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पाक डायरी: चीन से जंग में भारत को कैप्टन अमेरिका से मदद की चाह

पाक मीडिया का कहना है कि भारत जंतर मंतर से दुनिया को फतह करने का ख्वाब देख रहा है

Seema Tanwar Updated On: Aug 14, 2017 11:35 AM IST

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पाक डायरी: चीन से जंग में भारत को कैप्टन अमेरिका से मदद की चाह

जम्मू कश्मीर में आर्टिकल 35 ए पर सत्ताधारी गठबंधन में उभरे मतभेदों की गूंज पाकिस्तानी मीडिया में भी सुनाई दी. कश्मीर के सिलसिले में पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी के बयान को भी खासी तवज्जो मिली है. कुछ अखबारों ने डोकलाम विवाद का जिक्र भी किया और भारत को अपनी सेनाएं वहां से हटाने की बिन मांगी नहीसत भी दे डाली. इसके अलावा पाकिस्तान को बने 70 साल पूरे होने के मौके पर अखबारों में जज्बाती संपादकीय भी लिखे गए हैं.

बीजेपी के मंसूबे

रोजनामा 'पाकिस्तान' ने आर्टिकल 35 ए और 370 पर भारतीय जनता पार्टी और डीपीपी के मतभेदों पर अपने संपादकीय का शीर्षक लगाया है- कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने की भारतीय कोशिशें.

अखबार लिखता है कि जब से बीजेपी सत्ता में आई है तब से वह जम्मू कश्मीर में आजादी के संघर्ष को खत्म करने के लिए अलग-अलग मंसूबों पर काम कर रही है. अखबार के मुताबिक कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करना भी इन्हीं कोशिशों का एक हिस्सा है. अखबार लिखता है कि मोदी अपने ऐसे इरादों का संकेत चुनाव अभियान के दौरान ही भी देते रहे हैं.

अखबार ने भारत सरकार पर आरोप लगाया है कि वह सरकारी कॉलोनी बनाकर देश के दूसरे हिस्सों से हिंदू को ले जाकर कश्मीर में बसा रही है. ताकि घाटी में मुसलमान अल्पसंख्यक हो जाएं. अखबार कहता है कि शायद यह पट्टी मोदी को इजरायल ने पढ़ाई है. जिसने फलस्तीन की जमीन पर जबरदस्ती कब्जा कर उन इलाकों में यहूदी बस्तियां बसानी शुरू कर दी है.

भारत को अमेरिका की शह

'औसाफ' ने पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी के इस बयान को अहमियत दी है कि वह कश्मीर के मसले को हर फोरम पर उठाएंगे. अखबार लिखता है कि पाकिस्तान कश्मीरियों का अकेला वकील है जो उनकी आवाज को दुनिया भर में पहुंचा सकता है और उनका मुकदमा लड़ सकता है. अखबार की राय है कि कुछ विश्व ताकतें नहीं चाहती कि कश्मीर समस्या हल हो.

भारत को पाकिस्तान का साफ तौर पर दुश्मन करार देते हुए अखबार ने टिप्पणी की है कि वह अमेरिका और इजरायल की शह पर क्षेत्र में शक्ति का संतुलन बिगाड़ रहा है और कश्मीर में ढाए जा रहे जुल्मों में बराबर शामिल है.

'नवा ए वक्त' लिखता है कि कश्मीर समस्या को एक मानवीय त्रासदी बनाने में भारत के अलावा सोवियत यूनियन, अमेरिका और ब्रिटेन की भी अहम भूमिका रही है, जिनकी वजह से भारत के लिए कश्मीर से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को अनदेखा करना आसान रहा है.

अखबार कहता है कि अतीत में जब भी पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीरियों के स्वनिर्धारण के हक में आवाज उठाई, तो सोवियत संघ ने उसे वीटो किया और इस तरह एक करोड़ कश्मीरियों का भविष्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति की साजिशों की भेंट चढ़ गया. अखबार के मुताबिक, पर्दे के पीछे से अमेरिका और ब्रिटेन भी भारत का समर्थन करते हैं.

चीन से न उलझे भारत

वहीं 'उम्मत' ने भारत और चीन के बीच डोकलाम के मुद्दे पर संपादकीय लिखा है और हेडलाइन लगाई है - जंतर मंतर से दुनिया को फतह करने का ख्वाब. अखबार कहता है कि अगर भारत यह सोचता है कि अमेरिका उसकी मदद के लिए आएगा तो यह उसकी भूल है. भारत विरोधी एजेंडा रखने वाला यह अखबार कहता है कि भारत की सरकारों और वहां के नेताओं ने चीन से हुई जंग के 55 साल बाद भी कोई सबक नहीं सीखा है.

तंज भरे लहजे में अखबार यहां तक लिखता है कि ऐसा लगता है कि भारत चीन से होने वाली लड़ाई में इस बार स्पाडरमैन और बैटमैन जैसे काल्पनिक किरदारों के अलावा कैप्टन अमेरिका से मदद की आस लगाए बैठा है. अखबार खबरदार करते हुए लिखता है कि जब तक अमेरिका सात समंदर पार से मदद करने आएगा भी, तब तक तो भारत का बहुत बड़ा नुकसान हो चुका होगा.

अखबार कहता है कि चीन जैसी विश्व शक्ति से टकराने के लिए भारत के नेता क्या कोई मंतर पढ़ने में लगे हैं, जिससे वह दुनिया से टकराने पर कामयाबी की उम्मीद लगाये बैठे हैं.

क्यों बनाया पाकिस्तान?

पाकिस्तान में 71वें स्वतंत्रता दिवस पर अपने संपादकीय में 'जसारत' लिखता है कि ये सड़कें, ये पुल, मोटरवे, इमारतें, कारखाने, मनोरंजन के ठिकाने, ये सब तो हर देश में होता है, लेकिन यह चीजें बनाने के लिए देश हासिल नहीं किए जाते, बल्कि देश का निर्माण किसी उद्देश्य और किसी विचारधारा के लिए किया जाता है.

अखबार ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्नाह की आलोचना करने वाले 'स्वघोषित विद्वानों ' की निशाना बनाया है. अखबार के मुताबकि इन लोगों ने कायदे आजम को सेक्युलर करार दिया. उनकी सियासी सोच को संकीर्ण कहा और उन्हें धोखेबाज कहा गया क्योंकि उनकी नजर में वह कौम को इस्लाम के नाम पर धोखा दे रहे थे.

अखबार लिखता है कि सब कुछ तो देख लिया, जम्हूरियत का तमाशा देखा, जरनैली करतब देखे, इस्लामी व्यवस्था के जरनैली दावे देखे, जम्हूरियत के कम्युनिस्ट तड़के देखे, सिविल मार्शल लॉ भी देखे और मार्शल लॉ की कोख से बार बार जम्हूरियत का जन्म भी देखा, लेकिन नजरिया गायब रहा. कुल मिलाकर अखबार पाकिस्तान को इस्लामी तौर तरीकों से चलाने पर जोर देता है.

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