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कश्मीर में टांग अड़ा रहे पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर कत्लेआम मचा है

ईशनिंदा कानूनों की आड़ में अप्रैल महीने में पाकिस्तान में हिंसा की कई वारदातें हुईं

Updated On: May 05, 2017 10:55 AM IST

Shantanu Mukharji

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कश्मीर में टांग अड़ा रहे पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर कत्लेआम मचा है

पाकिस्तान हमारे देश में कमियां निकालने में इतना मशगूल है कि उसे अपने यहां हो रहे अत्याचार याद नहीं रहते. पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर लोगों को पीट-पीटकर मारा जा रहा है. जरा-जरा सी बात पर हिंसा हो रही है. हालात दिन-ब-दिन बिगड़ रहे हैं.

भयानक हिंसक हालात के बीच पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की विधानसभा ने हाल ही में दो प्रस्ताव पास किए. जिसमें पैगंबर को लेकर तमाम प्रस्तावों को सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई.

इन्हीं प्रस्तावों में कादियानी, लाहौरी और अहमदी समुदायों को इस्लाम का दुश्मन बताकर उन्हें गैरइस्लामिक और काफिर करार देने की मांग की गई.

इसमें ये भी कहा गया कि अगर ये समुदाय खुद के मुसलमान होने का दावा करें तो इनके खिलाफ आपराधिक केस चले.

यूं तो पाकिस्तान में तरक्कीपसंद अल्पमत में हैं, फिर भी उन्होंने इन प्रस्तावों को कट्टरपंथी जमात की मुहिम बताकर इसका विरोध किया. इसे धार्मिक असहिष्णुता बताया.

आखिर इस वक्त पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की विधानसभा में ये प्रस्ताव क्यों पारित किया गया? इन प्रस्तावों से पीओके की विधानसभा ने पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून को खुला समर्थन दे दिया है.

सरकारी संरक्षण में फल-फूल रहे हैं कट्टरपंथी ताकतें

पाकिस्तान के कब्जे वाली कश्मीर की विधानसभा में पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज गुट का बहुमत है. वो सत्ताधारी पार्टी है. इसीलिए ये पार्टी अपने हक में इस तरह के प्रस्ताव पास करा सकी.

मौजूदा सरकार इस तरह के प्रस्तावों से धार्मिक उन्माद को बढ़ावा दे रही है. इससे पाकिस्तान में धार्मिक हिंसा को और बढ़ावा दिया जा रहा है.

ईशनिंदा कानूनों की आड़ में अप्रैल महीने में पाकिस्तान में हिंसा की कई वारदातें हुईं. 13 अप्रैल को खैबर-पख्तूनख्वा सूबे के मर्दान कस्बे में पांच सौ लोगों की भीड़ ने मशाल खान नाम के छात्र की हत्या कर दी.

ये वारदात अब्दुल वली खां यूनिवर्सिटी के कैम्पस में हुई. मशाल खान को सिर्फ अहमदिया होने के शक में मार डाला गया. भीड़ को शक था कि वो खुदा की निंदा करता था. सोचिए!

शिक्षा के मंदिर में ऐसी वारदातों का होना हालात के कितने खतरनाक होने की तरफ इशारा करता है. ये घटना उस इलाके में हुई जहां खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे लोग पैदा हुए और उसे अपनी कर्मभूमि बनाया. सीमांत गांधी के नाम से मशहूर गफ्फार खान ने लोगों को सहिष्णुता और बराबरी का पाठ पढ़ाया था.

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पाकिस्तान में कट्टरपंथी ताकतें हावी हैं

पाकिस्तान में हाल में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं. 20 अप्रैल को तीन हथियारबंद लोगों ने सियालकोट शहर में एक आदमी को मार डाला. मारे गए आदमी पर 13 साल पहले ईशनिंदा का आरोप लगा था.

22 अप्रैल को एक भीड़ ने शुक्रवार की नमाज के बाद एक शख्स पर हमला बोल दिया. इस पर भी ईशनिंदा का आरोप था. ये घटना उत्तरी पाकिस्तान के एक कस्बे में हुई. इस हमले में 6 पुलिसवाले उस वक्त घायल हो गए, जब उन्होंने बेबस इंसान को बचाने की कोशिश की.

25 अप्रैल को कबाइली इलाके पाराचिनार में एक गाड़ी को रिमोट कंट्रोल से धमाका करके उड़ा दिया गया. इस घटना में 6 बच्चों समेत 14 लोग मारे गए थे. मारे गए लोग शिया समुदाय से थे. पाकिस्तान का बहुसंख्यक कट्टरपंथी सुन्नी समुदाय शियाओं को अपना दुश्मन मानता है.

इन घटनाओं से साफ है कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर कितने ज़ुल्म हो रहे हैं. पाकिस्तान की सरकार ऐसी हिंसक घटनाओं के प्रति पूरी तरह बेपरवाह दिखती है.

ईशनिंदा की आड़ में लोग कानून को अपने हाथ में लेकर फौरन फैसला सुनाकर मौत की सजा दे रहे हैं. इसकी आड़ में अल्पसंख्यकों के बुनियादी इंसानी हक को भी मारा जा रहा है. आसिया बीबी नाम की ईसाई महिला जो ईशनिंदा के आरोप में जेल में बंद है, उसे हाल ही में इलाज की सुविधा देने से भी मना कर दिया गया. वो पिछले दस सालों से जेल में बंद हैं और इंसाफ का इंतजार कर रही है.

पाकिस्तान में कहने भर को है कानून का राज

पाकिस्तान जैसे देश में, जहां कानून का राज दिन-ब-दिन कमजोर होता जा रहा है, वहां ईशनिंदा के कानून बेहद खतरनाक रूप अख्तियार करते जा रहे हैं. ऐसे कानून की आड़ में अपराध करने वालों पर कार्रवाई करने में सरकार पूरी तरह से नाकाम रही है.

मानवाधिकार के मामले में पाकिस्तान 113 देशों की फेहरिस्त में 81वें नंबर पर आता है. नाइंसाफी की ऐसी घटनाएं, यहां की हालत को और खराब कर रही हैं.

यही वजह है कि पाकिस्तान की फौज ने अपनी अलग से अदालत बना ली है. जहां फौरी इंसाफ किया जाता है. इस प्रक्रिया को शक से देखा जाता है, मगर पाकिस्तान में इसके खिलाफ कोई सुनवाई नहीं है.

ऐसे में विधानसभाएं जब ईशनिंदा को लेकर ऐसे प्रस्ताव पास करती हैं, तो इससे धार्मिक असहिष्णुता को ही बढ़ावा मिलता है. पाकिस्तान की सरकार दावे तो बहुत करती है, मगर धार्मिक हिंसा के आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती. इससे पाकिस्तान के हालात बिगड़ते ही जा रहे हैं.

पाकिस्तान को चाहिए कि पहले वो अपने यहां हालात दुरुस्त करे फिर हमारे देश में कमियां ढूंढने की कोशिश करे.

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