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पाकिस्तान आम चुनाव: 25 जुलाई को वोटिंग से पहले खुलकर हो रही है धांधली

Updated On: Jul 17, 2018 10:52 PM IST

Umer Ali

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पाकिस्तान आम चुनाव: 25 जुलाई को वोटिंग से पहले खुलकर हो रही है धांधली

पाकिस्तान में 25 जुलाई को आम चुनाव निर्धारित हैं. चुनाव में सभी राजनीतिक दल जोर आजमाइश में जुटे हुए हैं. लेकिन चुनाव की तैयारियों के बीच पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने आरोप लगाया है कि आने वाले चुनावों के परिणामों को धांधली के द्वारा बदलने की खुल्लम खुल्ला और आक्रामक तरीके से कोशिश की जा रही है.

ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान (एचआरसीपी) देश की एक प्रतिष्ठित संस्था है और उसका आगामी चुनावों को लेकर दिया गया तल्ख बयान मायने रखता है. पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने अपने इस बयान के बाद बकायदा एक प्रेस कांफ्रेस का भी आयोजन किया और उसमें भी अपने आरोप दोहराए.

पाकिस्तान में आम चुनाव में दो हफ्ते से भी कम का वक्त बचा है लेकिन चुनाव से पहले की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से पाक का मानवाधिकार आयोग संतुष्ट नहीं है. आयोग का कहना है कि अब चुनावों की वैधानिकता पर शक करने की कई वजहें हैं.

चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल

एचआरसीपी के बयान से पहले भी पूर्व सत्ताधारी दल पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज भी चुनावों में धांधली के खिलाफ अवाज उठा चुकी है. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने भी चुनावों में निष्पक्षता को लेकर अपनी आवाज बुलंद की है. पाकिस्तान के इन प्रमुख राजनीति दलों का आरोप है कि उनके पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव से हटने के लिए दबाव बनाया जा रहा है.

एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने सीधे सीधे इंटर सर्विसेज इंटेंलीजेंस (आईएसआई) के एक अधिकारी पर आरोप लगाते हुए कहा है कि वो अधिकारी उनकी पार्टी के खिलाफ अभियान चला रहा है. नवाज शरीफ का ये बयान इसलिए मायने रखता है क्योंकि पूर्व पीएम ने सीधे सीधे सत्ता प्रतिष्ठान के एक अधिकारी के खिलाफ आरोप लगाया है और वो भी सार्वजनिक रुप से.

मुल्तान के दक्षिणी पंजाब शहर से नवाज की पार्टी पीएमएल (एन) के उम्मीदवार राणा इकबाल सिराज ने आरोप लगाया कि इंटेलीजेंस ऐजेंसी के एक अधिकारी ने उन्हें केवल इसलिए प्रताड़ित किया क्योंकि उन्होंने उस अधिकारी की ये बात मानने से इंकार कर दिया कि वो नवाज की पार्टी के टिकट पर चुनाव न लड़ें. सिराज का आरोप है कि उनके इंकार के बाद उनके फर्टिलाइजर स्टोर पर आईएसआई ने छापा भी मारा. सिराज के आरोप के कुछ ही दिन बाद नवाज ने भी आईएसआई के एक अधिकारी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

Pakistan General Election 2018

डान अखबार ने सिराज मामले को अखबार में छापा है. डान ने सिराज के हवाले से लिखा है कि उन्होंने धमकी दी है कि उनकी बात नहीं मानने पर वो मेरे बिजनेस को ध्वस्त करने के साथ साथ परिवार को भी नुकसान पहुंचाने से पीछे नहीं हटेंगे.

लेकिन इस पूरी घटना की कहानी सुनाते हुए उनके वीडियो के वायरल होने के महज एक दिन बाद ही वो अपने बयान से पलट गए. सिराज ने बाद में दावा किया कि उनके प्रतिष्ठान पर रेड कृषि विभाग ने छापा मारा था और उन्होंने पहले वाले आरोप गलती से लगाए थे.

इधर डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर ने सिराज के आरोपों से किनारा कर लिया है लेकिन सिराज के बयान बदल लेने के बाद पाकिस्तान के सोशल मीडिया में खूब मजाया उड़ाया जा रहा है.

दस जुलाई को कुछ इसी तरह का आरोप पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के पूर्व सीनेटर फरहतुल्ला बाबर ने भी लगाया. बाबर का कहना था कि लगभग सभी प्रांतों में उनके उम्मीदवारों को धमकाया जा रहा है और उन्हें पार्टी छोड़ने के लिए या फिर निर्दलीय चुनाव लड़ने के लिए कहा जा रहा है.

बाबर ने कहा कि पार्टी के कम से कम तीन वरिष्ठ सदस्यों ने आधिकारिक रूप से पार्टी नेतृत्व को खत लिखकर कर बताया है कि सुरक्षा ऐजेंसियों के कुछ अधिकारी उनपर दबाव डालने के अलावा उनको धमका रहे हैं. अपने आरोपों को प्रेस कांफ्रेस में दोहराते हुए उन्होंने कहा कि विवादों और धांधली के बीच सत्ता के हस्तांतरण के बीज पहले ही पड़ चुके हैं. बाबर पहले ही नागरिक-सेना के बीच के संबंधों पर सैद्धांतिक विचारों के लिए जाने जाते रहे हैं.

पीपीपी के को-चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी भी चुनावी रैलियों में उनके शिरकत करने पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर हैरानी जता चुके हैं.

राजनीतिक पार्टियों को दबाया जा रहा है

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने कुछ चुनिंदा राजनीतिक दलों को जानबूझ कर दबाए जाने की निंदा की है. एचआरसीपी ने अपने बयान में कहा है कि देश की दो मुख्य पार्टियों पीएमएल-एन को पंजाब में और पीपीपी को सिंध में विपक्षी दलों से घेरने के लिए कृत्रिम रुप से तैयारी की जा रही है.

पाकिस्तान के दोनों प्रमुख दलों पीपीपी और पीएमएलएन के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनके उम्मीदवारों को धमकी और डर से बचाने की है. पीपीपी के लिए सिंध प्रांत काफी मायने रखता है क्योंकि अन्य प्रांतो में पार्टी का ग्राफ काफी तेजी से गिरा है. उसी तरह से पीएमएलएन के लिए सबसे ज्यादा महत्व वाला प्रांत पंजाब है क्योंकि पिछले दो चुनावों में पार्टी को सबसे ज्यादा वोट इसी इलाके से मिला है.

ऐसे में इन दोनों पार्टियों के लिए रणनीतिक रुप से महत्वपूर्ण प्रांतो में अगर चुनाव परिणामों में गड़बड़ी होती है तो अंतिम चुनाव परिणामों में इनकी टैली पर जबरदस्त असर पड़ सकता है. खास करके पीएमएलएन के लिए दक्षिणी पंजाब का इलाका काफी महत्वपूर्ण है और उनके लिए यहां चुनाव जीतना जरुरी है, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा परेशान यहीं पर किया जा रहा है.

इन इलाकों में निर्दलीय उम्मीदवार पूर्व सत्ताधारी दल के उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं. इन मजबूत निर्दलीय उम्मीदवारों को कई तरफ से समर्थन मिल रहा है. बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इमरान खान की पीटीआई अब अच्छी संख्या में सीटें जीतने की स्थिति में है. विश्लेषकों को ये लगता है कि कुछ छोटी पार्टियों और निर्दलीय के साथ पीटीआई चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद सरकार बनाने की सबसे मजबूत दावेदार बन के उभर सकती है. लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान को डर है कि कहीं इसका विकल्प न सामने आ जाए.

PMLN और PPP की घट रही हैं दुनिया 

हाल के दिनों में पीएमएलएन और पीपीपी के बीच की दूरियां तेजी से घटी हैं क्योंकि इन दोनों दलों ने चुनाव पूर्व धांधली की आशंका जतायी है. ऐसे में ये संभव है कि कुछ अन्य दलों के साथ देश के दो मुख्य दल एक साथ आकर गठबंधन सरकार का गठन कर लें.

सीनेट चुनाव,जिसमें पीपीपी ने पीटीआई की मदद थी, उसके बाद विश्लेषकों को लगा कि सेना के माध्यम से पीपीपी और पीटीआई के बीच गठबंधन सरकार बन सकती है लेकिन जिस तरह से पीपीपी के को-चेयरमैन आसिफ अली जरदारी और बहन फरयाल तालपुर को एक्सिट कंट्रोल लिस्ट में डाल दिया गया है उससे पीपीपी सेना से बिदक गयी है. ऐसे में इन दोनों के बीच गठबंधन सरकार दूर की कौड़ी लगती है.

चुनाव के दिन मतदान केंद्रों पर लगभग 3,75,000 सेना के जवानों को लगाया जा रहा है और सेना के अधिकारियों को फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए जा रहे हैं. ऐसे में चुनाव परिणाम में धांधली की संभावना प्रबल होती जा रही है.

सेना को चुनाव के लिए असाधारण अधिकार दिए जाने को लेकर एचआरसीपी ने सही कहा है कि 'इस तरह का अधिकार दिया जाना उस संस्था के लिए, जो कि एक ऐसे कार्यक्रम को माइक्रोमैनेज कर रहा है जिसे नागरिकों के द्वारा किया जाना चाहिए,घातक साबित हो सकता है.'

पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मार्वी सिरमेद का मानना है कि सरकार किसी भी बने लेकिन सेना का लक्ष्य होगा कि केंद्र की सरकार कमजोर बने और वो ऐसी स्थिति में न हो कि वो कोई मजबूत निर्णय ले सके. उनका कहना है कि “गठबंधन चाहे कोई हो उनका लक्ष्य होगा कि किसी को भी पूर्ण बहुमत नहीं मिले और जनादेश खंडित हो. ऐसे में अगर सरकार छोटी पार्टियों और निर्दलियों के सहारे बनी तो उस सरकार को जरुरत के हिसाब से ब्लैकमेल और अस्थिर करके गिराने का सेना के पास पूरा मौका होगा.' फिलहाल मिलिट्री इस्टेब्लिशमेंट किसी पर भी पूरा भरोसा करने से बच रहा है चाहे वो इमरान खान हों या कोई और.

सिरमेद के मुताबिक 'पीपीपी के कार्यकाल में उदाहरण के तौर पर कुछ संवैधानिक बदलाव किए गए थे जिससे लोगों को और स्वायत्ता का अधिकार मिल सका. लेकिन सरकार का ये कदम सेना को बिल्कुल नहीं अच्छा लगा था ऐसे में भविष्य में इस तरह की परिस्थितियों से बचने की कोशिश आर्मी पहले ही कर रही है.'

चुनाव में अब महज एक सप्ताह का ही समय रह गया है ऐसे में ये देखना दिलचस्प है कि चुनाव पूर्व धांधली को लेकर पीएमएलएन और पीपीपी एक दूसरे के कितने करीब आते हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में चुनावों में विवाद, विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक पैंतरेबाजी दिखाई दे तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा.

(इस लेख के लेखर उमर अली एक पत्रकार हैं जो कि जर्मनी के बर्लिन से हैं. ये पाकिस्तान में मानवाधिकार,संघर्ष और सेंसरशिप पर लिखते रहे हैं. इनसे ट्विटर पर @iamumer1 संपर्क किया जा सकता है)

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