहां से हाफ़िज़ सईद हर शुक्रवार उपदेश देता है.

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