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नेपाल में वाम मोर्चा: स्थिरता का जनादेश, भारत के लिए राजनयिक चुनौती

नेपाल के ताजा संविधान के तहत बनने वाली अगली सरकार के खिलाफ चूंकि दो साल से पहले अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकेगा इसलिए ओली सरकार अधिक मजबूत और स्थिर होगी

Anant Mittal Updated On: Dec 14, 2017 04:09 PM IST

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नेपाल में वाम मोर्चा: स्थिरता का जनादेश, भारत के लिए राजनयिक चुनौती

नेपाली कांग्रेस का सूपड़ा साफ करके नेपाल में वामपंथी मोर्चे को मिला निर्णायक बहुमत, जहां भारत की नींद हराम कर सकता है, वहीं पहाड़ी देश में बहुप्रतीक्षित राजनीतिक स्थिरता भी कायम करेगा. वाम गठबंधन ने नेपाल की संसद यानी प्रतिनिधि सभा की 165 प्रत्यक्ष चुनाव वाली सीटों में दो-तिहाई से अधिक यानी 113 सीट जीत ली हैं. भंग सदन में सबसे अधिक सदस्यों वाली नेपाली कांग्रेस के पल्ले 21 प्रत्यक्ष सीट ही आई हैं. संसदीय चुनाव में दो मधेसी दल 19 सीट जीते हैं. राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल की 10 पर और फेडरल सोशलिस्ट फोरम नेपाल की नौ सीट पर जीत हुई है. अप्रत्यक्ष आनुपातिक 110 सीटों के लिए वोटों की गिनती में नेपाली कांग्रेस दूसरे नंबर पर और सीपीएन-यूएमएल सबसे आगे है.

इस तरह पूर्व प्रधानमंत्रियों केपी ओली और पुष्पकमल दहल उर्फ प्रचंड की अगुआई वाली क्रमश: सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन-माओवादी पार्टियों का साझा वाममोर्चा नेपाल के संसदीय और प्रांतीय चुनावों में बहुमत पाकर सत्ता संभालने को तैयार है. इसके साथ ही 11 साल लंबी राजनैतिक अस्थिरता के दौरान 10 प्रधानमंत्री झेलने की त्रासदी से भी नेपाल मुक्ति पाएगा. वाम मोर्चे की सरकार, ओली के नेतृत्व में इस महीने बनने के आसार हैं. उनके नेतृत्व में, नेपाल के 2015 में अंगीकृत गणतांत्रिक संविधान के तहत यह पहली चुनी गई सरकार बनेगी.

और मजबूत होगी ओली सरकार

नेपाल के ताजा संविधान के तहत बनने वाली अगली सरकार के खिलाफ चूंकि दो साल से पहले अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकेगा इसलिए ओली सरकार अधिक मजबूत और स्थिर होगी. इसके लिए उन्हें अपने गठबंधन के साथी सीपीएन-माओवादी को तो साध कर रखना ही होगा. यूं भी वाम मोर्चे का नारा था 'समृद्धि के लिए स्थिरता'.

इसी पर रीझकर नेपाली जनता ने चूंकि अपने वोटों के बूते वाम मोर्चे की झोली सत्ता से लबालब कर दी है, इसलिए एकता को निभाना उसकी मजबूरी है. यह बात दीगर है कि वाम मोर्चे के दोनों घटक उग्रवाद के दिनों में एक-दूसरे के खून के प्यासे होते थे. इन्होंने मधेसी आंदोलन में ट्रकबंदी से नेपालियों में भड़की भारत विरोधी भावनाओं को दुहने के लिए बीते अक्टूबर में वाम एका कर लिया था.

वाम मोर्चा अब संसद यानी प्रतिनिधि सभा ही नहीं बल्कि सात में से छह प्रांतीय विधानसभाओं में भी जीत गया है. इतनी बड़ी जीत की बदौलत वाम मोर्चे की सरकार को अब कम से कम बाहर से कोई खतरा नहीं रहेगा.

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ऐतिहासिक रहा ये चुनाव

नेपाल का यह चुनाव इसलिए भी ऐतिहासिक है कि 1999 के 18 साल बाद यह पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनेगी. इसे कमोबेश निष्पक्ष और स्वतंत्र बताया जा रहा है. इसमें एक करोड़, 22.5 लाख मतदाताओं के लिए 15,344 पोलिंग बूथ पर वोट डालने के इंतजाम किए गए थे. मतदान प्रक्रिया में कुल 1,70,000 कर्मचारी शामिल थे.

यह तीन स्तरीय चुनाव सात दिसंबर को संपन्न हुआ. इसमें स्थानीय निकायों के लिए 75 फीसद और संसदीय एवं प्रांतीय विधानसभाओं के लिए 68 फीसद वोट पड़े. स्थानीय निकाय चुनाव इसी साल 14मई, 28 जून और 18 सितंबर को हुए थे. इनके तहत छह मेट्रोपॉलिटन शहरों, 11 उपमहानगरों, 276 नगर पालिकाओं और 460 ग्रामीण नगर पालिकाओं के लिए कुल 75 प्रतिशत वोट पड़े थे.

नेपाली संसद के दो सदन होंगे. इनमें प्रतिनिधि सभा के 275 सदस्यों में से 165 प्रत्यक्ष मतदान और 110 परोक्ष मत प्रणाली से चुने गए हैं. राष्ट्रीय पंचायत, संसद का दूसरा सदन है. इस सदन के लिए निर्वाचन विधि पर गंभीर मतभेदों के कारण इसके गठन का विधेयक भी अभी तक पारित नहीं हुआ. हालांकि इसमें 59 सदस्य होंगे. इसमें हरेक प्रांत के विधायक, आठ सदस्यों को चुनेंगे. बाकी तीन सदस्यों को राष्ट्रपति नामांकित करेंगे. सात प्रांतीय विधान सभाओं में कुल 550 सदस्य हैं. इनमें से 330 सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचित और 220 परोक्ष मत प्रणाली से चुने गए.

अंतिम परिणाम आने के साथ ही नवंबर 2006 में शुरू राजनीतिक प्रक्रिया निपट जाएगी. राजनीतिक स्थिरता ने गरीबी से त्रस्त इस पहाड़ी देश में आर्थिक तरक्की के आसार बनेंगे. प्रचंड के नेतृत्व वाले विद्रोही माओवादियों के साथ समग्र शांति समझौते ने यह प्रक्रिया शुरू की थी. इसके तहत नेपाल को हिंदू राष्ट्र के बजाए संघीय गणतांत्रिक देश घोषित किया गया था. साथ ही राजशाही को खत्म कर दिया गया.

पहली संविधान सभा 2008 में दो साल के लिए चुनी गई. कार्यकाल कई बार बढ़ाने के बावजूद संविधान सभा को नया संविधान देने में नाकामी ही मिली. नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने साल 2012 में संविधान सभा को बरखास्त कर दिया. नई संविधान सभा का 2013 में गठन किया. दूसरी संविधान सभा ने 2015 में ही नया संविधान बना कर देश को सौंप दिया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के कड़े रूख के मद्देनजर देश के राजनीतिक दलों ने संविधान सभा के सामने पेश आए अधिकतर विवादित मुद्दों को सुलझाने की जिम्मेदारी नवनिर्वाचित सरकार पर डाल दी.

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सरकार के सामने नई चुनौतियां

अब नई सरकार को संविधान संशोधन जैसी चुनौतियां झेलनी पड़ेंगी. संशोधनों की यह मांग उन नस्लीय और भाषाई समूहों द्वारा की गई हैं जो साल 2015 में अंगीकृत नए संविधान के विरूद्ध आंदोलनरत थे. इनमें गणतंत्र के प्रांतों का पुनर्गठन, उनकी राजधानी ओर प्रशासनिक ढांचा तय करना और उनका नामकरण भी शामिल है. इनके साथ ही अगली सरकार को मधेसियों तथा कुछ जनजाति समूहों की उन मांगों का निवारण भी करना होगा जिनके लिए उन्होंने 2015 में लंबा आंदोलन किया था.

नेपाल में फिर से ओली के नेतृत्व में सरकार बनने पर भारत सरकार के सामने नई राजनयिक पहल करने के अलावा कोई चारा नहीं है. हालांकि 2006 में नेपाल में विद्रोही प्रचंड को मुख्यधारा में लाकर उन्हें प्रधानमंत्री बनवाने और उनकी सरकार के गठन में भारत का ही हाथ था. भारत ने ही अपनी चहेती नेपाली कांग्रेस से उन्हें समर्थन दिलाया था. दूसरी तरफ 2015 में ओली की सरकार के नौ महीने में ही संसद में अल्पमत के कारण गिरने का ठीकरा भी भारत के ही सिर फूटा था.

ओली प्रधानमंत्री थे तभी संविधान को मंजूरी देते समय उसके कुछ प्रावधानों के खिलाफ तराई में प्रबल मधेसी आंदोलन छिड़ा था. आंदोलन के दौरान ट्रकबंदी का दोष भी भारत के ही माथे मढ़ा गया था. उससे बौखलाए प्रधानमंत्री ओली ने भारत को झटक कर पहली बार चीन से पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद, उसकी सड़कों और बंदरगाहों के रास्ते माल नेपाल लाने-ले जाने के समझौतों पर बातचीत कर ली थी.

भारत को दिखाना होगा बड़प्पन

यह बात दीगर है कि बाद में भारत का रूख नर्म होने पर चीन से उन समझौतों पर नेपाल सरकार ने अमल नहीं किया. हालांकि केपी ओली को चीन से इस गर्मजोशी का इस चुनाव में भारत विरोधी नेपाली भावनाओं को भुनाने में भरपूर लाभ मिला. यूं भी नेपाल की भारत पर निर्भरता खत्म करने के लिए चीन उसकी हर तरह से मदद को तैयार है. इसलिए केपी ओली की सरकार भी चीन से दोस्ती का हाथ बढ़ा सकती है. मालदीव के बाद चीन यदि नेपाल को भी भारत से झटकने में कामयाब रहा तो हमारी सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी.

इसमें कोई शक नहीं कि वाम मोर्चा सरकार के प्रचंड नीत घटक के जरिए भारत उसकी चाल को साध सकता है. इसमें नेपाल और भारत की साझा सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक विरासत की दुहाई भी काम आ सकती है. बौद्ध और सनातन धर्म दोनों देशों की जड़ों में समाए हैं मगर कम्युनिस्ट विचारधारा तो निरीश्वरवादी है. नेपालियों के लिए रोजगार की गुंजाइश चीन में भले बढ़ रही हो मगर नेपाली औरत-मर्द लाखों की तादाद में भारत के घर-गांव में रोजगार में लगे हुए हैं. इसलिए कुल मिलाकर भारत सरकार को ही बड़प्पन दिखाना होगा. उसके लिए नेपाल में साल 2006 से अपनाई जा रही प्रचंड कूटनीति की जगह नरमी अख्तियार करना ही उपयुक्त रहेगा.

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