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क्यों पाकिस्तान चुनाव में पार्टियों के मेनिफेस्टो से गायब हुआ कश्मीर का मुद्दा?

ये यही दिखाता है कि इन बुनियादी मुद्दों पर लड़ने की बजाय वोट के लिए अपने स्वार्थ के मुद्दों पर ज्यादा दिनों तक नहीं जीता जा सकता

FP Staff Updated On: Jul 12, 2018 01:59 PM IST

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क्यों पाकिस्तान चुनाव में पार्टियों के मेनिफेस्टो से गायब हुआ कश्मीर का मुद्दा?

25 जुलाई को पाकिस्तान की जनता अपनी अगली सरकार के लिए वोट डालने वाली है. सभी पार्टियों ने अपने चुनावी घोषणा पत्र भी जारी कर दिए हैं. हमेशा की तरह आतंकवाद, चरमपंथ से लड़ने, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और शिक्षा व्यवस्था सुधारने जैसे मुद्दे इन पार्टियों के मेनिफेस्टो में शामिल हैं. लेकिन एक बात इस बार काफी अलग है. कश्मीर का मुद्दा इन पार्टियों के मेनिफेस्टो से लगभग गायब है. कुछ पार्टियों ने कश्मीर मुद्दे पर एक-दो लाइनों से ज्यादा कुछ नहीं बोला है.

आतंकवाद और चरमपंथ पर वार लेकिन कश्मीर गायब

पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) और पाकिस्तान मुस्लिम लीग - नवाज (पीएमएल - एन) ने आतंकवाद , कट्टरपंथ और चरमपंथ को देश के लिए अभिशाप बताया है. इन पार्टियों ने अपने मेनिफेस्टो में स्वीकार किया है कि आतंकवाद और कट्टरपंथ ने उनके देश को दुनिया में अलग-थलग कर दिया है और उन्होंने वादा किया है कि सत्ता में आने पर वे इस बुराई के खिलाफ लड़ेंगे.

क्रिकेटर से नेता बने इमरान खान की पार्टी पीटीआई ने अपने चुनावी घोषणापत्र में आतंकवाद की एक बुराई के तौर पर और पाकिस्तान और देश की अवाम पर इसके विनाशकारी प्रभावों पर बात की है, इसने कहा है कि आतंकवाद से न सिर्फ पाकिस्तानी नागरिकों की बड़े पैमाने पर जानें जा रही हैं बल्कि कभी सहिष्णु रहा समाज भी असहिष्णुता, डर और नफरत में तब्दील हो रहा है. इसमें कहा गया है कि पार्टी का रुख सहिष्णुता की भावना बहाल करने और पाकिस्तान के सभी नागरिकों के बीच स्वीकार्यता के प्रति प्रतिबद्ध है.

पीटीआई ने दो बार लिया है कश्मीर का नाम

समझा जाता है कि खान की पार्टी को सेना का समर्थन मिला हुआ है. पार्टी ने कहा है कि यह एक जवाबी वैचारिक अभियान के जरिए लोगों को इन बुराइयों के खिलाफ जागरूक करने की कोशिश करेगी. पार्टी ने यह भी कहा कि वह पाकिस्तानी सरजमीं या उसके सशस्त्र बलों सहित अवाम को आतंकवाद को बढ़ावा देने या किसी अन्य देश के खिलाफ इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देगी.

लेकिन हैरानी की बात है कि पीटीआई के मेनिफेस्टो में कश्मीर का नाम बस दो बार लिया गया है. इसमें संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव की बात की गई है लेकिन इसमें एक लाइन जोड़ी गई है कि- 'सभी पड़ोसी (देशों) के लिए संघर्ष प्रस्ताव और सहयोग का सुरक्षित रास्ता  व्यवहार्य होना चाहिए.' इसके अलावा कश्मीर का जिक्र एक बार नेशनल सिक्योरिटी वाले भाग में किया गया है, जिसमें दूसरे मुद्दों पर चर्चा की गई है.

पीपीपी के लिए भी कश्मीर का मुद्दा उतना बड़ा नहीं

पीपीपी ने भी अपने मेनिफेस्टो में आतंकवाद की वजह से पाकिस्तान के वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ने की बात की है. बिलावल भुट्टो जरदारी के नेतृत्व वाली पार्टी ने कहा है कि सत्ता में लौटने पर वह आतंकवादियों के कब्जे से मुक्त कराए गए क्षेत्र को अराजक स्थानों में तब्दील नहीं होने देने को सुनिश्चित करेगी. सत्ता से बाहर चल रही पीपीपी ने अपने मेनिफेस्टो में सभी को सब कुछ देने का वादा किया है. यानी देश की जनता के साथ-साथ पड़ोसी देशों के साथ-साथ दूर के देशों को भी ध्यान में रखा है. चीन के साथ संबंधों की बात की गई है. लेकिन वहीं चर्चित चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमी कोरिडोर पर पारदर्शिता की भी बात की गई है. वहीं आतंकवाद को रोकने के लिए दबाव बना रहे अमेरिका के साथ सहयोग लेने के बजाय व्यापार करने की बात की गई है.

फ़र्स्टपोस्ट में छपे एक लेख में तारा करता ने बताया है कि पार्टी के 40 पेज के मेनिफेस्टो में कश्मीर का नाम चार बार आया है. इसमें कश्मीर के लिए 'स्वायत्ता' की बात की है लेकिन साथ ही इसमें भारत-पाकिस्तान के बीच कनेक्टिविटी और जोशीले व्यापारिक संबंधों के लिए इलाकों की पहचान भी की है.

पीएमएल-एन से कश्मीर लगभग गायब ही

पद से हटा दिए गए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन अब सत्ता में बने रहने के लिए वादे कर रही है और पिछले पांच सालों को लेकर दावे कर रही है. पार्टी का कहना है कि पिछले पांच साल में उसकी सरकार आतंकवाद से लड़ने और कट्टरपंथ के खतरे का मुकाबला करने में सफल रही है. पीएमएल-एन ने कहा है कि पार्टी का लक्ष्य चरमपंथ को शिकस्त देने, आतंकवाद का खात्मा करने, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और सभी हितधारकों के बीच शांति एवं समृद्धि का एक साझा दृष्टिकोण बनाने का है. लेकिन पार्टी ने कश्मीर का बस चलताऊ सा जिक्र किया है. मेनिफेस्टो में कश्मीर पर बस दो लाइनें लिखी गई हैं.

इसके अलावा कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी एमएमएम ने तो कश्मीर का जिक्र बिल्कुल ही नहीं किया है. इसकी वजह इसके अधिकतर वोटर्स का बलोचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा से होना हो सकता है. लश्कर-ए-तैय्यबा पार्टी के अलावा कुछ छोटी और कमजोर पार्टियां ऐसी हैं, जिन्होंने भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने मेनिफेस्टो में शामिल किया है.

इस बात से एक चीज साफ हो गई है कि पाकिस्तानी लोगों के लिए कश्मीर उतना अहम नहीं, जितना ये नेता बताते रहे हैं. कश्मीर हमेशा पाकिस्तानी सेना के निशाने पर रहा है, जिसे नेता भुनाते रहे हैं. किसी भी देश के लिए शांति का रास्ता उसकी आर्थिक स्थिरता, बेहतर शिक्षा व्यवस्था और खुशहाल नागरिकों से आता है. कश्मीर-कश्मीर की रट लगाने वाली पाकिस्तानी पार्टियों ने अपने मेनिफेस्टो में इस मुद्दे की बजाय आतंकवाद से लड़ने, आर्थिक विकास और शिक्षा को शामिल किया है, ये यही दिखाता है कि इन बुनियादी मुद्दों पर लड़ने की बजाय वोट के लिए अपने स्वार्थ के मुद्दों पर ज्यादा दिनों तक नहीं जीता जा सकता.

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