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पाकिस्तान चुनाव: सेना-न्यायपालिका ने किया मीडिया का गला घोंटने का प्रयास

ब देखने वाली बात ये होगी कि लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ अब ‘नए पाकिस्तान’ में किस तरह से काम करेगा. हमें इस बात पर करीब से नजर रखनी पड़ेगी कि इमरान खान ने नेतृत्व में मीडिया को किस तरह की आजादी मिलती है.

Updated On: Jul 27, 2018 08:15 PM IST

Ghulam Rasool Dehlvi

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पाकिस्तान चुनाव: सेना-न्यायपालिका ने किया मीडिया का गला घोंटने का प्रयास

पकिस्तान में हुए आम चुनाव को लेकर सभी को उत्सुकता थी. खास करके अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी पाकिस्तान चुनावों पर अपनी नजर गड़ाए हुए था. लेकिन इसके ठीक उलट पाकिस्तान की घरेलू मीडिया की सेहत चुनावों को लेकर खराब हो रही थी. उन्हें चुनाव के दौरन धमकी, अपहरण और प्रताड़ना झेलनी पड़ रही थी.

मीडिया को निशाना बनाकर प्रताड़ित करने की शुरुआत वहां के जर्नलिस्ट मतिउल्ला जान के लिखे उस आर्टिकल के बाद हुई जिसमें उन्होंने देश की सेना और न्यायपालिका के क्रियाकलापों की कड़ी आलोचना की थी. इसके बाद पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने एक प्रेस कांफ्रेस की और उसमें उन्होंने आरोप लगाया कि देश के कुछ मुट्ठी भर पत्रकार और ब्लागर देश विरोधी और सेना विरोधी हैं. और जल्द ही जैसा कि पाकिस्तान टुडे ने गुरुवार को लिखा कि पाकिस्तान की मुख्यधारा की मीडिया के लेखकों और विचारकों को भी इसी तरह के आरोपों से रंग दिया गया.

पाकिस्तान के आम चुनावों से पहले पाकिस्तानी आर्मी ने देश के मुख्य मीडिया घरानों, रिपोर्टरों और कॉलमनिस्टों पर नकेल कसनी शुरू की. खास करके जो पत्रकार डॉन ग्रुप, जियो न्यूज और जंग ग्रुप से जुड़े हुए थे उन्हें सबसे पहले टारगेट किया गया. पाकिस्तान के इन प्रमुख मीडिया हाउसेस से कहा गया कि वो अनिवार्य रूप से कुछ कॉलमनिस्टों को अपने पैनल से हटाएं और साथ में कुछ आर्टिकल्स को भी हटाएं.

देश के सर्वाधिक प्रसार पर वाले उर्दू अखबार जंग को कैंटोनमेंट एरिया में बांटने पर प्रतिबंध लगा दिया गया वहीं जंग और डॉन ग्रुप के टेलीविजन चैनलों को कई जगह पर ब्लैक आउट कर दिया गया. सेना की इस चाल के बाद कुछ लोगों ने सेना से समझौता कर लिया लेकिन कुछ ने अपनी शिकायत लोगों के सामने रखना उचित समझा.

यहां पर पाकिस्तान के सबसे बड़े दैनिक अंग्रेजी अखबार डॉन की कहानी को सामने रखना दिलचस्प होगा. 2016 से इस मीडिया आउटलेट और इसके कर्मचारियों के खिलाफ एक परेशान करने वाली कहानी की शुरुआत हुई थी. अखबार पर दबाव और ज्यादा बढ़ गया जब पिछले महीने देश के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अखबार को दिए एक इंटरव्यू में स्वीकार कर लिया था कि 2008 में हुए मुंबई आतंकवादी हमलों में पाकिस्तानी आतंकवादियों का हाथ था.

Nawaz Sharif

इसके बाद से डॉन अखबार का डिस्ट्रिब्यूशन हैरतअंगेज तरीके से पाकिस्तान के कई इलाकों में जबरदस्त रूप से गिर गया. हाल ही में संपन्न हुए चुनाव के दौरान तो अखबार में और विकट स्थिति उत्पन्न हो गयी. इस अंग्रेजी अखबार को सैन्य इलाकों में प्रतिबंधित कर दिया गया. कई जगहों पर अखबार की कॉपियों को जब्त कर लिया गया और इस अखबार बेचने वालों को प्रताड़ित किया गया.

लेकिन इन घटनाओं के बाद भी डॉन पीछे नहीं हटा और उसने इन घटनाओं से अपने पाठकों को रूबरू करवाया. अभी हाल ही में अखबार ने अपने संपादकीय में लिखा कि इस अखबार पर लगातार निशाना साधा जाता रहा है वो भी बड़े पैमाने पर और समन्वय के साथ. जिसमें कई जगहों पर इसके डिस्ट्रीब्यूशन को बंद कर दिया जाना शामिल है. लेकिन डॉन ने इसके आगे अपने पुराने दिनों को याद करते हुए लिखा है कि किस तरह से उसके सामने पहले भी कई चुनौतियां आ चुकी हैं और सभी का उसने डटकर सामना किया है और इस बार भी वो इन चुनौतियों का सामना साहस और धैर्य के साथ ही करेगा.

संपादकीय में अखबार की तरफ से लिखा गया है, 'झूठी कहानियों, अपमान, निंदा, नफरत और हिंसा के लिए भड़काने वाली बातों के सहारे डॉन अखबार और इसके कर्मियों के खिलाफ कैंपेन चलाया गया. ऐसे में ये जरुरी था कि इन मामलों को लोगों के सामने लाया जाए जिससे की ये बातें हमेशा रिकॉर्ड में रहे.'

गौर करने वाली बात ये है कि यहां डॉन कि स्थिति पाकिस्तान की लिबरल मीडिया और पाकिस्तानी हुक्मरानों के बीच गंभीर वैचारिक मतभेद को दर्शाती है. वैसे अखबार के ताजा आरोप कई अन्य परिणामों से भी मेल खाते हैं. उदाहरण के लिए ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान (एचआरसीपी) ने भी चुनाव से पहले मीडिया से जुड़े लोगों के खिलाफ सोच समझ कर कर प्रताड़ित करने की नीति की कड़े शब्दों में आलोचना की थी.

अपने अधिकारिक ट्वीट में एचआरसीपी ने फटकार लगाते हुए कहा, 'यहां पर फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन को दबाने के लिए सुनियोजित तरीके से प्रेस एडवाइस, धमकी और प्रताड़ना का सहारा लिया जा रहा है.' पाकिस्तान में ये सब कथित रूप से सेना के इशारे पर गुप्तचर एजेंसियां कर रही हैं जिससे कई मीडिया हाउस प्रबंधन और उनसे संबंधित पत्रकार विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं.

23 जुलाई को एचआरसीपी ने उन पत्रकारों के अनुरोध पर एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें उन पत्रकारों ने कमीशन के सामने पिछले कुछ महीनों में अभिव्यक्ति की आजादी में हस्तक्षेप किए जाने कि शिकायत की थी. इन शिकायतों में डॉन प्रबंधन का आरोप भी शामिल था जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि गैरकानूनी तरीके से देश के कई हिस्सों में उनके अखबार के वितरण में अवरोध पैदा किया जा रहा है. संक्षेप में कहें तो, इस रिपोर्ट में प्रिंट और ब्रॉडकास्ट मीडिया के डिस्ट्रीब्यूशन पर प्रतिबंध और इससे उनके बिजनेस पर पड़ते प्रभाव, पाकिस्तानी मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक, प्रेस एडवाइस, धमकी, घूस और अनुचित समर्थन जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला गया था.

इसी तरह से कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्टस (सीपीजे) ने भी लिखा कि वो पत्रकार जो कि मिलट्री या फिर उनसे जुड़े प्रबंधन की आलोचना करते हैं उन्हें किस तरीके से अगवा किया जाता है और उन पर शासन द्वारा हमला किया जाता है. सीपीजे ने ये संकेत दिए कि आर्मी के प्रवक्ता ने मीडिया से जुड़े कई लोगों पर झूठे आरोप लगा दिए कि वो देश विरोधी और सेना विरोधी जैसे प्रोपेगेंडा में लगे हुए हैं. सीपीजे ने ये भी सुबूत दिए कि किस तरीके से देश के दो सबसे बड़े प्रसार वाले मीडिया हाउसेस जियो टीवी का प्रसारण और डॉन अखबार का वितरण कई जगहों पर बाधित किया गया.

सीपीजे एशिया की रिसर्च एसोसिएट आलिया इफ्तिखार ने 20 जुलाई को लिखा, 'देश के मीडिया रेगुलेटर ने इस महीने सभी न्यूज चैनलों को एक बायन जारी करके चेतावनी दी है कि वो किसी भी राजनीतिक नेतृत्व या नेता की उस बात का प्रसारण न करें जिसमें उस नेता ने देश के वैधानिक संस्थानों खास करके न्यायपालिका और सेना के खिलाफ विचार रखे हों या आलोचना की हो.'

‘दी न्यूज’ से जुड़े हुए वरिष्ठ पत्रकार अहमद नूरानी ने सीपीजे को बताया कि कुछ मीडिया हाउसेस को ‘कुछ लोगों’ से ये निर्देश मिले हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से जुड़े ऐसे किसी मामले को कवर न किया जाए जिसमें शरीफ को समर्थन मिलता हुआ दिखे या फिर सेना और न्यायपालिका के विरोध में हो. लेकिन इन सबके बावजूद पाकिस्तान के स्वतंत्र पत्रकारों और गैर लाभकारी ह्यूमन राइट्स आर्गनाइजेशन्स को सबसे ज्यादा चिंता में डाला है देश के न्यायपालिका के रोल ने, जिसने देश में डर का माहौल बनाने का विरोध नहीं किया. न्यायपालिका ने उत्पीड़न की शिकायतों के खिलाफ एक्शन नहीं लिया. इन्हें लगता है कि ज्यूडिशियरी ने खुद ही अपने आपको सेल्फ सेंसरशिप के मोड में डाल लिया है.

निश्चित रूप से ये घटनाएं पाकिस्तानी न्यायपालिका की विषादपूर्ण तस्वीर पेश करती हैं क्योंकि इनके पास ताकत थी कि वो मामलों को खुद से उठा सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा किया नहीं. और सबसे बुरा ये कि उल्टे वो उन लोगों को कानूनी कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं जो कि सेना और न्यायपालिका के फैसले पर सवाल उठाने की कोशिश कर रहे हैं.

एचआरसीपी की रिपोर्ट कहती है, 'कई प्रिंट और टेलीविजन के पत्रकारों ने कहा है कि निर्देशों को नहीं मानने का सामान्य परिणाम ये होता है कि अंजान सोशल मीडिया अकाउंट और सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स से उनके चरित्र पर सवाल खड़ा किया जाता है जो कि धीरे-धीरे इतना बढ़ जाता है कि मीडियाकर्मियों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने लगता है और महिलाओं के मामले में उन्हें बलात्कार की धमकी मिलने लगती है.'

इस्लामाबाद में रहने वाले पत्रकार सईद शाह ने अमेरिका के ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ में एक आर्टिकल लिखा है जिसमें उन्होंने विस्तार से लिखा है कि किस तरह से पाकिस्तान में मीडिया को सेना के द्वारा सुनियोजित तरीके से साजिश के तहत निशाने पर रखा जा रहा है. शाह ने लिखा है, 'आलोचकों का कहना है कि 25 जुलाई के चुनावों से पहले सेना कि ये चाल सत्ता पर अधिक पकड़ रखने की कवायद का हिस्सा भर है जिससे कि चुनाव के बाद जो सरकार बने वो उसके इशारों पर नाच सके.'

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जर्मनी के बर्लिन में रहने वाले एक और पाकिस्तानी लेखक उमेर अली ने चुनाव से एक दिन पहले इसी तरह की आशंका जताई थी. अली का मानना था कि जैसे पाकिस्तान में चुनाव की शुरुआत हुई सेना ने मीडिया पर नकेल कसना शुरू कर दिया. अली ने लिखा था, 'वोट का अधिकार, शांतिपूर्ण चुनाव, और पारदर्शिता, ये सब निष्पक्ष चुनाव के महत्वपूर्ण अवयव है. इनके अलावा स्वतंत्र मीडिया भी निष्पक्ष चुनाव का एक महत्वपूर्ण अंग है लेकिन बहुत से पाकिस्तानी मानते हैं इस पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है.'

अगर हम पाकिस्तान में बढ़ रही राजनैतिक अस्थिरता की नजर से वहां पर प्रेस के काम करने के तौर तरीकों पर नजर डालेंगे तो पता चलेगा कि वहां पर मीडियाकर्मियों के लिए इस तरह के हालात नए नहीं हैं. पाकिस्तानी जर्नलिस्ट इससे पहले भी इस तरह की परेशानी और प्रताड़ना झेलते रहे हैं यहां तक कि अभी कि स्थिति से भी ज्यादा वो पहले भी झेल चुके हैं. इससे पहले के चुनावों में भी जिन मीडियाकर्मियों ने सेना की आलोचना करने का साहस दिखाया उन्हें अगवा किया गया, धमकाया गया और प्रताड़ित किया गया.

सेना शुरू से ही देश की घरेलू और विदेश नीतियों के बारे में लिखे जाने को लेकर बेहद संवेदनशील रही है. लेकिन अब देखने वाली बात ये होगी कि लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ अब ‘नए पाकिस्तान’ में किस तरह से काम करेगा. हमें इस बात पर करीब से नजर रखनी पड़ेगी कि इमरान खान ने नेतृत्व में मीडिया को किस तरह की आजादी मिलती है.

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