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सऊदी अरब और ईरान के बीच जंग की आशंकाओं से क्यों घबराया पाकिस्तान

पाकिस्तानी उर्दू अखबार इससे फिक्रमंद हैं कि अगर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ने ईरान को काबू करने की कोशिशें नहीं की तो उसके साथ सऊदी अरब की जंग तय है

Seema Tanwar Updated On: Apr 03, 2018 12:42 PM IST

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सऊदी अरब और ईरान के बीच जंग की आशंकाओं से क्यों घबराया पाकिस्तान

पाकिस्तान में समस्याओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन पाकिस्तान के उर्दू मीडिया को सऊदी अरब और ईरान के बीच बढ़ते तनाव की चिंता सता रही है. अमेरिका के दौरे पर गए सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के इस बयान को लेकर कई अखबार फिक्रमंद हैं कि अगर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ने ईरान को काबू करने की कोशिशें नहीं की तो उसके साथ सऊदी अरब की जंग तय है.

पाकिस्तान की मुश्किल यह है कि सऊदी अरब और ईरान के बीच जारी तनाव में वह अब तक तो जैसे-तैसे खुद को तटस्थ दिखाता रहा है, लेकिन अगर बात आगे बढ़ती है तो उसके लिए तटस्थ रहना मुश्किल होगा. एक तरफ सऊदी अरब से पाकिस्तान को मोटी आर्थिक मदद मिलती रही है तो दूसरी तरफ वह ईरान से भी पंगा नहीं लेना चाहता है, जिसके साथ उसके अशांत प्रांत बलूचिस्तान की सीमाएं मिलती हैं.

खतरनाक बयान

रोजनामा ‘उम्मत’ ने सऊदी क्राउन प्रिंस के बयान को खतरनाक और हैरतअंगेज बताया है. अखबार कहता है कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि सीरिया में अमेरिकी फौजों की मौजूदगी के जरिए ही ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सकता है.

अखबार के मुताबिक एक अमेरिकी अखबार को दिए इंटरव्यू में एक तरफ सऊदी युवराज ने ईरान के खिलाफ प्रतिबंध लगाने को जरूरी बताया है तो अरब दुनिया में सक्रिय मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकवादियों का समर्थन करने वाला संगठन बताया है.

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नवा-ए-वक्त’ लिखता है कि अगर ईरान को लेकर प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का बयान सही है तो यह मध्य पूर्व (मि़डिल ईस्ट) में आने वाली खौफनाक तबाही की तरफ इशारा करता है. अखबार के अनुसार ऐसे किसी भी टकराव में अमेरिका और यूरोप की यहूदी हथियार फैक्ट्रियों में बने हथियार ही इस्तेमाल होंगे और इससे इस्लाम विरोधी ताकतों की अर्थव्यवस्थाएं मजबूत होंगी.

अखबार ने सऊदी अरब से कहा है कि वह 'ईरान को सीमित करने' के लिए अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को पुकारने की बजाय अपनी आपत्तियां मुस्लिम बिरादरी के सामने रखे. लेकिन यहां सवाल भी पूछा जाना चाहिए अगर मुस्लिम देश अपने झगड़े सुलझाने में इतने ही सक्षम होते तो अरब दुनिया के कई देश ताकत का अखाड़ा ना बने होते.

बर्बादी और तबाही

वहीं रोजनामा ‘पाकिस्तान’ लिखता है कि जब से प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान क्राउन प्रिंस बने हैं और जब से उन्हें यकीन हो गया है कि वही सऊदी शाह बनेंगे, तब से वह ऐसी तब्दीलियां कर रहे हैं जिनकी अब से पहले सऊदी अरब में किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. इसमें अखबार ने महिलाओं को ड्राइविंग की अनुमति देने, महिलाओं को खेलों में प्रोत्साहन देने और सिनेमा घर बनाने जैसे कदमों को गिनाया है.

अखबार लिखता है कि जंग की बात करने वाले क्राउन प्रिंस के रवैये से पता चलता है कि सऊदी अरब और ईरान के बीच रिश्तों में बेहतरी के कोई आसार नहीं हैं. अखबार लिखता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के सऊदी दौरे के बाद से सऊदी-ईरान रिश्ते लगातार खराब होते गए हैं. अखबार लिखता है अंतरराष्ट्रीय दखल और सीरिया में अमेरिकी सेना उतारने की पैरवी करने वाले सऊदी क्राउन प्रिंस को क्या इस बात का ईल्म (जानकारी) नहीं है कि जहां-जहां अमेरिकी सेना गई है, वहां क्या हाल हुआ है.

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अखबार के संपादकीय की आखिरी लाइन है- अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच जंग शुरू हो जाती है तो कितनी तबाही और बर्बादी होगी, यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं, तो क्या ऐसे में कोई देश आगे बढ़ कर होनी को रोक सकता है?

नाकाबिल पार्टियां

वहीं पाकिस्तान में चुनावी सुगबुगाहट के बीच रोजनामा ‘वक्त’ का संपादकीय है- 70 राजनीतिक पार्टियां लेकिन चुनाव लड़ने के काबिल सिर्फ 34. अखबार लिखता है कि नए इलेक्शन एक्ट के तहत पार्टियों के लिए रजिस्ट्रेशन के लिए 2 हजार पुष्ट कार्यकर्ताओं की लिस्ट और 2 लाख रुपए की फीस की शर्त ने चुनावी मौसम में कुकुरमुत्तों की तरह उगने वाली पार्टियों को चुनाव की दौड़ से बाहर कर दिया है. अखबार ने पाकिस्तानी चुनाव आयोग के हवाले से लिखा है कि उसके पास 70 पार्टियां रजिस्टर्ड हैं जिनमें से सिर्फ 34 ही अब चुनाव लड़ सकती हैं.

अखबार लिखता है कि चुनाव नजदीक आ रहा है लेकिन चंद बड़ी राजनीतिक पार्टियां के अलावा कहीं कोई सरगर्मी नहीं दिखती. अखबार की राय है कि अभी तक जो पार्टियां सिर्फ नाम मात्र की हैं, वो अपनी मौजदूगी का अहसास कराएं और लोकतांत्रिक तकाजों को पूरा करते हुए अपना घोषणापत्र बनाएं और जनता की सेवा करें.

घटे तेल के दाम

वहीं 'जंग' और 'एक्सप्रेस' जैसे अखबारों ने अपने संपादकीय में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में मामूली कमी पर संपादकीय लिखे हैं. 2 रुपए 7 पैसे की कमी के बाद एक लीटर पेट्रोल 86 (पाकिस्तानी) रुपए में मिलेगा जबकि हाई स्पीड डीजल 96 रुपए 45 पैसे में. वहीं लाइट डीजल 65 रुपए 30 पैसे और केरोसिन ऑयल 76 रुपए 45 पैसे प्रति लीटर मिलेगा.

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एक्सप्रेस’ कहता है कि तेल की घटती बढ़ती कीमतों का सीधा असर जनता पर होता है, इसलिए अच्छा होगा कि उन्हें साल में एक ही बार तय कर लिया जाए.

जंग’ लिखता है कि जिन लोगों के पास रसोई गैस नहीं है, उनके घरों के लिए केरोसिन ऑयल ही ईंधन है, इसलिए उसके दाम कम किए जाएं.

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