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मालदीव संकटः ट्रंप-मोदी की फोन पर बातचीत और चीन का क्या है कनेक्शन?

चीन को डर है कि विपक्ष के नेता मोहम्मद नशीद के सत्ता में आने पर हालात भारत के अनुकूल हो जाएंगे

Updated On: Feb 11, 2018 08:30 PM IST

Sreemoy Talukdar

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मालदीव संकटः ट्रंप-मोदी की फोन पर बातचीत और चीन का क्या है कनेक्शन?

गुरुवार की रात डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी के बीच हुई बातचीत में मालदीव का मुद्दा अहम रहा और इसके महत्व को कम करके देखना ठीक नहीं. दरअसल इस बातचीत के जाहिर संकेत हैं कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक रणनीति की बीज रुप में शुरुआत हो चुकी है और दक्षिण एशिया में चीन की जारी दबंगई के खिलाफ लोकतांत्रिक ताकतें एक जुट हो रही हैं. अंदरुनी सियासी उथल-पुथल ने छोटे से मुल्क मालदीव को एक बड़े भूराजनीतिक तूफान में ला खड़ा किया है.

चीन समझ रहा है कि दांव पर क्या चीजें लगी हैं. चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने संवाददाताओं से कहा कि ’मालदीव की मौजूदा स्थिति उसका अंदरुनी मामला है’ और 'अंतराष्ट्रीय संबंधों का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि दूसरे देशों के मामले में हस्तक्षेप ना किया जाय.'

समाचार एजेंसी पीटीआई ने आधिकारिक सूत्रों के हवाले से लिखा है कि समस्या के समाधान पर चर्चा के लिए चीन, भारत के संपर्क में है क्योंकि चीन नहीं चाहता कि मालदीव का मसला विवाद का का नया मुद्दा बनकर उभरे. यह बात भी समान रुप से अहम है. चीन को मामले पर स्पष्टीकरण देने और अपना रुख साफ करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. इससे पता चलता है कि चीन को फिक्र सता रही है.

चीन ट्रंप की एशिया-पैसेफिक रणनीति को अपने दबदबे के विस्तार की राह में एक बाधा की तरह देखता है. वह मालदीव में अपने रणनीतिक विस्तार की संभावनाओं को हाथ से यों ही नहीं निकल जाने देगा. अंतर्राष्ट्रीय दायरे में सिर्फ चीन ही अबदुल्ला यामीन का समर्थक बनकर उभरा है. तानाशाही तेवर वाले मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और विपक्ष के प्रमुख नेताओं को जेल में डाल दिया है और इमर्जेंसी की घोषणा कर लोकतंत्र की राह रोक दी है.

पूर्व राष्ट्रपति नशीद कह चुके हैं भारत को देना चाहिए दखल 

चीन मालदीव की अर्थव्यवस्था पर तो अपनी पकड़ बनाने में कामयाब रहा है लेकिन उसका सियासी खेल अभी इस बात पर निर्भर है कि मालदीव मे यमीन का राज जारी रहे. चीन को डर है कि विपक्ष के नेता मोहम्मद नशीद के सत्ता में आने पर हालात भारत के अनुकूल हो जाएंगे.

मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नौशीद. (इमेज- रॉयटर्स)

मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नौशीद. (इमेज- रॉयटर्स)

पूर्व राष्ट्रपति नशीद का झुकाव भारत की तरफ है और वे मालदीव पर चीन की बढ़ती जकड़ को लेकर कई बार अपनी चिंता का इजहार कर चुके हैं. अपने हाल के एक साक्षात्कार में उन्होंने फिर से कहा कि भारत को मामले में दखल देना चाहिए ताकि हिंद महासागर के इस द्वीपसमूह(मालदीव) में चीन के जमीन कब्जाने की चाल पर रोक लगे.

साक्षात्कार में नशीद ने टाइम्स ऑफ इंडिया के सचिन पराशर से कहा कि 'यह सिर्फ हमारी ही नही बल्कि आपकी भी समस्या है. मेरे जानते ऐसी दो वजहें हैं जो इसे भारत की समस्या बनाती हैं. एक तो कट्टरपंथी इस्लाम और दूसरा जमीन हथियाना. हम जानते हैं कि उनके हाथ में 17 द्वीप हैं और अब वे 40 मिलियन डॉलर के निवेश की बात कर रहे हैं लेकिन हमें ये नहीं पता कि इस निवेश का मकसद क्या है.'

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चीन की मंशा उसके विदेश मंत्री की एक बात से उजागर हुई. चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने मालदीव के विशेष राजदूत मोहम्मद सईद से कहा कि ‘चीन मालदीव के अंदरुनी मामले में दखल नहीं देगा. संयुक्त राष्ट्रसंघ के घाषणापत्र में भी यह सिद्धांत दर्ज है. हम चाहते हैं कि मालदीव की सरकार मसले से जुड़े तमाम पक्षों से बातचीत और सलाह-मशविरे के जरिए समाधान निकाले. हमारा इस बात के लिए मालदीव सरकार को समर्थन है और हम मालदीव की स्वतंत्रता, संप्रभुता तथा वैध अधिकार और हितों की बात स्वीकार करते हैं.’

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंट शुआंग ने यह बात बताई. गौर करें कि वांग के बयान में मालदीव की ‘स्वतंत्रता, संप्रभुता, वैध अधिकार तथा हित’ पर जोर दिया गया है लेकिन इसमें कहीं भी लोकतंत्र का जिक्र नहीं आया है. लोकतंत्र का जिक्र आने पर राष्ट्रपति यामीन पर दबाव पड़ता.

समझनी होगी चीन की चालाकी, देना होगा कूटनीति का परिचय 

दूसरी बात यह कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के घोषणापत्र का हवाला देना कुछ ऐसा ही है मानो खुद शैतान धर्मनीति के उपदेश दे रहा हो. चीन ने अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की लगातार अनदेखी की है. वह अतर्राष्ट्रीय अदब-कायदों को लगातार ठेंगा दिखाता गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक वांग ने यह भी कहा कि चीन सामाजिक विकास के ख्याल से मालदीव को निःस्वार्थ भाव से सहायता दे रहा है. इस बात पर किसी को भी हंसी आ जाएगी. खैर, यहां हम याद करें कि चीन ने मालदीव की ‘निस्वार्थ सहायता’ किस तरह की है. चीन के पिछलग्गू मालदीव के राष्ट्रपति ने दो बार संविधान का संशोधन करवाया ताकि मालदीव में चीन जमीन की मिल्कियत हासिल कर सके. साथ ही मुक्त-व्यापार की एक विवादास्पद संधि भी हुई और यह सब कुछ इस तरह हुआ कि संसद कोई भी हस्तक्षेप करने की स्थिति में न रहे.

Maldives President Abdulla Yameen shakes the hand of China's President Xi Jinping after a signing meeting at the Great Hall of the People in Beijing, China December 7, 2017. REUTERS/Fred Dufour/Pool - RC1A09C92A00

Maldives President Abdulla Yameen shakes the hand of China's President Xi Jinping

भारत और अमेरिका के लिए रणनीतिक उद्देश्य एकदम स्पष्ट हैं. अगर मालदीव को चीन की खींची लकीर पर चलने दिया गया तो भारत को सुरक्षा के एतबार से गंभीर खतरे भुगतने होंगे, साथ ही ट्रंप की एशिया-पैसेफिक रणनीति अपने शुरुआती चरण में ही नाकाम हो जाएगी.

इसी कारण ह्वाईट हाऊस ने मसले पर जारी एक संदेश में कहा है कि दोनों नेताओ ने इंडो-पैसेफिक क्षेत्र में सुरक्षा और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए साथ मिलकर काम करने का संकल्प लिया है. संदेश में यह भी कहा गया है कि ‘दोनों नेताओं ने मालदीव के सियासी संकट पर अपनी चिंता का इजहार किया और लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा कानून के शासन की अहमियत पर जोर दिया’. चीन ने जानते-बूझते लोकतंत्र शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था जबकि भारत और अमेरिका ने बड़े जतन के साथ इसपर जोर दिया.

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मालदीव में जारी गतिविधियों की अहमियत को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं पेश किया जा सकता. हिंद महासागर में चीन की भू-रणनीतिक पहलकदमियों से पैदा नाजुक भू-राजनीतिक संतुलन और इसे लेकर भारत-अमेरिका की प्रतिक्रिया किसी एक के फायदे में जाएगी ही लेकिन यह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि भारत क्या रुख अपनाता है.

अगर भारत-अमेरिका ने नहीं दिया ध्यान, तो पलट सकती है स्थिति 

द प्रिंट में प्रकाशित अपने लेख में जर्मन मार्शल फंड ऑफ युनाइटेड स्टेटस् के सीनियर फेलो एंड्रयू स्मॉल ने लिखा है कि 'पड़ोसी देशों के लिए भारत के रणनीतिक आर्थिक एजेंडे के एतबार से मालदीव परीक्षण की एक कसौटी बनकर उभरा है. ट्रंप-प्रशासन की इंडो-पैसेफिक रणनीति के लिए भी यही बात कही जा सकती है...अगर लोकतांत्रिक ताकतें कामयाब होती हैं तो इलाके में चीन के बेल्ट एंड रोड पहलकदमी को लेकर चलने वाला कथानक बदलेगा.

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इलाके के इस नन्हें से देश के लिए समाधान की राह निकालने में नाकामी हाथ लगती है तो बात एकदम पलट जाएगी. माना जाएगा कि भारत और अमेरिका के बीच बातचीत में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया और चाहे आप चीन को पसंद करते हों या फिर नापसंद लेकिन उसका कोई विकल्प नहीं है.'

भारत कूटनयिक विकल्पों की तलाश में है. जारी चलन से अलग हटते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने जॉर्डन से एक विज्ञप्ति जारी की. प्रधानमंत्री मोदी, विदेश सचिव विजय गोखले और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल जॉर्डन के रास्ते फिलिस्तीन रवाना हुए हैं. विदेश मंत्रालय की विज्ञप्ति मालदीव के मसले पर आए चीन के बयान पर एक प्रतिक्रिया थी.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक विज्ञप्ति में कहा गया है 'चीन ने कहा है कि मालदीव की सरकार चीन के कर्मचारियों तथा अपनी संस्थाओं की रक्षा करने में समर्थ है हमें उम्मीद है कि हर देश कोई अन्यथा पहल न करते हुए मालदीव में अपनी रचनात्मक भूमिका का निर्वाह कर सकता है.'

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टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में जिक्र है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ से मालदीव में तटस्थ पर्यवेक्षकों की देख-रेख में एक फैक्ट फाइडिंग मिशन भेजने को कहा है ताकि जमीनी हालात का पता चले और अब्दुल्ला यमीन की सरकार लोकतंत्र बहाली की दिशा में कदम उठाए.

रणनीतिक पकड़ को चीन के हाथों नहीं जाने देना चाहेगा भारत 

अब यह बात स्पष्ट हो गई है कि भारत अपनी रणनीतिक पकड़ को चीन के हाथ में नहीं जाने देगा. ट्रंप प्रशासन का सपना एक मुक्त और खुले हुए इंडो-पैसेफिक क्षेत्र बनाने का है और भारत के उद्देश्य इससे मेल खाते हैं. पिछले नवंबर में वियतनाम में एपीईसी सीईओ के सम्मेलन में ट्रंप ने कहा था कि इलाके में ऐसे मुल्कों को अपना साथी बनाना अमेरिका के हित में है जो धनी हैं, जिनकी बढ़वार तेज है और जो किसी दूसरे राष्ट्र पर निर्भर नहीं.

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हम ताकत या संरक्षण देने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर फैसले नहीं लेंगे. हम अपने साथी देशों से कभी नहीं कहेंगे कि आप अपनी संप्रभुता, निजता और बौद्धिक संपदा गिरवी रख दीजिए या सिर्फ उन्हीं सप्लायर्स से अनुबंध कीजिए जो राजकीय संरक्षण में चलते हैं.'

भारत की समस्या है कि उसकी कूटनयिक पहलकदमियों का कोई संस्थानिक खाका नहीं हैं, ऐसी पहलकदमियों के साथ कोई दूरगामी योजना नहीं बंधी और इस कमी के कारण भारत के क्षेत्रीय प्रभाव का आगे विस्तार नहीं हो पा रहा.

परियोजनाओं को तैयार करने और समाधान की राह निकालने में नौकरशाही की जड़ता भी आड़े आ रही है. मालदीव के मसले पर क्षेत्र की महाशक्ति के रुप में भारत की ताकत और पहुंच की परीक्षा होने वाली है.

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