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अमेरिकी मदद रुकी तो क्या हुआ, रूस-चीन हैं ना: पाक मीडिया

अमेरिका की तरफ से करोड़ों डॉलर की सैन्य मदद रोके जाने का पाकिस्तान पर क्या फर्क पड़ेगा? पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में इसी सवाल पर माथापच्ची हो रही है

Updated On: Jan 08, 2018 10:25 AM IST

Seema Tanwar

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अमेरिकी मदद रुकी तो क्या हुआ, रूस-चीन हैं ना: पाक मीडिया

अमेरिका की तरफ से करोड़ों डॉलर की सैन्य मदद रोके जाने का पाकिस्तान पर क्या फर्क पड़ेगा? पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में इसी सवाल पर माथापच्ची हो रही है. कहीं रूस और चीन से उम्मीदें लगाई जा रही हैं तो कहीं अमेरिका को खरी खरी सुनाई जा रही है.

रोजनामा ‘वक्त’ लिखता है कि अमेरिका यह साबित करने की कोशिश कर रहा है जैसे वही पाकिस्तान का ‘अन्नदाता’ है. अखबार कहता है कि अमेरिका को जान लेना चाहिए कि आतंकवाद के खिलाफ पाक अमेरिकी गठबंधन दरअसल अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्यों को पूरा करता है और पाकिस्तान के कदमों से ही अल कायदा समेत दूसरे आतंकवादियों का खात्मा हुआ है. अखबार की राय है कि पाकिस्तान ने 70 साल तक अमेरिका पर निर्भर रहने की नीतियां अपनाए रखी और वह अमेरिकी अधिकारियों के अपमान और नकारात्मक गतिविधियों का शिकार होता रहा, लेकिन अब इन नीतियों को बदलना होगा.

नहीं होगी मुश्किल..

रोजनामा ‘दुनिया’ लिखता है कि अमेरिका की तरफ से सुरक्षा सहयोग निलंबित करने के ऐलान के बाद हर तरफ यही सवाल पूछा जा रहा है कि इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा तंत्र पर क्या फर्क पड़ेगा.  अखबार कहता है कि पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने साफ कर दिया है कि अमेरिकी मदद बंद होने से पाकिस्तान पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. अखबार की टिप्पणी है कि अगर पाकिस्तान को सुरक्षा मदद की जरूरत पड़ी तो उसके पास रूस और चीन जैसे विकल्प मौजूद है.

अखबार लिखता है कि शीत युद्ध के जमाने में सोवियत संघ के करीब होने की वजह से भारत के रिश्ते अमेरिका से अच्छे नहीं थे, तो वह अपनी जरूरत के सभी हथियार सोवियत संघ से लेता था, इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि हालत बिगड़ने पर पाकिस्तान को भी ज्यादा मुश्किल नहीं होगी.

'औसाफ' लिखता है, 'हमें इज्जत की कीमत पर सुरक्षा सहायता नहीं चाहिए. पाकिस्तानी फौज अमेरिकी सहायता सुरक्षा के बिना भी ताकतवर है.' अखबार की राय है कि अगर मदद के डर से अमेरिका के सामने सरेंडर कर दिया गया तो पाकिस्तान की आने वाली नस्लों को इसका मलबा उठाना पड़ेगा. अखबार का कहना है कि अब अमेरिका को साफ जवाब दे देना चाहिए कि उसके साथ किसी भी क्षेत्र में साझीदारी नहीं होगी.

भारत के हौसले बुलंद

नवा ए वक्त’ लिखता है कि अमेरिका का असल निशाना पाकिस्तान की परमाणु टेक्नोलोजी है. अखबार की राय में, अमेरिका में चाहे डेमोक्रेट सत्ता में हो या फिर रिपब्लिकन, उनमें किसी से भी पाकिस्तान की भलाई की उम्मीद नहीं की जा सकती.

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अखबार की राय में, सैन्य सहयोग रोकने के अमेरिकी फैसले से पाकिस्तान के खिलाफ भारत के हौसले और भी बुलंद हो चुके हैं. अखबार पाकिस्तान के भीतर एकजुटता पर जोर देता है ताकि 'दुश्मन को ठोस संदेश' दिया जा सके. अखबार ने अपने संपादकीय के आखिर में लिखा है: 'अगर हम खाली पीली खुद्दारी और कौमी गैरत का इजहार करते रहे और वक्त आने पर कुछ ना कर पाए तो एक देश के तौर पर हमारे लिए इससे बड़ी शर्म की बात कुछ नहीं होगी. हमें बांग्लादेश के अलग हो जाने से कुछ ना कुछ सबक तो अब सीख लेना चाहिए.'

वहीं रोजनामा ‘इंसाफ’ ने लिखा है कि अमेरिका पाकिस्तान के खिलाफ खुलकर सामने आ गया है और पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अमेरिकी हमले की आशंका भी जाहिर की है, हालांकि हुकमरानों ने अमेरिकी आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब देने का संकल्प जताया है. अखबार लिखता है कि अमेरिका ने सैन्य सहायता रोकने के साथ साथ पाकिस्तान को उन देशों की सूची में भी शामिल कर दिया जहां धार्मिक आजादी नहीं है. अखबार कहता है कि पाकिस्तान को फिलहाल वॉच लिस्ट में शामिल किया गया है, लेकिन हैरत की बात यह है कि इस लिस्ट में न तो भारत को शामिल किया गया है और न ही इजरायल को.

अखबार की राय है कि ये दोनों ही अमेरिका के दोस्त हैं और उनके यहां ‘धार्मिक आजादियों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन’ हो रहा है लेकिन उसे देखने के लिए अमेरिका का चश्मा अलग है.

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जोश नहीं, होश

रोजनामा ‘जंग’ कहता है कि हालात का तकाजा यह है कि पाकिस्तान जोश की बजाय होश से काम ले. अखबार के मुताबिक लड़ाई किसी समस्या का हल नहीं है बल्कि यह खुद अपने आप में एक समस्या है. अखबार की राय में, पाकिस्तान को दुनिया की उन आपत्तियों को भी दूर करना होगा जिनकी वजह से आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान की ‘बेमिसाल कुरबानियों’ को कोई मानने को तैयार नहीं है. अखबार लिखता है कि संवाद के रास्तों को बंद नहीं करना चाहिए और किसी भी समस्या का हल बातचीत से ही निकल सकता है.

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