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‘जाधव ज़िंदा है’ क्या ये बताने के लिए पाकिस्तान ने मुलाकात का तमाशा किया?

एलओसी की आग को सुलगाने से बेहतर होगा कि पाकिस्तान जाधव की फांसी का खेल ज्यादा न खेले

Updated On: Dec 26, 2017 06:38 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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‘जाधव ज़िंदा है’ क्या ये बताने के लिए पाकिस्तान ने मुलाकात का तमाशा किया?

कथित जासूसी के आरोप में पाकिस्तानी जेल में बंद भारतीय कुलभूषण जाधव को लेकर पाकिस्तान ने फर्जी दरियादिली दिखाने की कोशिश की. इस्लामाबाद में विदेश मंत्रालय में कुलभूषण जाधव को उनकी मां और पत्नी से मिलने का मौका तो दिया गया लेकिन मुलाकात के तरीकों से पाकिस्तान का ड्रामा ही सामने आया. 40 मिनट की मुलाकात के बाद पाकिस्तान ने एक वीडियो भी जारी कर दिया जिसमें कुलभूषण जाधव पाकिस्तानी हुकुमत का शुक्रिया अदा कर रहे थे.

जाहिर तौर पर कुलभूषण जाधव की मानसिक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है कि वो पाकिस्तान की जेल में किस यातना के दौर से गुजर रहे होंगे. भले ही उनके लिए ये छोटी सी मुलाकात राहत का लंबा सबब लेकर आई हो लेकिन इस मुलाकात से पाकिस्तान का असली मंसूबा तो बेनकाब हो ही गया. पाकिस्तान ने जिस तरह से पूरा नाटक रचा वो सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को संदेश देने के लिए ही था.

इस मुलाकात को पाकिस्तान ने जिस तरह से पेश किया वो शर्मनाक है. 21 महीनों बाद कोई बेटा अपनी मां से मिला लेकिन वो न तो मां के पैर छू सकता था और न गले लग कर रो सकता था क्योंकि उनके दरम्यान शीशे की दीवार थी. जाधव अपनी पत्नी से सिर्फ इंटरकॉम फोन के जरिए बात कर सकते थे. यहां भी शर्त ये थी कि जाधव अपनी मां और पत्नी से मातृभाषा यानी मराठी में बात नहीं कर सकते थे.

इतना ही नहीं बल्कि इस मुलाकात को निजी बताने वाली पाक फौज ने पूरे चालीस मिनट तक कैमरों से रिकॉर्डिंग की और उसके सुरक्षा अधिकारी लगातार मुलाकात के वक्त मौजूद रहे. सवाल उठता है कि आखिर किस दिखावे के लिए कुलभूषण ने एक मां और एक पत्नी की उम्मीदों के साथ इतने बड़े फरेब को अंजाम दिया?

kulbhushan jadhav

पाकिस्तान ने मुलाकात के जरिए कुलभूषण जाधव और उनके परिवार को मानसिक तौर पर प्रताड़ित करने का ही काम किया. मां और पत्नी के न सिर्फ कपड़े बदलवाए बल्कि माथे से बिंदी और गले से मंगलसूत्र भी उतरवा लिए. हद तो ये हो गई कि जाधव की पत्नी के जूते तक पाकिस्तान ने नहीं लौटाए. जाधव की पत्नी के जूते रखकर पाकिस्तान किस साजिश रचना चाहता है?

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मुलाकात के समय भारत के डिप्टी हाईकमिश्नर को भी दूर रखा गया वहीं पाकिस्तानी मीडिया किसी मधुमक्खी के छत्ते की तरह मां और पत्नी पर जाधव को आतंकी बताने वाले सवालों के साथ टूट पड़ा. पाकिस्तान ने पूरी तरह भारत के साथ पहले से तय मुलाकात की शर्तों का खुल कर उल्लंघन किया. क्या ये अमानवीय तरीका पाकिस्तान के कट्टरपंथियों को खुश करने का तरीका नहीं?

इस मुलाकात के बाद भले ही पाकिस्तान अपनी पीठ थपथपाए लेकिन अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में तो उसने खुद को ही कठघरे में खड़ा करने का काम किया है. पाकिस्तान को जाधव के जरिए एक मौका मिला है जिसमें वो भारत के साथ अपने रिश्तों को सुधार सकता था. लेकिन जाधव के मामले में पाकिस्तान अंगारों को हवा देने का काम कर रहा है.

21 महीने से कुलभूषण जाधव पाकिस्तान की जेल में बंद हैं. कुलभूषण पर पाकिस्तान ने जासूसी का आरोप लगाया है. जबकि भारत का दावा है कि ईरान में तालिबानियों ने उनका अपहरण कर पाकिस्तान को सौंपा है. वैसे  भी जाधव की गिरफ्तारी पर सवाल तो ईरान से ही शुरू हो जाता है. अगर कुलभूषण को ईरान में गिरफ्तार किया गया तो वो पाकिस्तान कैसे पहुंचे या फिर जब वो ईरान में थे तो पाकिस्तान के लिए जासूसी कैसे कर रहे थे?

Sushma Swaraj @ UN

भारत ने पाकिस्तान के जासूसी के आरोपों का खंडन करते हुए साफ कहा था कि कुलभूषण पूर्व नौसेना अधिकारी थे जो कारोबार के सिलसिले में ईरान गए हुए थे. इसके बावजूद पाकिस्तान कुलभूषण जाधव को लेकर लगातार पैंतरेबाजी करता आ रहा है. इस बार जाधव की उनके परिवार से मुलाकात भी उसी पैंतरेबाजी का नमूना है.

21 महीने से पाकिस्तान जेल में बंद कुलभूषण जाधव को इस साल पाकिस्तान की सैन्य कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी. जिसके बाद भारत ने इस फैसले के खिलाफ ICJ यानी इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में अपील की थी. जिस पर सुनवाई करते हुए ICJ ने जाधव की फांसी पर रोक लगा दी थी. अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट ने वियना संधि के तहत जाधव को कॉन्सुलर एक्सेस देने की बात की थी.

लेकिन  कुलभूषण जाधव के लिए कॉन्सुलर एक्सेस की मांग को पाकिस्तान बार बार खारिज कर रहा है. पाकिस्तान का दोहरा रवैया ही है कि एक तरफ वो जाधव और उनकी मां-पत्नी से मुलाकात को मानवीय आधार पर दी गई इजाजत बता कर तारीफ बटोरना चाहता है तो दूसरी तरफ मां-पत्नी को कुलभूषण से कैमरों और शीशे की दीवार के पहरे में मिलने देता है.

कुलभूषण जाधव को कॉन्सुलर एक्सेस ने देने के पीछे पाकिस्तान की घबराहट साफ दिखाई देती है. उसे डर है कि इससे पाकिस्तान के कथित जासूसी के आरोपों का पर्दाफाश न हो जाए. ठीक उसी तरह जैसा कि संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी अधिकारी मलीहा लोधी की वजह से पाकिस्तान की किरकिरी हुई थी. संयुक्त राष्ट्र में मलीहा लोधी ने फिलिस्तीन के गाजा की एक घायल महिला की तस्वीर दिखाकर कश्मीर में भारतीय सेना पर अत्याचार का आरोप मढ़ा था. लेकिन दस मिनट बाद ही उस सफेद झूठ का पर्दाफाश भी हो गया था.

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यूनाइटेड नेशंस में पाकिस्तान की स्थाई प्रतिनिधि मलीहा लोधी

दरअसल कुलभूषण जाधव को फांसी की सजा सुनाकर पाकिस्तान बुरी तरह से फंस गया है. इस पर आईसीजे के दखल ने उसकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं. अब पाकिस्तान के सामने ये मजबूरी है कि उसे किसी भी हालत में कुलभूषण जाधव को गुनहगार साबित करना ही है. ऐसे में वो कुलभूषण जाधव को कॉन्सुलर एक्सेस देने से डर रहा है.

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लेकिन अगर पाकिस्तान जाधव को बिना कॉन्सुलर एक्सेस दिए ही फांसी दे देता है तो ये सुनियोजित हत्या होगी जिससे भारत और पाकिस्तान के रिश्तों पर बेहद गंभीर असर पड़ेंगे. क्योंकि बार बार कुलभूषण जाधव को कानूनी जरूरतें मुहैया कराने के लिए कह रहा है.

दरअसल पाकिस्तानी फौज का रुख ये जताने की कोशिश कर रहा है कि वो किसी भी मसले को बिना सियासी दखल के भारत के साथ निपटाने की हैसियत रखता है. पाकिस्तान का इतिहास गवाह है कि वहां लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार पर हमेशा फौज ही हावी रही है. इस बार भी कुलभूषण के मामले में पाकिस्तान की सैन्य अदालत का फैसला यही साबित करता है.

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पाकिस्तान आर्मी चीफ क़मर जावेद बाजवा (रायटर इमेज)

तमाम अंतर्राष्ट्रीय आलोचनाओं और भारतीय चेतावनी को दरकिनार कर पाकिस्तान ये संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि जाधव केवल उसकी दी हुई सांसों पर जिंदा हैं. लेकिन पाकिस्तान ये भूल रहा है कि भारत कुलभूषण को बचाने के लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार है.

भारत एलओसी पार करने में हिचकता नहीं है. पंद्रह महीने बाद फिर जरुरत पड़ने पर एक छोटी सी सर्जिकल स्ट्राइक कर भारत ने पाकिस्तान के 3 सैनिकों को ढेर कर दिया है. 48 घंटों के भीतर ही भारत ने अपने चार जवानों की शहादत का बदला ले लिया. भारत का ये ऑपरेशन पाकिस्तान को साफ इशारा है कि वो किसी दबाव में झुकने वाला नहीं. अब पाकिस्तान को ये तय करना होगा कि वो भारत-पाक रिश्तों को कहां देखना चाहता है? एलओसी की आग को सुलगाने से बेहतर होगा कि पाकिस्तान जाधव की फांसी का खेल ज्यादा न खेले और फरेब का चोगा उतारकर दोस्ती की मिसाल कायम करे. क्रिकेट मैच की तरह मिले मौके को बार बार अपनी फितरत से गंवाए नहीं. जाधव को दूसरा सरबजीत बनाने से पहले पाकिस्तान दस बार सोचे क्योंकि बदले की आग के जंग के शोले में तब्दील होने में देर नहीं लगती है.

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