S M L

पाकिस्तान: अभी तो ये पहली मंजिल है, अभी से ही इमरान घबरा गए

पाकिस्तान की मीडिया इमरान खान की नुक्ताचीनी करने में लग गई और उनसे रोडमैप की मांग कर रही है..देखना है कि इमरान अपने काम से सबको खुश कर पाते हैं या नहीं

Updated On: Sep 17, 2018 11:52 AM IST

Seema Tanwar

0
पाकिस्तान: अभी तो ये पहली मंजिल है, अभी से ही इमरान घबरा गए

लगता है ‘नए पाकिस्तान’ का सपना दिखा कर सत्ता में आने वाले इमरान खान को दाल आटे का भाव समझ आने लगा है. ‘नया पाकिस्तान’ तो छोड़िए प्रधानमंत्री इमरान खान की सबसे बड़ी चिंता तो यह है कि आईएमएफ के सामने हाथ फैलाने से कैसे बचें. ऊपर से मीडिया में नुक्ताचीनी शुरू हो गई है. कहीं उनसे रोडमैप मांगा जा रहा है तो कोई उनकी सरकार के शुरुआती कदमों को जनता की उम्मीदों पर पानी फेरने वाला बता रहा है.

यह बात सही है कि दशकों से खस्ताहाल अर्थव्यवस्था और आर्थिक तंगी झेल रहे पाकिस्तान के हालात इमरान खान रातों रात नहीं बदल सकते. लेकिन यह बात उन्हें चुनाव प्रचार के दौरान सोचनी चाहिए थी. आखिर जनता की उम्मीदों को सातवें आसमान पर ले जाने का खमियाजा तो उन्हें ही उठाना पड़ेगा. कमाल की बात यह है कि वह अब भी लोगों को ऐसे सपने दिखा रहे हैं, जिन्हें वह शायद पूरा न कर पाएं.

दो साल की मोहलत

रोजनामा ‘एक्सप्रेस’ का संपादकीय है: वजीर ए आजम साहब, रोडमैप दीजिए. अखबार लिखता है कि इमरान खान ने अपील की है कि अगर देश की जनता दो साल जैसे तैसे गुजारा कर ले तो उसके बाद पाकिस्तान में इतना पैसा आएगा कि ना तो कर्ज रहेगा और ना ही बेरोजगारी. इमरान खान कह रहे हैं कि इन दो साल में पाकिस्तान निवेश और पर्यटन के लिए सबसे अहम केंद्रों में शामिल होगा.

इमरान दो साल में पाकिस्तान की कायापलट कैसे करेंगे, यह तो वही जानें, लेकिन रोजनामा ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि इमरान उस जनता से दो साल की मोहलत मांग रहे हैं जो नई सरकार से चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठी है.

अखबार की टिप्पणी है कि अपनी 22 साल की सियासी जद्दोजहद में इमरान ने खान ने सिस्टम के नकारेपन, भ्रष्ट प्रशासनिक ढांचे और जनविरोधी नीतियों के इतने इल्जाम लगाए है और कर्जों की बैसाखी खत्म करने की इतनी बात की है, तो अब उन्हें भी अपना रोडमैप देना चाहिए.

‘नवा ए वक्त’ अखबार लिखता है कि इमरान खान की सरकार ने अपने शुरुआती दो हफ्तों में गवर्नेंस और अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए जो कदम उठाए हैं, उनसे जनता के बीच उम्मीद की किरण रोशन होने के बजाय निराशा के साए मंडराने लगे हैं.

अखबार लिखता है कि सोमवार को संसद में पेश होने वाले मिनी बजट में कई सौ अरब रुपये के नए टैक्स लगाने और विकास कार्यों के लिए निर्धारित राशि में 30 फीसदी की कटौती के प्रस्ताव शामिल हैं.

अखबार की राय में, इन नए टैक्सों का बोझ अंततः जनता पर ही पड़ेगा, जो पहले ही गरीबी और महंगाई के नीचे दबी है. अगर इमरान खान को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना है तो उन्हें सौ दिन के भीतर गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी और ऊर्जा के संकट जैसे मुद्दों को हल करने के लिए कदम उठाने पड़ेंगे.

नौकरशाहों पर नरम

रोजनामा ‘जिन्नाह’ ने नौकरशाहों के सामने दिए गए इमरान खान के भाषण पर सवाल उठाया है. अखबार कहता है कि प्रधानमंत्री को इस बात का अहसास हो गया है कि नौकरशाहों की मदद के बिना देश की समस्याओं का हल मुमकिन नहीं, इसीलिए उन्होंने अपने भाषण में उनके खून में गर्मी लगाने की भरपूर कोशिश की. इमरान खान ने कहा कि ब्यूरोक्रेसी की सुरक्षा और उसके काम में सियासी हस्तक्षेप को रोकना उनकी जिम्मेदारी है, बस वे अपना काम सही से करें.

अखबार की राय है कि ब्यूरोक्रेसी को इतनी छूट कभी नहीं देनी चाहिए कि वह खुद को जवाबदेह ही न समझे. अखबार ने इमरान खान सरकार को खबरदार करते हुए लिखा है कि ऐसा ना हो कि ब्यूरोक्रेसी खुद को सरकार की कमजोरी समझ कर उसे ब्लैक मेल करना शुरू कर दे.

वहीं ‘औसाफ’ को इमरान खान के भाषण में उम्मीद नजर आती है. अखबार कहता है कि पाकिस्तान के सामने कभी इतनी चुनौतियां नहीं थीं जितनी आज हैं. अखबार के मुताबिक देश पर तीस हजार अरब रुपए का कर्जा है जिसके लिए हर रोज छह अरब रुपये का ब्याज अदा किया जा रहा है.

अखबार लिखता है कि राजनेताओं, जनता और ब्यूरोक्रेसी, सब को बदलना होगा, क्योंकि अगर खुद को बदलेंगे नहीं तो तरक्की नहीं होगी और नामुमकिन को मुमकिन बनाने के लिए बदलना ही होगा.

पीएम हाउस बनेगा यूनिवर्सिटी

उधर रोजनामा ‘जसारत’ ने इमरान खान सरकार के एक और फैसले पर सवाल उठाया है. अखबार लिखता है कि शिक्षा मंत्री शफकत महमूद ने एक टीवी प्रोग्राम में बताया है कि पीएम हाउस को यूनिवर्सिटी में तब्दील किया जा रहा है जबकि चारों प्रांतों में गवर्नर हाउस म्यूजियम में तब्दील किए जाएंगे और उन पर टिकट लगेगा.

अखबार कहता है कि इमरान खान को पीएम हाउस में नहीं रहना है तो ना रहें, उसे खाली छोड़ दें, लेकिन उसे यूनिवर्सिटी बनाने की कोई तुक नहीं है. अखबार कहता है कि पीएम हाउस पर होने वाले बड़े खर्चे जरूर एक मुद्दा है और इमरान खान किसी छोटी जगह पर रह कर उनमें कटौती कर सकते हैं, लेकिन इस इमारत को वह किसी और मकसद के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते. अखबार के मुताबिक पीएम हाउस देश की संपत्ति है और इसीलिए उसके बारे में इस तरह का फैसला नहीं लिया जा सकता.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi