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पाकिस्तान में आम चुनाव: इस बार पूरा होगा इमरान खान का सपना?

पाक मीडिया में तहरीक ए इंसाफ पार्टी के मुखिया इमरान खान का पहले 100 दिन का प्लान छाया हुआ है, जिनमें उन्होंने बताया है कि सत्ता में आए तो क्या-क्या करेंगे.

Updated On: May 23, 2018 02:29 PM IST

Seema Tanwar

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पाकिस्तान में आम चुनाव: इस बार पूरा होगा इमरान खान का सपना?

पाकिस्तान में आम चुनाव की सरगर्मियां तेज हो रही है. ऐसे में, पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में क्रिकेट से राजनेता बने और तहरीक ए इंसाफ पार्टी के मुखिया इमरान खान का पहले 100 दिन का प्लान छाया हुआ है, जिनमें उन्होंने बताया है कि सत्ता में आए तो क्या-क्या करेंगे. पचास लाख सस्ते मकान, एक करोड़ नौकरियां, टैक्सों में कमी और बिजली-गैस सस्ता करने जैसे लोकलुभावन वादों की इमरान खान ने झड़ी लगा दी है. लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने की उनकी हरसत इस बार पूरी होगी. कोई उनकी इस हसरत को शेख चिल्ली के सपनों से जोड़ रहा है तो कहीं कई अखबार कह रहे हैं कि इमरान खान को शायद अब भी पाकिस्तान के जमीनी हालात का सही से अंदाजा नहीं है.

सपने देखने का हक

रोजनामा ‘दुनिया’ लिखता है कि तहरीक ए इंसाफ ने जो 100 दिन का प्लान पेश किया है उसमें सरकार के तौर तरीकों में पूरी तरह बदलने पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है. अखबार के मुताबिक प्लान के अन्य बिंदुओं में पाकिस्तान की स्थिरता, अर्थव्यवस्था की बहाली, कृषि का विकास, जल संरक्षण, सामाजिक सेवाओं में क्रांति और राष्ट्रीय सुरक्षा को अहमियत देना शामिल है.

अखबार कहता है कि प्लान में सारी बातें अच्छी हैं जिन पर अमल हो तो पाकिस्तान में गुड गवर्नेंस आ सकती है, लेकिन स्थिति इतनी भी सीधी साधी नहीं है जितनी तहरीक ए इंसाफ ने समझ ली है. अखबार के मुताबिक, इमरान खान ने वादा तो कर दिया, लेकिन यह नहीं बताया है कि वह एक करोड़ नौकरियां देंगे कैसे. अखबार कहता है कि चुनाव के बाद न तो सत्ता में आने वाले अपने घोषणापत्र पढ़ते हैं और न ही उनकी आलोचना करने वाले, फिर भी पार्टियों को घोषणापत्र जारी करने चाहिए ताकि लोगों को बेहतर सरकार चुनने में मदद मिले.

‘उम्मत’ ने इमरान खान के चुनावी वादों और सत्ता में आने की तमन्नाओं पर लिखा है कि सपने देखने का हक सभी को है. अखबार की टिप्पणी है कि इमरान खान 2018 के आम चुनाव से पहले उसी तरह प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं जैसे वह 2013 के चुनाव से पहले दिन रात देखा करते थे. अखबार की राय में, उन्हें किसी ने इस खुशफहमी में डाल दिया है कि जिन ताकतों ने नवाज शरीफ को पद से हटवाकर आजीवन अयोग्य करार दिया है, वहीं ताकत चुनाव में तहरीक ए इंसाफ को जितवा कर इमरान को प्रधानमंत्री बनवा देंगी.

अखबार लिखता है कि खैबर पख्तून ख्वाह प्रांत में तहरीक ए इंसाफ की सरकार ने बीते पांच साल में खुशहाली और तरक्की के सारे सपनों को चूर चूर कर दिया, बावजूद इसके पार्टी के नेता चाहते हैं कि जनता उनकी पीठ ठोंके. अखबार का तंज है कि सपने देखने का हक तो शेख चिल्ली से भी नहीं छीना जा सकता, फिर इमरान खान तो सपनों से जग भी जाते हैं और काफी कुछ देख भी सकते हैं.

कितने वादे पूरे किए

‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी कई बार केंद्र की सत्ता में आ चुकी हैं और जनता उनके घोषणापत्र, नजरिए और काम को बखूबी देख चुकी है, लेकिन तहरीक ए इंसाफ अभी तक सिर्फ खैबर पख्तूनख्वाह तक सीमित रही है और इसलिए जरूरी था कि वह राष्ट्रीय स्तर पर जनता के सामने अपने घोषणापत्र को रखती.

अखबार कहता है कि देश और समाज की तरक्की और खुशहाली वाला ऐसा घोषणापत्र हर राजनीति पार्टी को पेश करना चाहिए लेकिन सवाल यह है कि क्या पार्टियों में इन्हें पूरा करने की क्षमता भी है या फिर वे सिर्फ चुनाव जीतने के लिए बड़े बड़े वादे करती हैं और जनता को सब्जबाग दिखाती हैं. अखबार याद दिलाता है कि इमरान खान ने पिछले आम चुनाव के दौरान भी इसी तरह का 90 दिन का प्लान दिया था, अब वे बताएं कि खैबर पख्तून ख्वाह में इसमें से कितना काम हुआ.

पाकिस्तान की भूमिका

अन्य खबरों में, रोजनामा ‘आजकल’ का संपादकीय है- शंघाई सहयोग संगठन और पाकिस्तान की भूमिका. अखबार पाकिस्तान को इस संगठन की सदस्यता मिलने पर फूला नहीं समाता है और लिखता है कि इससे क्षेत्र में तरक्की, आतंकवाद से निपटने और ऊर्जा के संकट से निपटने में मदद मिलेगी. यह बात अलग है कि आतंकवाद के मुद्दे पर खुद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवालों में घिरा रहता है. लेकिन शंघाई सहयोग संगठन चीन से चलता है तो वहां पाकिस्तान से कोई ऐसे सवाल नहीं पूछेगा.

उधर, पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित उर्दू अखबार ‘जंग’ का संपादकीय है - गुटका बंद करो. अखबार ने संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि पाकिस्तान दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां एक लाख से ज्यादा लोग हर साल तंबाकू खाने से होने वाली बीमारियों के कारण मारे जाते हैं. इन बीमारियों में मुंह, हलक, सांस की नली और फेंफड़ों का कैंसर भी शामिल है. अखबार कहता है कि सिगरेट, पान, छालिया और गुटका जैसी चीजों में कोई भी ऐसी नहीं है जो जीवन की बुनियादी जररूत हो, बल्कि इनसे पैसों और सेहत की बर्बादी के सिवा कुछ हासिल नहीं होता. एक तरफ अखबार इन चीजों के खिलाफ लोगों को जागरूक बनाने पर जोर देता है तो दूसरी तरफ इनकी बिक्री पर पाबंदी लगाने को कहता है.

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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