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पाकिस्तान डायरी: सऊदी-चीन को साथ लेकर अमेरिका से पंगा ले पाएंगे इमरान खान?

हमेशा की तरह, चीन की शान में कसीदे पढ़ने के साथ-साथ पाकिस्तान अखबार सऊदी अरब का गुणगान भी कर रहे हैं, जहां का दौरा हाल में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने किया

Updated On: Oct 01, 2018 10:42 AM IST

Seema Tanwar

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पाकिस्तान डायरी: सऊदी-चीन को साथ लेकर अमेरिका से पंगा ले पाएंगे इमरान खान?

रस्सी तो कब की जल गई, लेकिन बल हैं कि जाते ही नहीं. यही हालत है पाकिस्तान की, जो आर्थिक मदद के लिए हाथ फैलाने को मजबूर है, लेकिन अमेरिका को आंख भी दिखाता है. इसीलिए पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के इस बयान की खूब चर्चा हो रही है कि अमेरिका अगर नए दोस्त ढूंढ रहा है तो पाकिस्तान के पास भी विकल्पों की कमी नहीं.

हमेशा की तरह, चीन की शान में कसीदे पढ़ने के साथ-साथ पाकिस्तान अखबार सऊदी अरब का गुणगान भी कर रहे हैं, जहां का दौरा हाल में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने किया. दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के अखबार जब भी अमेरिका को कोसते हैं, तो पता लगाना मुश्किल होता है कि वे अमेरिका की बेरुखी से ज्यादा परेशान है या फिर भारत और अमेरिका के मजबूत होते रिश्तों से.

सऊदी अरब से उम्मीदें

नवा ए वक्त’ ने लिखा है कि भारत और अमेरिका का गठजोड़ ही पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए खतरा है. अखबार की राय में, जब तक अमेरिका नहीं चाहेगा, तब तक पाकिस्तान की पूर्वी सीमा (भारत पाकिस्तान सीमा) असुरक्षित ही रहेगी और अमेरिका की नीति में जल्द किसी बदलाव की उम्मीद नहीं है.

ऐसे में, अखबार ने शाह महमूद कुरैशी के बयान को दुरुस्त करार देते हुए लिखा है कि अमेरिका नए दोस्त तलाश रहा है तो पाकिस्तान के पास भी विकल्प मौजूद हैं. अखबार के मुताबिक, इन्हीं विकल्पों को पाकिस्तान की विदेश नीति का आधार बनाना होगा.

अखबार ने सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के चीन दौरे और प्रधानमंत्री इमरान खान के सऊदी अरब दौरे का जिक्र करते हुए लिखा है कि देश का सैन्य और सिविल नेतृत्व देश की रक्षा के तकाजों को पूरा करने और उसे आर्थिक प्रगति के रास्ते पर ले जाने के लिए एकजुट है.

रोजनामा ‘खबरें’ लिखता है कि सऊदी अरब के दौरे में जो बातें हुई, उससे कई गलतफहमियां दूर हुई और पाकिस्तान को आर्थिक मदद का संकेत मिलने के साथ साथ सऊदी अरब ने चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर परियोजना में साझेदारी की इच्छा भी जताई है. अखबार लिखता है कि अमेरिका के दोस्त सऊदी अरब की तरफ से यह उसके लिए कोई अच्छा संदेश नहीं है. अखबार के मुताबिक इस मेगा प्रोजेक्ट में सऊदी अरब की भागीदारी को पाकिस्तान की बड़ी राजनयिक कामयाबी बताया गया है और चीन का मीडिया इसका बढ़ चढ़ कर जिक्र कर रहा है.

अखबार सऊदी अरब की तरफ से भागीदारी के संकेत मात्र से ही गदगद है और कहता है कि सऊदी अरब के बाद कुछ और मुस्लिम देश भी कोरिडोर परियोजना में निवेश कर सकते हैं.

अमन की राह मुश्किल 

वहीं रोजनामा ‘एक्सप्रेस’ ने प्रधानमंत्री इमरान खान के खाड़ी देशों के दौरे और सेना प्रमुख के चीन के दौरे का जिक्र करते हुए लिखा है कि देश को राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर सक्रिय और मजबूत डिप्लोमैसी की जरूरत है. अखबार कहता है कि दुनिया पाकिस्तान के बारे में जिन नकारात्मक ख्यालों को लेकर बैठी है, उन्हें दूर करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की सॉफ्ट इमेज को बेहतर करने की जरूरत है.

साथ ही अखबार ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिस्सा लेने न्यूयॉर्क गए पाकिस्तानी विदेश मंत्री कुरैशी के इस बयान को तवज्जो दी है कि भारत के साथ जंग कोई विकल्प नहीं है और समस्याएं सिर्फ बातचीत से ही हल की जा सकती हैं. अखबार की राय में, काश दुनिया पाकिस्तान के इस नजरिए पर ध्यान दे ताकि क्षेत्र में शांति और स्थिरता का सपना पूरा हो सके.

लेकिन रोजनामा ‘पाकिस्तान’ लिखता है कि अगर भारत बातचीत के लिए तैयार नहीं तो फिर कैसे शांति का सपना सच होगा? अखबार कहता है कि भारत के सेना प्रमुख कभी पाकिस्तान को जंग की धमकी देते हैं तो कभी सर्जिकल स्ट्राइक की, बावजूद इसके पाकिस्तान जंग को विकल्प नहीं मानता. साथ ही अखबार ने अमेरिका की तरफ से भारत को अफगानिस्तान में नई भूमिका देने पर आपत्ति जताते हुए लिखा है कि ताकत के जोर पर कभी अमन कायम नहीं हो सकता.

बदहाल अर्थव्यवस्था

दूसरी तरफ ‘जसारत’ ने आर्थिक मोर्चे पर प्रधानमंत्री इमरान खान को आड़े हाथ लिया है. अखबार ने ‘अर्थव्यवस्था ऑपरेशन थिएटर में’ शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखा है कि नई सरकार को समझ नहीं आ रहा है कि अर्थव्यवस्था को कैसे संभाले. अखबार कहता है कि इस नाकामी पर आलोचना इसलिए भी ज्यादा हो रही है क्योंकि सत्ता में आने से पहले इमरान खान उठते बैठते उस वक्त के हुक्मरानों को लगातार निशाना बनाते थे और उन्हें महंगाई का जिम्मेदार करार देते थे, लेकिन खुद सत्ता में आने के एक महीने के भीतर ही उनकी सरकार ने गैस की कीमतों में बेतहाशा इजाफा कर दिया, बिजली की कीमतें बढ़ा दीं और अब पेट्रोलियम उत्पादों के दामों में इजाफे का प्रस्ताव दिया जा रहा है.

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