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पीएम की नेपाल यात्रा: चीन की तरफ झुकते पड़ोसी का विश्वास वापिस हासिल करना होगा

अपने पूर्व के कार्यकाल में नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने स्पष्ट कर दिया था कि वो प्रधानमंत्री के रूप में भारत के खिलाफ चीन कार्ड खेलने से कोई परहेज नहीं करेंगे

Parul Chandra Updated On: May 11, 2018 09:15 AM IST

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पीएम की नेपाल यात्रा: चीन की तरफ झुकते पड़ोसी का विश्वास वापिस हासिल करना होगा

2014 में जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठे तो उन्होंने सबसे पहले अपने पड़ोसियों से रिश्ते सुधारने की पहल की. सरकार संभालने के तीन महीने बाद ही मोदी अपने पड़ोसी देश नेपाल के दौरे पर निकले. मोदी के नेपाल दौरे के वक्त ये लग रहा था कि इस दौरे के सफल दौरे में तब्दील होने के सारे गुण मौजूद हैं क्योंकि किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का नेपाल दौरा 2014 के 17 साल पहले हुआ था इसलिए दोनों पक्षों को इस दौरे से ढेरों उम्मीदें थीं. दोनों देशों के बीच सकारात्मक माहौल था और भारत की ओर से नेपाल को इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काफी मदद का आश्वासन दिया गया था और साथ ही में मोदी ने एक बिलियन डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट देने की घोषणा की थी.

मोदी का ये नेपाल दौरा मोदी सरकार की नयी विदेश नीति ‘नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी का अहम हिस्सा था. मोदी के दौरे से उम्मीदें बंधी थीं कि भारत और नेपाल के बीच का संबंध नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा. ऐसा इसलिए समझा जा रहा था क्योंकि भारत और नेपाल के बीच के संबंध पारंपरिक रूप से गहरे और बहुआयामी प्रकृति के रहे हैं. भारत के इस उत्तरी पड़ोसी देश का भारत के लिए इसलिए भी काफी महत्व है क्योंकि नेपाल के साथ इसकी लंबी सीमा लगी हुई है और ये सीमा अधिकतर छिद्रयुक्त है.

नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी के बावजूद अनमनी रही भारत की नेपाल नीति

लेकिन मोदी सरकार की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ की नीति के बावजूद नेपाल के संबंध में भारतीय विदेश नीति में अनमनेपन के कारण नेपाल को भारत से छिटकने और चीन की गोदी में बैठने को मजबूर कर दिया गया. चीन ने भी नेपाल का स्वागत बाहें फैलाकर किया.

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चीन ने इस मौके का जमकर फायदा उठाया. उसने न केवल नेपाल में निवेश और सहायता बढ़ाई बल्कि उसने हिमालय की गोद में बसे देश नेपाल को प्रलोभन देते हुए नेपाल से जुड़े कई बड़े और महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भी काम करने का आश्वासन दे दिया. चारों तरफ से भूमि से घिरे यानी बंदरगाह रहित नेपाल को चीन ने क्रॉस हिमालयन कनेक्टिवटी देने का वायदा किया. इसके तहत चीन ने नेपाल से अपने सबसे नजदीकी शहर कायरोंग से काठमांडू तक ट्रांस नेशनल रेल लाइन बिछाने का आश्वासन दिया. इसके अलावा चीन ने अपने महत्वाकांक्षी बेल्ट और रोड इनीशिएटिव के तहत कायरोंग को काठमांडू और लुंबिनी से सीधे जोड़ने का भी निर्णय ले लिया. चीन के जिस बेल्ट और रोड इनीशिएटिव को भारत ने ठुकरा दिया था नेपाल ने उसे खुशी-खुशी अपना लिया.

पीएम मोदी जल्द ही नेपाल जाने वाले हैं ऐसे में पीएम मोदी के नेपाल के तीसरे दौरे पर भारत के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ होगा. 2014 के पहले दौरे की तरह ही इसमें भी द्विपक्षीय बातचीत ही होगी. मोदी की कोशिश होगी कि दोनों देशों के बीच अस्त-व्यस्त हो चुके संबंधों को पटरी पर लाया जाए.

चीन के अलावा पाकिस्तान की भी नेपाल पर नजर

नेपाल में जैसे ही केपी ओली ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, वैसे ही अपने सबसे पहले अतिथि के रूप में नेपाल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी का स्वागत किया. चीन के अच्छे मित्र और भारत के धुर विरोधी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अब्बासी के स्वागत ने पहले ही भारतीय खेमे की पेशानी पर लकीरें खींच दी हैं. अब्बासी के दौरे का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि अब्बासी के इस साल मार्च के नेपाल दौरे से पहले 24 साल तक किसी पाकिस्तानी पीएम ने इस ओर आंख उठाकर देखने की जहमत नहीं उठाई थी. इन सबके अलावा काठमांडू और इस्लामाबाद के बीच हैंडशेक को नेपाल में चीन के बढ़ते और भारत के घटते प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है.

नेपाल ने चीन को रणनीतिक रुप से काफी महत्व देकर भारत के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. एक समय नेपाल को अपने प्रभाव में मानने वाले भारत के लिए नेपाल का दूसरे खेमे में शिफ्ट होना सामरिक और रणनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है, ऐसे में मोदी सरकार के लिए नेपाल को वापस अपने खेमे में लाने का मुश्किल काम करना जरूरी है. मोदी ने इसके लिए रणनीति भी तैयार कर ली है और वो अपने तीसरे नेपाल दौरे को सफल बनाने के लिए धार्मिक राह पर चलने की तैयारी कर रहे हैं. इस बार वो नेपाल के दो धार्मिक तीर्थस्थलों मुक्तिनाथ और जनकपुर भी जाएंगे. मोदी इस यात्रा से दो मतलब निकालने की भी तैयारी कर रहे हैं. इन धार्मिक स्थलों का भ्रमण करके मोदी न केवल नेपाल के लोगों को बल्कि उनके खुद के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी के लोगों तक को भी साधने की कोशिश करेंगे.

2016 में भारत की अघोषित नाकेबंदी ने पैदा किया था अविश्वास

पीएम मोदी कोशिश करेंगे कि उनके दौरे से भारत और नेपाल के बीच बढ़ती अविश्वास की खाई को पाट दिया जाए. दरअसल 2016 में नेपाल पर भारत ने अघोषित रूप से नाकाबंदी कर दी थी जिससे कि नेपाल में ईंधन की जबरदस्त किल्लत हो गई थी. इस घटना ने दोनों देशों के बीच अविश्वास का वातावरण तैयार कर दिया था.

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2016 में जिस समय भारत की तरफ से अघोषित नाकेबंदी हुई थी उस समय भी नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ही थे. अब जबकि चुनाव में वो दोबारा चुने गए हैं और वो फिर से नेपाल के प्रधानमंत्री हैं ऐसे में नई दिल्ली के सामने चुनौती है कि वो नेपाल में अपनी खोई हुई जमीन फिर से हासिल करे. हालांकि ओली ने इस साल की शुरुआत में अपने चुनाव प्रचार में भारत के इस रुख का कड़ा विरोध करके भारत के खिलाफ अपनी नाराजगी लोगों के सामने दर्ज कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी.

चीन की तरफ झुकने में नहीं हिचकेंगे ओली

इससे पहले भी अपने पूर्व के कार्यकाल में ओली ने स्पष्ट कर दिया था कि वो प्रधानमंत्री के रूप में भारत के खिलाफ चीन कार्ड खेलने से कोई परहेज नहीं करेंगे. 2016 में जब भारत की तरफ से नाकेबंदी हुई थी तो भारत पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए ओली तुरंत बीजिंग की ओर रवाना हो गए थे. अपने बीजिंग दौरे पर ओली ने चीन के साथ कम से कम दस समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिसमें सबसे महत्वपूर्ण चीन के साथ रेलमार्ग और जलमार्ग के साथ संपर्क स्थापित करना था. इसके अलावा ओली ने पोखरा में चीन के द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट का निर्माण और चीन से पोर्ट सुविधाएं प्राप्त करने के संबंध में भी एक समझौता किया.

चीन के प्रति सॉफ्ट कार्नर रखने वाले प्रधानमंत्री के रूप में ओली की वापसी से निश्चित रुप से भारतीय खेमा सहज नहीं हुआ है. ऐसे में इस साल के शुरू में ओली जब दूसरी बार पीएम चुने गए तो प्रधानमंत्री बनने की आधिकारिक घोषणा होने से पहले ही भारत की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ओली को शुभकामनाएं देने काठमांडू पहुंच गई थीं. लेकिन इन सबके बावजूद भारत को नेपाल में अपनी खोई जमीन को पाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है.

भारत ने अपने वादों को पूरा नहीं किया है

नई दिल्ली को नेपाल के साथ अपने संबंध सुधारने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और संपर्कों के संबंध में नेपाल से किए अपने वादों को तेजी से पूरा करना पड़ेगा. हालांकि नेपाल के पीएम ओली ने परंपरा का पालन करते हुए अपने दूसरे कार्यकाल का पहला विदेशी दौरा भारत से ही शुरू किया. पिछले महीने ओली ने नई दिल्ली पहुंचकर पीएम मोदी से मुलाकात भी की. अपने भारत दौरे में ओली ने भारतीय नेतृत्व को याद दिलाया कि उन्हें नेपाल के अपने पंचेश्वर डैम जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को जल्द से जल्द पूरा करना चाहिए. पंचेश्वर डैम वो मेगा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट है जिस पर योजना बनने के दो दशक बाद तक काम ही शुरु नहीं हो सका है.

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इतना ही नहीं पीएम मोदी के द्वारा 2014 के पहले नेपाल दौरे में किए गए एचआईटी (हाईवेज, इंफार्मेशन वेज और ट्रांसमिशन) का वादा भी अब तक पूरा नहीं हो सका है. ओली ने इस संबंध में भी विनम्रता के साथ भारत को याद दिलाते हुए कहा कि 'हमें उनके परिकल्पना को साकार करना है.'

भारत के ओली सरकार प्रति अच्छे संबंधों की पहल करने के बाद भी उनका चीन के प्रति झुकाव जारी है. ओली के भारत दौरे के एक सप्ताह के भीतर ही नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली चीन पहुंच गए और वहां उन्होंने बीजिंग के द्वारा पोखरा और लुंबिनी में एयरपोर्ट बनाए जाने के चीन के निर्णय पर उनका आभार जताया. उन्होंने चीन से हिमालय के एक सिरे से दूसरे सिरे तक वाणिज्य और सहयोग की एक मिसाल कायम करने का आह्वान किया.

तेजी से बदलते घटनाक्रम में नई दिल्ली को तुरंत एक्शन लेने की जरूरत है क्योंकि जिस जगह पर एक समय भारत का पुरजोर प्रभाव था उसपर कोई और कब्जा जमाने की कोशिश कर रहा है ऐसे में उससे निपटने के लिए भारत को तुरंत मैदान में कूदना पड़ेगा.

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