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आसमा जहांगीर के निधन पर गमगीन नहीं, जहर उगलने में व्यस्त पाक मीडिया

कश्मीर विधानसभा की घटना पर दुनिया, एक्सप्रेस, औसाफ और वक्त जैसे अखबारों ने लंबे चौड़े संपादकीय लिखे हैं

Updated On: Feb 13, 2018 10:30 AM IST

Seema Tanwar

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आसमा जहांगीर के निधन पर गमगीन नहीं, जहर उगलने में व्यस्त पाक मीडिया

पाकिस्तान की मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता आसमा जहांगीर के निधन पर जहां पूरी दुनिया गमगीन है, वहीं पाकिस्तानी उर्दू अखबार जम्मू कश्मीर की विधानसभा में एक विधायक की तरफ से ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने पर फूले नहीं समा रहे हैं. आए दिन भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले पाकिस्तानी अखबारों के संपादकीयों में आसमा जहांगीर पर इक्का दुक्का जगह सिर्फ एक दो पैराग्राफ नजर आते हैं. वहीं कश्मीर विधानसभा की घटना पर दुनिया, एक्सप्रेस, औसाफ और वक्त जैसे अखबारों ने लंबे चौड़े संपादकीय लिखे हैं.

पाकिस्तानी अखबारों में एकतरफा संपादकीय

रोजनामा ‘दुनिया’ लिखता है कि भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों ने संजवान आर्मी कैंप पर होने वाले हमले के मामले पर हंगामा किया जिसके जवाब में नेशनल कांफ्रेस के सदस्य अकबर लोन ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगा दिए. अखबार ने अकबर लोन का हवाला देते हुए लिखा है कि “मैं पहले एक मुसलमान हूं और बीजेपी की तरफ से पाकिस्तान विरोधी नारों पर अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख पाया और इसलिए पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा दिए.”

अखबार की राय है कि ये नारे इस बात का संकेत है कि आज नहीं तो कल भारत को कश्मीर समस्या के हल की तरफ आना ही पड़ेगा. इसके साथ ही अखबार ने भारत पर हठधर्मिता अपनाने और कश्मीरियों पर अत्याचार ढाने जैसे घिसे-पिटे आरोपों की झड़ी लगाई है. एकतरफा तौर पर लिखे गए इस संपादकीय में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि नेशनल कांफ्रेंस ने खुद ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने वाले अपने विधायक को फटकार लगाई है.

‘एक्सप्रेस’ ने अपने संपाकीय की शुरुआत में लिखा है - जम्मू कश्मीर विधानसभा ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारों से गूज उठी. इससे लगता है जैसे नारे एक विधायक ने नहीं, बल्कि बहुत सारे विधायकों ने लगाए थे. दिन रात कश्मीर-कश्मीर चिल्लाने वाले इस अखबार की जानकारी कितनी कम है, यह भी उसके संपादकीय से जाहिर होता है. अखबार कहता है कि कश्मीर में 2014 में होने वाले चुनावों में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर मुमकिन कोशिश की कि किसी न किसी तरह वहां बीजेपी की सरकार बन जाए, उन्होंने चुनाव जीतने के लिए हर जायज-नाजायज हथकंडा अपनाया, लेकिन चुनाव में बीजेपी को हार मिली और वहां पीडीपी ने सरकार बनाई जिसकी मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती हैं. यानी अखबार को यह पता ही नहीं है कि 2014 के जम्मू कश्मीर विधानसभा में शानदार कामयाबी हासिल करते हुए बीजेपी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी और अभी गठबंधन सरकार में शामिल है.

औसाफ ने भी कश्मीर विधानसभा में पाकिस्तान समर्थक नारे लगने पर संपादकीय लिखा है, लेकिन उसने इस बात का भी जिक्र किया है कि नेशनल कांफ्रेंस के नेतृत्व ने अकबर लोन के कदम को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है और कहा है कि उनकी निजी भावनाओं का पार्टी से कोई लेना देना नहीं है. लेकिन अगली ही लाइन में अखबार पुराने पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को शुरू कर देता है कि भारत कश्मीरियों पर जुल्म ढा रहा है.

अखबार लिखता है कि संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के सामने पिछले हफ्ते ही यूएन में पाकिस्तान की स्थायी दूत ने जनमत संग्रह कराने और कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर अमल कराने की मांग रखी.

‘वक्त’ ने कश्मीर विधानसभा की घटना को इस्लामी गैरत से जोड़ा है. अखबार कहता है कि ‘कश्मीरी मुसलमानों के आजादी के जज्बे और इस्लामी गैरत को जिंदा होने का सबूत’ देते हुए असेंबली में ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारों के जवाब में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगा दिए. अखबार कहता है कि इन नारों से साफ है कि कश्मीरी भारत के साथ नहीं बल्कि पाकिस्तान के साथ रहना चाहते हैं. लेकिन नेशनल कांफ्रेंस के मुखिया फारुख अब्दुल्लाह के इस बयान का उल्लेख करने की जहमत पाकिस्तानी मीडिया ने नहीं उठाई जिसमें उन्होंने पाकिस्तान से जम्मू कश्मीर आतंकवादी भेजने बंद करने को कहा है.

आसमां की याद

दूसरी तरफ भारत के खिलाफ चार चार कॉलम के संपादकीय लिखने वाले ‘नवा ए वक्त’ ने आसमा जहांगीर को एक कॉलम में निपटा दिया है. अखबार के मुताबिक वह देश और लोगों की भलाई के लिए जो बात बेहतर समझती थीं, उसे बेखौफ होकर कह डालती थीं. अखबार के मुताबिक जहां कहीं भी नाइंसाफी होती, वह वहां डट कर खड़ी हो जाती थीं और इन्हें इस बात की जरा परवाह नहीं होती थी कि उनका मुकाबला किससे है. अखबार की टिप्पणी है कि महिलाएं और पिछड़े तबके के लोग ऐसे हमदर्द से महरूम हो गए हैं जिसकी मौजूदगी उन्हें जिंदा रहने का हौसला देती थी.

एक्सप्रेस’ लिखता है कि आसमा जहांगीर ने सैन्य तानाशाहियों और खासकर जनरल जिया उल हक की तानाशाही के खिलाफ बड़ी दिलेरी से जद्दोजहद की. अखबार कहता है कि मार्शल लॉ के खिलाफ उनके संघर्ष को पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा.

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