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पाकिस्तान को सीरिया या इराक न समझे अमेरिका: पाक मीडिया

पाकिस्तान की उर्दू मीडिया में पिछले दिनों अमेरिका की ओर से दी धमकी भरे अंदाज में कड़ी आलोचना की गई है और पाकिस्तान से अपनी सुरक्षा को मजबूत करने को कहा गया है

Updated On: Dec 25, 2017 10:39 AM IST

Seema Tanwar

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पाकिस्तान को सीरिया या इराक न समझे अमेरिका: पाक मीडिया

पिछले दिनों अचानक अफगानिस्तान के दौरे पर पहुंचे अमेरिका के उपराष्ट्रपति माइक पेंस की कही बातें पाकिस्तानी मीडिया को चुभ रही हैं. पेंस ने एक बार फिर पाकिस्तान पर आतंकवादियों को पनाह देने का इल्जाम लगाया. उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को सीमा पार से जो खतरे मौजूद हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कह चुके हैं कि पाकिस्तान अगर अमेरिका से सहयोग करेगा तो बहुत कुछ पाएगा और अगर सहयोग नहीं करेगा तो बहुत कुछ खो देगा. पाकिस्तान की उर्दू मीडिया में अमेरिका के इस धमकी भरे अंदाज की कड़ी आलोचना की गई है और पाकिस्तान से अपनी सुरक्षा को मजबूत करने को कहा गया है. इस संदर्भ में भारत-अमेरिकी संबंधों पर भी सख्त टिप्पणियां की हैं.

कड़ा संदेश

रोजनामा एक्सप्रेस कहता है कि अजीब बात है कि अमेरिकी प्रशासन के आला अधिकारी अफगानिस्तान में बैठकर पाकिस्तान विरोधी बयान जारी करते हैं. जबकि हालत यह है कि अफगानिस्तान में आतंकवादियों का नेटवर्क कायम है और अफगान सरकार इस बारे में अपनी नाकामी छुपाने के लिए इल्जाम पाकिस्तान पर लगा रही है.

अखबार ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति के इस बयान का जिक्र भी किया है कि राष्ट्रपति ट्रंप पाकिस्तान को आतंकवादी ठिकाने खत्म करने के लिए नोटिस दे चुके हैं. अखबार की राय में, असल बात तो यह है कि अमेरिका अफगानिस्तान में अपनी नाकामी कबूल करने को तैयार नहीं है. अखबार कहता है कि अमेरिका पाकिस्तान से तो लगातार ‘डू मोर’ की मांग करता है, लेकिन उसे यह भी देखना चाहिए कि अमेरिका ने अफगानिस्तान को अरबों डॉलर दिए हैं, लेकिन आतंकवाद पर काबू करने के लिए उसने क्या कदम उठाए हैं?

Mike Pence

अमेरिका के उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने पिछले दिनों अफगानिस्तान पहुंचने पर पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दी थी

रोजनामा नवा ए वक्त अपनी आदत के मुताबिक इस मामले में भी भारत को घसीटता है. अखबार लिखता है कि इस वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप, उपराष्ट्रपति माइक पेंस, रक्षा मंत्री जिम मैटिस, विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन और अमेरिकी सशस्त्र सेनाओं के कमांडर जेम्स जोसेफ समेत पूरा वॉशिंगटन और पेंटागन प्रशासन पाकिस्तान के पीछे पड़ा है और उनकी तान पाकिस्तान के अंदर फौजी कार्रवाई पर टूटती है.

अखबार की राय में, यह बात किसी से नहीं छिपी है कि भारत के साथ अमेरिका का गठजोड़ है जिससे पाकिस्तान की सुरक्षा को खतरा है. अखबार कहता है कि अमेरिका भारत को इलाके का थानेदार बनाना चाहता है और इसके लिए उसे हर तरह के जंगी साजो-सामान मुहैया कराने के समझौते हो रहे हैं. पाकिस्तान के सैन्य और सिविल नेतृत्व को अखबार की नसीहत है कि भारत और अमेरिका को ठोस पैगाम दिया जाना चाहिए, भले ही यह पैगाम पाकिस्तान की सीमा में घुसने वाले किसी अमेरिकी ड्रोन को गिरा कर ही क्यों न दिया जाए.

परमाणु ताकत की धौंस

औसाफ कहता है कि पाकिस्तान सीरिया, इराक, लेबनान या लीबिया नहीं है, बल्कि वह एक शांतिपूर्ण एटमी ताकत है इसीलिए अमेरिका को इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि वह पाकिस्तान को दबाव में ला सकता है.

अखबार कहता है कि पाकिस्तान अपनी रक्षा खुद करना जानता है और अब 'हमारे नेतृत्व ने तय कर लिया है कि वह ना तो अमेरिकी जंग लड़ेगा और न ही अपनी सरजमीन को इस्तेमाल होने देगा.'

अखबार ने एक तरफ अमेरिका पर इस्लामिक स्टेट को पालने का आरोप लगाया है. तो दूसरी तरफ अमेरिकी धमकी को खारिज करते हुए लिखा है कि सहयोगी देशों को इस तरह से नोटिस नहीं दिए जाते हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

रोजनामा दुनिया ने अमेरिका पर दोगली नीतियां अपनाने का इल्जाम लगाया है. अखबार के मुताबिक जब अमेरिकी अधिकारी पाकिस्तान का दौरा करते हैं तो पाकिस्तान से सहयोग और मिलजुल कर आतंकवाद के खात्मे की बात करते हैं, लेकिन जैसे ही दौरा खत्म होता है तो वो सारे वादे भूल जाते हैं और पाकिस्तान पर इल्जाम की बौछार करने लगते हैं.

अखबार का कहना है कि 'यह बात हमें कतई कबूल नहीं कि आतंकवाद के खिलाफ जंग में सबसे ज्यादा जान और माल का नुकसान भी हम ही सहें और आतंकवाद को बढ़ावा देने का इल्जाम भी हम पर ही लगाया जाए.'

अखबार के मुताबिक अगर अमेरिका के पास पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों के सबूत हैं तो उनकी जानकारी साझा करे और अगर ऐसे सबूत नहीं हैं तो अमेरिका को पाकिस्तान पर ऊंगली उठाने का कोई हक नहीं है.

गीदड़ भभकी

उम्मत ने लिखा है कि सवाल यह उठता है कि क्या पाकिस्तान को अपना और पूरे क्षेत्र का हित प्यारा नहीं है जो वह आतंकवादियों को पालता फिरेगा.

अखबार कहता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की ये धमकियां गीदड़ भभकी से ज्यादा हैसियत नहीं रखतीं कि पाकिस्तान ने अगर अमेरिका से सहयोग नहीं किया तो उसे बहुत कुछ खोने के लिए तैयार रहना चाहिए.

माना जाता है कि पाकिस्तान की आर्मी ही तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को कंट्रोल करती है

पाकिस्तान को लगता है कि वो परमाणु ताकत है और उसे अमेरिका से दबने की जरूरत नहीं है

अखबार ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति पेंस के इस बयान पर भी तंज किया है कि अमेरिका सभी आतंकवादियों के खात्मे तक अफगानिस्तान में बना रहेगा. अखबार कहता है कि यह गिरती हुई दीवारों की एक ऐसे देश की तरफ से सहारा देने की कोशिश है जिसकी अपनी साख ही नहीं बल्कि ताकत और प्रभाव भी तेजी से पतन की और है.

मशरिक के मुताबिक पाकिस्तानी अधिकारियों का यह रवैया बिल्कुल दुरुस्त है कि दोस्त और सहयोगी एक-दूसरे पर इल्जाम नहीं लगाते हैं बल्कि सबूत सामने रख कर मामलों के हल के संजीदा कोशिश करते हैं.

अखबार कहता है कि बेहतर होगा कि अमेरिका, नाटो और अफगान सरकार ब्लेम गेम में पड़ने के बजाय अपनी जिम्मेदारियां पूरा करें ताकि क्षेत्र में स्थायी शांति कायम करने का रास्ता तैयार हो सके.

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