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सऊदी अरब में जाएंगे पाक फौजी, संसद को खबर नहीं

कई अखबार सिर्फ इन बुनियाद पर सऊदी अरब में फौजी भेजने की हिमायत कर रहे हैं क्योंकि वहां मुसलमानों से सबसे पवित्र तीर्थस्थल मक्का और मदीना हैं

Updated On: Feb 19, 2018 10:14 AM IST

Seema Tanwar

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सऊदी अरब में जाएंगे पाक फौजी, संसद को खबर नहीं

पाकिस्तान से अपना घर भले ही ना संभलता हो, लेकिन दूसरों के मामले में टांग अड़ाने की उसे खूब आदत है. मसलन अब पाकिस्तान की फौज ने अपने सैनिक सऊदी अरब भेजने का ऐलान किया है. यह खबर पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में तो हर तरफ छाई हुई है लेकिन मजे की बात यह है कि सेना या सरकार ने संसद को इस बारे में बताना तक जरूरी नहीं समझा.

सेना सफाई दे रही हैं कि ये फौजी सिर्फ सऊदी सेना को ट्रेनिंग देने जा रहे हैं, लेकिन संसद को चिंता सता रही हैं कि कहीं पाकिस्तान सऊदी अरब और यमन के बीच चल रही लड़ाई में ना फंस जाए?

पकिस्तानी सांसदों को शिकायत है कि इतने बड़े फैसले पर उन्हें भरोसे में नहीं लिया गया. हालांकि कुछ अखबारों का कहना है कि हाल में जब पाकिस्तान 40 मुस्लिम देशों के सैन्य गठबंधन का हिस्सा बना, तब कौन सा संसद से पूछा गया था. वैसे भी पाकिस्तान में सेना के आगे ना संसद की चलती है और न ही सरकार की.

खोखली बातें

‘जंग’ लिखता है कि पाकिस्तान के पूर्व आर्मी चीफ को इस्लामी सैन्य संगठन का मुखिया बना दिया, लेकिन संसद को भरोसे में नहीं लिया गया और अब सऊदी अरब में और फौजी दस्ते भेजने की खबरें आ रही है.

इस मामले में संसद की तरफ से सफाई मांगे जाने पर अखबार कहता है कि यह बिल्कुल दुरुस्त मांग है क्योंकि राष्ट्रीय महत्व के सभी फैसले संसद के सलाह मशविरे और समर्थन से ही होने चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में संसद ही नीति बनाने वाली असल संस्था है. अखबार के मुताबिक किसी भी मुद्दे पर आखिरी फैसला लेने का हक संसद को होना चाहिए. लेकिन अखबार यह उल्लेख करना भूल जाता है कि पाकिस्तान के संदर्भ में यह सारी बातें खोखली हैं क्योंकि वहां तमाम अहम फैसले सेना लेती है.

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‘एक्सप्रेस’ कहता है कि पाकिस्तानी सीनेट के चेयरमैन रजा रब्बानी की यह शिकायत अनुचित नहीं है कि सऊदी अरब में फौज भेजने के अहम मामले पर संसद को भरोसे में नहीं लिया गया क्योंकि अगर संसद सबसे ऊपर है तो अहम मुद्दों पर फैसले भी वहीं होने चाहिए. अखबार के मुताबिक, इस मुद्दे पर संसद में चर्चा इसलिए जरूरी है ताकि जनता को पता चले कि देश की विदेश नीति किधर जा रही है.

उधर ‘नवा ए वक्त’ ने मुस्लिम नाटो कहे जाने वाले मुस्लिम देशों के सैन्य संगठन में पाकिस्तान की हिस्सेदारी पर ही सवाल उठाया है. अखबार कहता है कि मुस्लिम नाटो और कुछ नहीं हैं बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और सऊदी शाह सलमान की तरफ से ईरान के खिलाफ खुली जंग का ऐलान है. अखबार याद दिलाता है कि रियाद में मुस्लिम नाटो के शिखर सम्मेलन में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को बोलने तक नहीं दिया गया था.

अखबार की राय है कि पाकिस्तान के पूर्व आर्मी चीफ की अगुवाई में अगर मुस्लिम नाटो को ईरान के खिलाफ जंग के लिए इस्तेमाल किया गया तो सारा बोझ पाकिस्तान पर ही आएगा और इससे सऊदी अरब और ईरान की खींचतान में तटस्थ रहने पाकिस्तान की नीति पर धब्बा लगेगा. अखबार के मुताबिक इस बीच अफवाह यह भी है कि जनरल राहिल शरीफ ने मुस्लिम नाटो के प्रमुख का पद छोड़ दिया है, लेकिन इस मामले में किसी अंतिम फैसले के देश को अवगत नहीं कराया गया है.

वहीं ‘औसाफ’ ने अपने संपादकीय में पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता के इस बयान को तवज्जो दी है कि सऊदी अरब भेजे गए सैनिक यमन की लड़ाई में हिस्सा नहीं लेंगे. अखबार लिखता है कि एक हजार से ज्यादा पाकिस्तानी फौजी पहले से ही सऊदी अरब में मौजूद हैं और उनका मकसद सिर्फ सऊदी फौजियों की आतंकवाद विरोधी ट्रेनिंग देना और उनकी सैन्य दक्षताओं को बेहतर बनाना है. अखबार लिखता है कि खाड़ी देशों में पाकिस्तान का सैन्य सहयोग सिर्फ सऊदी अरब तक सीमित नहीं है बल्कि इस वक्त कतर में भी पाकिस्तान के 627 सैनिक मौजूद हैं. अखबार के मुताबिक इसी तरह के सैन्य सहयोग के तहत ईरान के दस पायलट इस वक्त पाकिस्तान में ट्रेनिंग हासिल कर रहे हैं.

फैसले का समर्थन

दिलचस्प बात यह है कि कई अखबार लोकतांत्रिक नियम कायदों और कूटनीतिक नफे नुकसान के परवाह किए बिना सिर्फ इन बुनियाद पर सऊदी अरब में फौजी भेजने की हिमायत कर रहे हैं क्योंकि वहां मुसलमानों से सबसे पवित्र तीर्थस्थल मक्का और मदीना हैं.

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रोजनामा 'वक्त' भी इन्हीं में शामिल है जो कहता है कि सऊदी अरब ने हर मुश्किल घड़ी में पाकिस्तान की मदद की है. अखबार पाकिस्तानी विपक्ष से भी सऊदी अरब में फौज भेजने के फैसले पर सवाल न उठाने के लिए कहता है. अखबार ने पूरे संपादकीय में सिर्फ सऊदी अरब का गुणगान किया है. अब जिन्हें संसद की सर्वोच्चता और लोकतांत्रिक तकाजों की फ्रिक है, वे चिल्लाते रहें.

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