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भारत-नेपाल के बीच आखिर कैसे उठ खड़ी हुई चीन की दीवार?

चीन ने अपना जाल फैला कर नेपाल को इस कदर उलझा लिया है कि उसे अभी भविष्य की आर्थिक गुलामी का अहसास नहीं है

Updated On: Sep 11, 2018 10:46 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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भारत-नेपाल के बीच आखिर कैसे उठ खड़ी हुई चीन की दीवार?
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नेपाल को सैन्य अभ्यास करने के लिये नया पार्टनर मिल गया है. इस नए पार्टनर के लिये चीन ने छह देशों के साथ होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यास को ठुकरा दिया है. नेपाल ने बिम्सटेक देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यास में शामिल होने से मना कर दिया है. लेकिन वो चेंगदू में चीन के साथ 12 दिनों तक सैन्य अभ्यास करेगा. नेपाल ने भारत की दोस्ती को दरकिनार करते हुए चीन के प्रति अपने रिश्तों की तरजीह सामने रख दी है. जाहिर तौर पर भारत के लिये  ये नेपाल का बड़ा झटका है क्योंकि भारत और नेपाल के रिश्तों के बीच चीन की दीवार उठना शुरू हो गई है.

नेपाल की ओली सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही नेपाल लगातार चीन के दुष्चक्र में फंसता जा रहा है. अभी तक नेपाल में चीन के निवेश और कारोबार को नेपाल की सरकार प्राथमिकता दे रही थी तो अब सैन्य सहयोग के मामले में भी उसे ड्रैगन दिखाई दे रहा है.

चीन से बढ़ती नेपाल की नजदीकी की कीमत भारत को ही चुकानी पड़ सकती है. ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि आखिर नेपाल का किया क्या जाए? क्या दिल्ली-काठमांडू की दोस्ती एक्सप्रेस पटरी से उतर गई या फिर संबंधों का प्लेटफार्म पीछे छोड़ गई?

चेंगदू में चीन के साथ नेपाल 12 दिनों तक सैन्य अभ्यास करेगा जबकि पुणे में बिम्सटेक देशों के सैन्य अभ्यास को नेपाल ने ना कहा. माना जा रहा है कि बिम्सटेक को लेकर भारत की तरफ से रक्षा और सुरक्षा सहयोग को नेपाल नाकाफी मानता है. जिस वजह से उसने सैन्य अभ्यास में शामिल होने से इनकार कर दिया. लेकिन ये फैसला इतना आसान नहीं था और न ही इसके पीछे ऐसी कोई सामान्य वजह दिखाई देती है.

मई 2018 में नेपाल पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली. ( रॉयटर्स )

मई 2018में नेपाल पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली.   रॉयटर्स )

नेपाल ये भूल गया कि पीएम मोदी ने ही नेपाल में बिम्सटेक की बैठक में सदस्य देशों के संयुक्त अभ्यास की बात की थी. लेकिन ऐसी भूल करना नेपाल के लिए इतिहास में न भूलने वाली भूल साबित हो सकता है. भारत को अगर नेपाल इस तरह से चीन के नाम पर चिढ़ाने का काम करेगा तो संबंधों में अविश्वास बढ़ता जाएगा.

दरअसल, नेपाली सेना के भारत में आने के बाद आखिरी समय में नेपाल सरकार का ये फैसला कुछ और ही इशारा करता है. नेपाल के इस फैसले के पीछे ड्रैगन का दांव दिखाई देता है. नेपाल के इस फैसले से लगता है कि नेपाली सरकार अब चीन के इशारे पर भारत के साथ रिश्ते तय करेगी. लेकिन भारत के प्रति अविश्वास दिखा कर संबंधों को लेकर सौदेबाजी करना नेपाल को भविष्य में किसी गंभीर संकट में डाल सकती है और वहां से उबरने के लिये भी उसे भारत की ही जरूरत पड़ेगी.

नेपाल की सत्ता में पहली दफे वामपंथी दलों की सरकार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई है. वामपंथी नेता और नेपाल के पीएम केपीएस ओली का झुकाव चीन की तरफ ही है. चीन ने नेपाल में ओली सरकार के आने के बाद भारत विरोधी दुष्प्रचार को हथियार बनाया. भारत के खिलाफ एक माहौल तैयार किया गया ताकि चीन के साथ ओली सरकार की दोस्ती को सही और जरूरी साबित किया जा सके. वहीं ओली ने भी चुनाव में भारत विरोधी हवा का फायदा उठाया था.

दरअसल इसकी शुरुआत साल 2015 में मधेसी आंदोलन के वक्त से हुई. मधेसी आंदोलन के वक्त भारत ने नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी की थी. आर्थिक नाकेबंदी की वजह से नेपाल में रोजमर्रा की चीजों की कमी होने लगी. जिसके लिये भारत को जिम्मेदार ठहराते हुए भारत विरोधी हवा बनती चली गई. उस वक्त भी नेपाल में केपीएस ओली की ही सरकार हुआ करती थी. ओली सरकार ने आर्थिक नाकेबंदी का नेपाल में जबरदस्त राजनीतिक इस्तेमाल किया और भारत के विकल्प के तौर पर चीन को ट्रांजिट ट्रेड के जरिये औपचारिक एन्ट्री दे दी.

लेकिन इस समझौते से एक दशक पहले से ही चीन नेपाल में अपनी जमीन तैयार करने में जुटा हुआ था. इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी से जुड़े प्रोजेक्ट हासिल कर चीन अपना दखल बढ़ाता रहा. अब भले ही ये कहा जाए कि माओवादी सरकार की वजह से नेपाल में चीन का प्रभुत्व बढ़ रहा है लेकिन ये भारत की तरफ से भी कूटनीतिक विफलता ही मानी जाएगी कि भारत विरोधी सुर नेपाल की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हावी होते चले गए. आज हालात ये हो गए हैं कि नेपाल खुल कर भारत का हाथ झटक रहा है और काठमांडू के रेलवे स्टेशन पर चीन की ट्रेन का वेलकम करना चाहता है. नेपाल की हड़बड़ाहट को देखकर ऐसा  लगता है जैसे चीन के मायाजाल में फंसने के बाद उसे भारत के साथ ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्तों की विरासत नहीं दिखाई दे रही.

हाल ही में पीएम मोदी ने रिश्तों को पटरी पर लाने के लिये जनकपुर से अयोध्या के बीच बस सेवा की भी शुरुआत की. खुद नेपाल के पीएम ओली भी दोबारा पीएम बनने के बाद सबसे पहले भारत की यात्रा पर आए. लेकिन इसके बावजूद नेपाल का भारत को लेकर बदलता रुख अब ये जता रहा है कि दोनों के रिश्तों के बीच चीन की दीवार खड़ी हो चुकी है.

एशिया की महाशक्ति के रूप में चीन के प्रभुत्व को नेपाल स्वीकार कर चुका है. नेपाल एक वैकल्पिक देश के तौर पर चीन को अपना रहा है ताकि धीरे-धीरे भारत का दखल नेपाल से कम होता जाए. दरअसल, ये नेपाल सरकार की संकीर्ण सोच है जो कि चीन के छलावे में पूरे नेपाल के भविष्य को गिरवी रखने की तैयारी कर रही है. वन बेल्ट वन रोड परियोजना उसी मायाजाल और छलावे का बड़ा हिस्सा है. तभी नेपाल ने भारत की आपत्ति के बावजूद चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना से जुड़ने का फैसला कर लिया.

नेपाल की वामपंथी सरकार अब तेल जैसी दूसरी जरूरी चीजों के आयात-निर्यात के लिये भारत की बजाए चीन के बंदरगाहों का इस्तेमाल करना चाहती है. समुद्री रूट के अलावा नेपाल चीन के साथ हाइवे, हवाई सेवा और ट्रेन रूट से जुड़ी योजनाओं पर भी काम कर रहा है. ल्हासा से काठमांडू और काठमांडू से पोखरा और लुम्बिनी तक चीन रेल लाइन बिछाना चाहता है.

ऐसा नहीं है कि भारत ने नेपाल के प्रति उदासीन रवैया अपना रखा है. भारत लगातार नेपाल में निवेश को बढ़ा रहा है. लंबित प्रोजेक्ट को पूरा करने में जुटा हुआ है. भारत ने नेपाल को आवंटित करने वाली राशि में भारी बढ़ोतरी की है. इसके बावजूद चीन के प्रति नेपाल सरकार के झुकाव की असली वजह वहां की वामपंथी सरकार है जिसके लिये चीन एक उदाहरण है.

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चीन के प्रीमियर ली केकियांग के साथ नेपाली प्रधानमंत्री केपी ओली ( रॉयटर्स )

आज नेपाल में भारत से ज्यादा चीन के पर्यटक नजर आते हैं तो नेपाल के भीतर महत्वपूर्ण परियोजनाओं में चीनी कंपनियों का निवेश दिखाई देता है. चीन ने अपना जाल फैला कर नेपाल को इस कदर उलझा लिया है कि उसे अभी भविष्य की आर्थिक गुलामी का अहसास नहीं है.

नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद तेजी से राजनीतिक हालात बदले. नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद भारत हमेशा ही बड़े भाई की भूमिका में साथ खड़ा रहा. इसके बावजूद ओली सरकार ने भारत पर नेपाल के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाया. जबकि सच्चाई ये रही कि चीन और पाकिस्तान ने मिल कर भारत-नेपाल के रिश्तों में दरार डालने का काम किया.

अब भारत का सबसे पड़ौसी देश ड्रैगन के साथ सैन्य अभ्यास करने जा रहा है. भारत के लिये नेपाल का बदलता ये चेहरा वाकई चिंताजनक है. अगर नेपाल ड्रैगन के हाथों में पूरी तरह चला गया तो भारत के लिये नेपाल से शुरू होने वाली मुसीबतों का फिर अंत नहीं होगा. ऐसे में भारत को बेहद सतर्कता के साथ नेपाल के साथ रिश्तों को लेकर नया फॉर्मूला बनाने की जरुरत है ताकि भारत के लिये नेपाल से सटी सीमाएं सिरदर्द न बन सकें.

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