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प्रधानमंत्रियों को ठोकर मारकर क्यों हटाता है पाकिस्तान?

कार्यकाल पूरा करना तो अलग रहा, ज्यादातर प्रधानमंत्री या तो हटाए गए या किसी वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा

Pramod Joshi Updated On: Jul 28, 2017 04:33 PM IST

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प्रधानमंत्रियों को ठोकर मारकर क्यों हटाता है पाकिस्तान?

नवाज शरीफ का मामला क्या था, उसमें कितना सच था, क्या वास्तव में उनके साथ न्याय हुआ, ऐसी बातें सोचने के अलावा यह देखने की जरूरत भी है कि पाकिस्तान में कोई प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा क्यों नहीं कर पाता? वहां आज तक एक ऐसा प्रधानमंत्री नहीं हुआ है, जिसने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया हो.

कार्यकाल पूरा करना तो अलग रहा, ज्यादातर प्रधानमंत्री या तो हटाए गए या किसी वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. पहली नजर में लगता है कि पाकिस्तान की न्याय-व्यवस्था ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा फैसला किया है. पर क्या केवल इतनी सी बात है? लोकतंत्र वहां की पसंदीदा व्यवस्था नहीं है और अराजकता वहां का स्वभाव है.

दो साल पहले पाकिस्तानी संसद ने देश की फौजी अदालतों को आतंकी मामलों की सुनवाई करने का अधिकार दिया. वहां के सुप्रीम कोर्ट को इस में कोई खराबी नहीं लगी. ऐसी ही एक अदालत ने भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को मौत की सजा सुनाई है.

पाकिस्तानी फौजी अदालत ने ऐसा करते हुए हर तरह के न्याय सिद्धांतों तो ताक पर रख दिया. हम उस पर कोई आपत्ति व्यक्त नहीं कर सकते, क्योंकि वह कानून वहां की संसद ने पास किया था और वहां के सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अनुमति दी.

नवाज शरीफ को मिलाकर पाकिस्तान में 26 प्रधानमंत्री हुए हैं. वे यदि एक साल और अपना कार्यकाल पूरा कर लेते तो ऐसा कर पाने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री होते.

Nawaz Sharif

70 साल में 26 वज़ीरे आज़म हुए

पिछले 70 साल से पाकिस्तान को एक ऐसी लोकतांत्रिक सरकार का इंतजार है, जो पांच साल चले. 70 साल में बमुश्किल बीसेक साल चले जम्हूरी निजाम में वहां 26 वजीरे आजम हुए हैं.

पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खां की हत्या हुई. उनके बाद आए सर ख्वाजा नजीमुद्दीन बर्खास्त हुए. फिर आए मोहम्मद अली बोगड़ा. वे भी बर्खास्त हुए. 1957-58 तक आने-जाने की लाइन लगी रही.

वास्तव में पाकिस्तान में पहले लोकतांत्रिक चुनाव सन 1970 में हुए. पर उन चुनावों से देश में लोकतांत्रिक सरकार बनने के बजाय देश का विभाजन हो गया और बांग्लादेश नाम से एक नया देश बन गया.

सन 1973 में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के प्रधानमंत्री बनने के बाद उम्मीद थी कि शायद अब देश का लोकतंत्र ढर्रे पर आएगा. ऐसा नहीं हुआ. सन 1977 में जनरल जिया-उल- हक ने न केवल सत्ता पर कब्जा किया, बल्कि ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर भी चढ़वाया.

General-Zia-ul-Haque

जिया-उल हक

पाकिस्तान की कट्टरपंथी हवाओं का श्रेय जिया-उल हक को जाता है

आज पाकिस्तान में जो कट्टरपंथी हवाएं चल रहीं हैं, उनका श्रेय जिया-उल हक को जाता है. देश को धीरे-धीरे धार्मिक कट्टरपंथ की ओर ले जाने में उस दौर का सबसे बड़ा योगदान है.

अस्सी के दशक में फिर से देश में लोकतांत्रिक सरकार लाने का आंदोलन चला. अंततः 1985 में चुनाव हुए और मुहम्मद जुनेजो प्रधानमंत्री बने. उसी दौरान वहां की संसद ने देश के राष्ट्रपति को सरकारें बर्खास्त करने का अधिकार दे दिया. इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए एक के बाद एक सरकारें बर्खास्त होने लगीं.

सन 1999 में परवेज़ मुशर्रफ की फौजी बगावत के वक्त यह स्पष्ट था कि इस देश का लोकतंत्र से कोई वास्ता ही नहीं है. नवाज शरीफ सरकार की बर्खास्तगी पर लोग सड़कों पर नाच रहे थे.

जम्हूरियत की लहर फिर भी चलती रही. सन 2008 के बाद जब परवेज मुशर्रफ ने लोकतंत्र का रास्ता पूरी तरह साफ किया और खुद हट गए, तब लगा कि शायद लोकतंत्र अब जड़ें जमाएगा. पर चुनाव प्रचार के दौरान ही बेनजीर भुट्टो की हत्या हो गई.

उस खूनी चुनाव के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को बहुमत मिला, मार्च 2008 में यूसुफ रजा गिलानी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लगा कि वे पांच साल पूरे करेंगे. पर जून 2011 में ऐसी साजिश में जिसमें वहां की अदालत भी शामिल थी, चुने हुए प्रधानमंत्री को हटा दिया गया.

आज नवाज शरीफ पर सम्पत्ति जमा करने का आरोप है. पर युसुफ रजा गिलानी को प्रधानमंत्री पद से हटाने के पीछे कोई बड़ी वजह नहीं थी. वहां की अदालत चाहती थी कि राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी के खिलाफ मुकदमे चलाने के लिए स्विट्ज़रलैंड को चिट्ठी लिखी जाए.

इस मांग के पीछे भी नवाज़ शरीफ और इमरान खां थे. इन दोनों को गिलानी की गर्दन की जरूरत थी. उन्होंने यह नहीं देखा कि देश में कौन सी परंपरा पड़ रही है.

परवेज़ मुशर्रफ ने जब तख्ता पलट किया था, तब नवाज शरीफ भाग्यशाली रहे. वरना जिस तरह ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दी गई थी, उसी तरीके से उन्हें भी मिल सकती थी.

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ज़ुल्फिकार अली भुट्टो

पाकिस्तान में लोकतंत्र तो आया लेकिन चलने नहीं दिया गया

पाकिस्तान का दुर्भाग्य है कि वहां जब भी लोकतंत्र आया तो उसे चलने नहीं दिया गया. इसके विपरीत जितनी बार वहां फौजी सरकार आई न्यायपालिका ने कभी गैर-कानूनी करार नहीं दिया.

युसुफ रज़ा गिलानी को पद से हटाने का आदेश देने वाली अदालत में मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी समेत अनेक जज ऐसे थे, जिन्होंने परवेज़ मुशर्रफ की फौजी सरकार को वैधानिक करार दिया था.

पाकिस्तानी सत्ता में हर बदलाव के पीछे कहीं-न-कहीं सेना का हाथ होता है. वहां जनता के मन में राजनीति के प्रति एक प्रकार की वितृष्णा पैदा कर दी गई है. इसे पैदा करने में राजनेताओं की भूमिका भी है. इमरान खां खुले आम कह चुके हैं कि सेना को सत्ता हाथ में ले लेनी चाहिए.

general ayub khan

जनरल अयूब खां

9 साल लगे संविधान लागू होने में और दो साल में खत्म

भारत का संविधान 1949 में तैयार होकर 1950 में लागू भी हो गया, पर पहले पाकिस्तानी संविधान को लागू होने में नौ साल लगे. वह भी दो साल में रफा-दफा हो गया. सन 1962 में दूसरा और फिर 1973 में तीसरा संविधान बनाया गया जो आज लागू है.

1956 में संविधान लागू होने के दो साल बाद राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्ज़ा ने फौजी शासन लागू कर दिया. यह दुनिया में अपने किस्म अनोखा कारनामा था. नागरिक सरकार का राष्ट्रपति कह रहा था कि लोकतंत्र नहीं चलेगा. इस कारगुजारी का इनाम तीन हफ्ते के भीतर जनरल अयूब खां ने इस्कंदर मिर्ज़ा को बर्खास्त कर दिया और खुद राष्ट्रपति बन गए.

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