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अमेरिका के ‘डू मोर’ और चीन के ‘लव मोर’ में फंसा पाकिस्तानी मीडिया

पिछले दिनों पाक सेना के आर्मी चीफ बाजवा से अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख जनरल जोसफ वोटल और एक अमेरिकी सीनेटर की टेलीफोन पर हुई बातचीत का पाकिस्तानी उर्दू अखबारों ने अपने-अपने नजरिए से विश्लेषण किया है

Updated On: Jan 15, 2018 11:59 AM IST

Seema Tanwar

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अमेरिका के ‘डू मोर’ और चीन के ‘लव मोर’ में फंसा पाकिस्तानी मीडिया

अमेरिका से रिश्ते पाकिस्तानी उर्दू मीडिया के लिए गले की ऐसी हड्डी बनी हुई है जिसे न तो निगलते बनता है और न ही उगलते. कुछ अखबार अपने संपादकीय लेख में बराबर ‘अमेरिका से लोहा’ ले रहे हैं. तो कुछ पाक-अमेरिकी तनाव के घटने की उम्मीद लगाए बैठे हैं.

इस उम्मीद की बुनियाद पिछले दिनों पाकिस्तान के सेना प्रमुख से अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख जनरल जोसफ वोटल और एक अमेरिकी सीनेटर की टेलीफोन पर हुई बातचीत है.

नए साल के पहले दिन पाकिस्तान के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कड़े ट्वीट के बाद इस टेलीफोन बातचीत में अमेरिका का रवैया थोड़ा नरम सुनाई पड़ा. कई अखबार इस नरमी को बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश कर रहे हैं और पाकिस्तानी सेना की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं. इस बीच, अमेरिका से अकसर ‘डू मोर’ की हिदायत सुनने वाले पाकिस्तान में कुछ लोगों को चीन की तरफ से ‘लव मोर’ सुनाई पड़ रहा है.

भारत पर मेहरबानियां

जंग ने अपने संपादकीय की हेडलाइन रखी- ताजा पाक-अमेरिकी संपर्क: सकारात्मक इशारे. अखबार लिखता है कि जनरल जोसेफ और अमेरिकी सीनेटर की पाकिस्तानी सेना प्रमुख से बातचीत इस बात की निशानदेही करती है कि पाकिस्तान के खिलाफ इल्जाम लगाना और उसे धमकियां देना किसी समस्या का हल नहीं है. अखबार कहता है कि अफगानिस्तान में शांति कायम करने के लिए आपसी संपर्क और सोच-विचार बहुत जरूरी है. इसलिए माकूल लब ओ लहजे पर आधारित ताजा संपर्क उम्मीद की किरण हैं.

अखबार लिखता है कि अमेरिका पाकिस्तान से सिर्फ अपनी मांगें मनवाने की बजाय पाकिस्तान के हितों को भी तवज्जो दे और भारत पर मेहरबानियां कर के पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ाने से गुरेज करे. अखबार कहता है कि अमेरिका कश्मीर और भारत-पाकिस्तान के बीच पानी के विवाद को हल कराने में अपनी भूमिका अदा करे क्योंकि इसके बिना इलाके में स्थाई शांति कायम करना संभव नहीं है.

एक्सप्रेस के संपादकीय का शीर्षक है: पाक-अमेरिकी रिश्तों में तनाव खत्म होने के इशारे. अखबार के मुताबिक जनरल वोटल ने कहा कि अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ‘पाकिस्तान की कुर्बानियों’ को सराहता है और उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच तनाव को जल्द दूर कर लिया जाएगा. अखबार के मुताबिक उन्होंने पाकिस्तानी सेना प्रमुख को यकीन दिलाया है कि अमेरिका पाकिस्तान में कोई एकतरफा कार्रवाई नहीं करने जा रहा है. बल्कि वह पाकिस्तान से अपने यहां मौजूद आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई चाहता है.

अमेरिका मोहताज?

वहीं मशरिक जैसे अखबार अब भी ऐसे शीर्षक से संपादकीय लिख रहे हैं: आर्मी चीफ का अमेरिकी अधिकारियों को दो टूक जवाब. अखबार लिखता है कि पाकिस्तान सेना के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने कहा कि पाकिस्तान अमेरिका से सहायता बहाल करने के लिए नहीं कहेगा और अपने ही संसाधनों से अपनी सरजमीन की रक्षा करेगा.

अखबार कहता है कि पाकिस्तान का सियासी और सैन्य नेतृत्व पाकिस्तान पर अमेरिकी असर को कम करने की कामयाब कोशिश कर रहा है, जिससे अमेरिकी अधिकारियों का चिंतित होना स्वाभाविक है. अखबार की राय में, पाकिस्तान में किसी तरह की कार्रवाई न करने के बारे में अमेरिकी जनरल का आश्वासन अपनी जगह है, लेकिन दुश्मन से सावधान रहने में ही समझदारी है. देश को भरोसा है कि पाकिस्तान फौज जरा भी गफलत में नहीं है.

उम्मत का कहना है कि सारी दुनिया इस बात को जानती है कि अब पाकिस्तान को अमेरिका की जरूरत नहीं है. बल्कि खुद अमेरिका पाकिस्तान के सहयोग का मोहताज है. अखबार की राय है कि अमेरिका को बदली परिस्थितियों में अपनी पोजिशन का ठीक-ठाक अंदाजा कर अपनी रणनीति और विदेश नीति में बदलाव करना चाहिए क्योंकि सिर्फ इसी तरह वह अपनी रही सही साख बचा सकता है.

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अखबार ने एक तरफ जहां पाकिस्तान सरकार को खरी खोटी सुनाई है वहीं दूसरी तरफ देश की सेना की पीठ ठोंकी है. अखबार की राय है कि जो बात अमेरिका से पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व करनी चाहिए थी, वह आखिरकार आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा को करनी पड़ी. अखबार की टिप्पणी है कि सियासी नेतृत्व ने खुद को कई उलझनों में फंसा रखा है, इसलिए अमेरिका के सामने कोई ठोस या सैद्धांतिक रुख अपनाने की उसके भीतर जुर्रत नहीं है.

लव मोर

नवा ए वक्त लिखता है कि अमेरिका की तरफ से जहां हमेशा ‘डू मोर’ की मांग होती है, वहीं चीन की तरफ से ‘लव मोर’ की सदाएं आती हैं. ‘लव मोर’ की बात पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ ने लाहौर में चीनी राजदूत से मुलाकात के बाद कही.

अखबार लिखता है कि 'अमेरिका की खातिर हमने आतंकवाद के खिलाफ जंग में अपने 74 हजार नागरिकों और फौजियों की जान की कुर्बानी दी और 1 खरब 23 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान उठाया, लेकिन हमारी तमाम कुर्बानियों और अहसानों को फरामोश कर उसने 'डू मोर' की रट लगा रखी है. दूसरी तरफ चीन है जो बेलोस हमारा साथ निभा रहा है और उसने भारत के खिलाफ हमारे रक्षा तंत्र को मजबूत किया है.'

अखबार कहता है कि अमेरिका समझता है कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा जुर्म चीन से दोस्ती है, लेकिन उसने अपनी ‘अदाओं’ पर कभी गौर नहीं किया. अखबार ने जहां चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर (सीपीईसी) को एक तोहफा बताया है, वहीं पाकिस्तान की दर्जनों विकास परियोजनाओं में चीनी मदद को सराहा है. अखबार की राय में दशकों से चली आ रही पाक-चीन दोस्ती पूरी दुनिया में एक मिसाल बन चुकी है.

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