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क्या पाकिस्तान में फिर मार्शल लॉ लगने वाला है?

पाकिस्तान में क्या फिर कोई सियासी उथल पुथल होने वाली है? क्या फिर लोकतांत्रिक तरीके चुनी हुई सरकार की छुट्टी होने वाली है?

Updated On: Mar 26, 2018 11:01 AM IST

Seema Tanwar

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क्या पाकिस्तान में फिर मार्शल लॉ लगने वाला है?
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पाकिस्तान में क्या फिर कोई सियासी उथल पुथल होने वाली है? क्या फिर लोकतांत्रिक तरीके चुनी हुई सरकार की छुट्टी होने वाली है? फिर कोई तानाशाह देश की बागडोर अपने हाथ में लेने वाला है? पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में आजकल यही सवाल घूम रहे हैं. प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस तक सफाई दे रहे हैं कि लोकतंत्र को पटरी से नहीं उतरने देंगे.

दूसरी तरफ, विपक्षी पार्टियां सवाल पूछ रही हैं कि पाकिस्तान में लोकतंत्र पटरी पर चढ़ा ही कब था. बात भी सही है, जिस देश के 70 साल के इतिहास में आधे समय तक सैन्य तानाशाहों का राज रहा हो, वहां लोकतंत्र की जड़ें कितनी मजबूत हैं, यह सब जानते हैं. इसके अलावा, पाकिस्तानी रुपए के मूल्य में गिरावट और उसकी वजह से बढ़ती महंगाई पर भी कई पाकिस्तानी अखबारों ने संपादकीय लिखे हैं.

अफवाहें और कयास

रोजनामा ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि मौजूदा सरकार का कार्यकाल पूरा होने में सिर्फ पांच-छह महीने का समय बचा है लेकिन अफवाहों और कयासों का बाजार गर्म है जिससे देश का सियासी परिदृश्य धुंधला हो रहा है और अविश्वास की फिजा कायम है. अखबार के मुताबिक, कहीं जूडिशियल मार्शल लॉ की बातें हो रही हैं तो कहीं टेक्नोक्रेट सरकार की बातें सियासी गलियारों में घूम रही हैं, जबकि डॉलर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपए के लगातार गिरते मूल्य से देश की अर्थव्यवस्था दबाव में है. अखबार के मुताबिक, हालांकि देश की अहम संस्थाएं और राजनीतिक दल लोकतंत्र के प्रति अपनी वचनबद्धता को दोहरा रहे हैं, लेकिन देश में अफवाहें और कयासबाजियां रुकने का नाम नहीं ले रही हैं.

उधर दैनिक ‘पाकिस्तान’ ने अपने संपादकीय की शुरुआत पाकिस्तान के चीफ जस्टिस मियां साकिब निसार के इस बयान से की है कि उनके रहते पाकिस्तान में कोई तानाशाही निजाम नहीं आ सकता है और देश में एक की तरह की सरकार होगी और वह है चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार.

अखबार लिखता है कि चीफ जस्टिस ने उन सब स्वघोषित राजनेताओं को दो टूक जवाब दे दिया है जो उम्मीद लगाए बैठे थे कि 'वक्त आने पर' वे किसी न किसी बहाने से अदालत के सामने याचिका लेकर जाएंगे कि चुनाव समय पर नहीं कराए जा सकते हैं, इसलिए कार्यवाहक सरकार को ही लंबे समय तक काम करने की अनुमति दी जाए. पाकिस्तान में चुनाव हमेशा एक कार्यवाहक सरकार की निगरानी में कराने की परंपरा रही है ताकि चुनाव निष्पक्ष हो सकें.

बड़बोले शेख रशीद

रोजनामा ‘डेली पाकिस्तान’ लिखता है कि एक राजनेता ने तो पिछले दिनों यहां तक कह दिया कि चीफ जस्टिस को ज्यूडिशियल मार्शल लॉ लगा देने चाहिए, लेकिन इसका जवाब अब उन्हें मिल गया है. अखबार के मुताबिक, इन जनाब का ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा है कि वह कोई न कोई शिगूफा छोड़ते रहते हैं और नया शिगूफा यह है कि कार्यवाहक प्रधानमंत्री की नियुक्ति चीफ जस्टिस को करनी चाहिए.

यह राजनेता कोई और नहीं बल्कि मुशर्रफ के दौर में रेल मंत्री रहे शेख रशीद हैं जिन्हें ‘जसारत’ के मुताबिक कोई गंभीरता से नहीं लेता. अखबार कहता है कि शेख रशीद की इस बात को अहमियत देने की भी कोई जरूरत नहीं थी कि देश में ज्यूडिशियल  मार्शल लॉ लगा देना चाहिए, लेकिन चीफ जस्टिस हो या प्रधानमंत्री या फिर कुछ और राजनेता, सब इस बयान पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं.

अखबार कहता है कि चीफ जस्टिस ने साफ कहा है कि लोकतंत्र को पटरी से नहीं उतरने देंगे, लेकिन विपक्षी पार्टियां पूछ रही हैं कि पाकिस्तान में अभी तक लोकतंत्र पटरी पर चढ़ा ही कहां है. अखबार की दुआ है कि चीफ जस्टिस की कही बात सही साबित हो लेकिन जसारत यह भी लिखता है कि पाकिस्तान का इतिहास गवाह है कि जब भी वर्दी वाला दुस्साही पटरी से उतरता है तो संविधान और अदालतें, सब बेबस होकर मुंह देखती रह जाती हैं और लोकतंत्र की ट्रेन ऐसे पटरी से उतरती है कि उसे वापस दोबारा चढ़ाने में बरसों लगते हैं.

महंगाई से बेहाल

वहीं रोजनामा ‘दुनिया’ लिखता है कि पाकिस्तानी रुपए की कीमत में हो रही कमी के कारण देश में मंहगाई का नया रेला आ गया है. डॉलर के मुकाबले पाकिस्तान रुपया 115 के भी पार चला गया है. अखबार कहता है कि आर्थिक जानकार पहले ही चेतावनी दे रहे थे कि मुद्रा के मूल्य में कमी से रोजमर्रा की चीजें के दाम बढ़ जाएंगे, जिससे मंहगाई में इजाफा होगा. अखबार के मुताबिक, अफसोस की बात तो यह है कि हुकमरान रुपए की कीमत में हो रही कमी को न सिर्फ रोकने में नाकाम नजर आते हैं, बल्कि वे इस मामले में अपनी बेबसी जता चुके हैं.

रोजनामा ‘वक्त’ ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखता है कि पाकिस्तान महंगाई के मामले में एशियाई देशों में सबसे आगे है. इस सिलसिले में अखबार ने बिजली की बढ़ी दरों का जिक्र करते हुए लिखा है कि यह महंगाई की चक्की में पिस रही जनता के लिए “मरे हुए और दो लात” मारने वाली बात है. अखबार ने महंगाई पर लगाम कसने की जरूरत पर जोर देते हुए लिखा है कि रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतों से जनता की मुश्किलें बढ़ेंगी जो पहले ही महंगाई के तूफान के आगे दुहाई दो रही है.

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