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हिंदुस्तान की नजर हड्डियों और छीछड़ों पर है: पाक मीडिया

अफगान समस्या का हल बातचीत से करने की बात भी कर रहे हैं पाकिस्तानी अखबार

Seema Tanwar Updated On: Oct 23, 2017 10:41 AM IST

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हिंदुस्तान की नजर हड्डियों और छीछड़ों पर है: पाक मीडिया

बीते हफ्ते अफगानिस्तान में एक के बाद एक कई हमलों ने पाकिस्तान के उर्दू मीडिया का ध्यान खींचा है. अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में दो मस्जिदों को हमलों में निशाना बनाया गया है, जिनमें 60 से ज्यादा लोग मारे गए, वहीं काबुल में ही एक सैन्य ठिकाने पर हमले में 15 रंगरूट मारे गए. अमेरिकी ड्रोन हमलों में भी कई लोगों के मारे जाने की खबरें हैं.

पाकिस्तानी अखबारों ने इस हिंसा को लेकर जहां अफगानिस्तान में अमेरिकी नीतियों पर सवाल उठाया है, वहीं भारत को अफगानिस्तान में मिलने वाली अहमियत पर भी एक बार फिर तल्ख टिप्पणियां की हैं. इसके अलावा अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई के इस इल्जाम ने भी पाकिस्तानी अखबारों का ध्यान खींचा है कि अमेरिका पूरे क्षेत्र में गड़बड़ी फैलाने के लिए आईएस को अफगानिस्तान में एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है.

हिंसा की वजह

‘जसारत’ ने अपने संपादकीय में लिखा है कि अफगानिस्तान में हमलों में आई तेजी की वजह क्या है? बाहर से कोई इशारा मिला है या फिर अफगान चरमपंथी नेताओं की मौतों का बदला लिया जा रहा है.

अखबार की राय में, वजह जो हो लेकिन फिलहाल तो उसका नतीजा यही निकलेगा कि अमेरिका अफगानिस्तान में और ज्यादा समय के लिए जम कर बैठ जाएगा और वह अपनी मदद के लिए भारत को भी बुला रहा है. अखबार लिखता है कि पाकिस्तान पर तो यह इल्जाम है कि वह अफगानिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है लेकिन अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई तो कुछ और ही कहते हैं.

पेशावर से छपने वाले ‘मशरिक’ ने भी हामिद करजई के बयान को तवज्जो दी है. अखबार के मुताबिक अमेरिका जहां पाकिस्तान से लगने वाले अफगानिस्तान के सरहदी इलाकों में ड्रोन हमलों के जरिए आंतकवादियों को ठिकाने लगाने की मुहिम पर निकला है, वहीं पूर्व अफगान राष्ट्रपति के बकौल अमेरिका अफगानिस्तान में आईएस को हथियार सप्लाई कर रहा है. अखबार ने करजई के हवाले से लिखा है कि अमेरिका आईएस को हेलीकॉप्टर के जरिए रसद की सप्लाई कर अफगानिस्तान में उसके पांव जमाने की कोशिश कर रहा है.

अखबार कहता है कि अफगानिस्तान में शिया बिरादरी की संगठित तरीके से नस्लकशी के पीछे आईएस का इरादा चाहे जो हो, लेकिन इसका एक मकसद पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच पहले से ही मौजूद गलतफहमियों में इजाफा करना है और पाकिस्तान में जातीय टकराव की जमीन तैयार करना है. अखबार के मुताबिक इस मंसूबे में भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के शामिल होने की भी संभावना है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

अखबार लिखता है कि अगर अमेरिका वाकई इस क्षेत्र में शांति चाहता है तो उसे भारत को थानेदारी देने की सोच छोड़नी होगी. अखबार ने अफगानिस्तान के हुकमरानों को हिदायत दी है कि वे अपने दोस्त और दुश्मन में फर्क करना सीखें और अपने फैसला खुद लेने की हिम्मत अपने भीतर पैदा करें.

अमेरिका को सलाह

वहीं इस विषय पर ‘उम्मत’ का संपादकीय है- अमेरिका इज्जत और शराफत के साथ अफगानिस्तान से निकल जाए.

अखबार कहता है कि अमेरिका अफगानिस्तान में ज्यादा समय रह कर भारत को मजबूत और पाकिस्तान को अस्थिर करने के अलावा चीन की बढ़ती हुई ताकत को भी कंट्रोल करना चाहता है. तल्ख शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अखबार ने टिप्पणी की है कि भारत गीदड़ की तरह अमेरिका शेर के शिकार से बचने वाली हड्डियों और छीछड़ों पर नजर रखे हुए है.

अखबार के मुताबिक मौजूदा दौर में कोई भी ताकत किसी दूसरे देश पर नाजायज कब्जा कर उसे स्थायी रूप से गुलाम नहीं बना कर रख सकती है और अफगान कौम तो फितरत से ही आजाद और खुदमुख्तार रहना पसंद करती है.

अखबार ने अमेरिका को बिन मांगी सलाह देते हुए लिखा है कि वह अगर अपनी सुपरपावर का भरम बनाए रखने के साथ साथ और ज्यादा नुकसान से बचना चाहता है तो इज्जत और शराफत के साथ अफगानिस्तान से तुरंत निकल जाए.

वहीं रोजनामा ‘आज’ लिखता है कि अफगानिस्तान में शांति कायम करने की जद्दोजदह हो या लाखों अफगानों को अपने यहां जगह देना, भारत के साथ लंबित मुद्दों को बातचीत से सुलझाने की चाहत हो या कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन की निंदा, मध्य पूर्व में शांति कोशिशें हो या फिर फिलस्तीनी समस्या का हल, इन सभी मामलों में पाकिस्तान का रुख हमेशा साफ और पारदर्शी रहा है.

अखबार के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बिरादी वैश्विक परिदृश्य में पाकिस्तान के रुख को समझे और उसे भरपूर समर्थन दे. अखबार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से यह भी कहा है कि वह ना तो पाकिस्तान के खिलाफ बेबुनियाद इल्जाम लगाए और न ही भारत में मानवाधिकारों के उल्लंघन और जम्मू कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर अमल न होने पर खामोश रहे.

बातचीत से ही हल

दूसरी तरफ ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि पाकिस्तान ने अमेरिका से साफ कह दिया है कि अफगान समस्या का हल जंग नहीं बल्कि बातचीत से ही मुमकिन है. अखबार के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को यह नहीं भूलना चाहिए कि तमाम युद्धक रणनीति के बावजूद अमेरिका और नाटो की फौजें अफगानिस्तान में कामयाबी हासिल नहीं कर सकीं और अब भी यह आशंका है कि वह अपनी हालिया कार्रवाइयों के जरिए अंतिम नतीजे नहीं हासिल कर पाएंगे. इसीलिए बेहतर है कि जंग की बजाय बातचीत का रास्ता अपनाया जाए.

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