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पाकिस्तान के भविष्य के लिहाज से खैबर पख्तूनख्वा का चुनाव बेहद अहम

पाकिस्तान चुनाव आयोग के मुताबिक वहां आगामी आम चुनावों में तकरीबन 10.59 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे

Updated On: Jul 25, 2018 07:22 AM IST

Abdur Rauf Yousfazai

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पाकिस्तान के भविष्य के लिहाज से खैबर पख्तूनख्वा का चुनाव बेहद अहम

पाकिस्तान चुनाव आयोग के मुताबिक वहां आगामी आम चुनावों में तकरीबन 10.59 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे. पाकिस्तान की सभी राजनीतिक पार्टियां जनता की अदालत में हैं और 4 प्रांतीय और फेडरल एसेंबली के लिए 25 जुलाई को होने वाले चुनाव में सत्ताधारी पार्टी को चुनने में वोटर अपनी भूमिका निभाएंगे.

राजनीतिक तौर पर काफी परिपक्व हैं खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के वोटर?

पंजाब प्रांत में पिछले तीन कार्यकाल से पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) एकमात्र प्रतिनिधि है. सिंध में अधिकांश वक्त शासन पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का शासन रहता है और बलूचिस्तान का शासन सामंती और सत्ता तंत्र से जुड़े लोगों के हाथों में होता है. हालांकि, पहले उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत के नाम से मशहूर और मौजूदा खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में वोटर पार्टियों की अपनी पसंद लगातार बदलते रहते हैं.

पाकिस्तान के इस उत्तरी प्रांत में वोटरों के इस ट्रेंड को राजनीतिक विश्लेषक इस इलाके के वोटरों की 'राजनीतिक परिपक्वता' करार देते हैं. पठानों ( इस प्रांत के ज्यादातर वोटर) ने ऐतिहासिक तौर पर लोकप्रिय पार्टियों के पक्ष में काफी कम मतदान किया है. पाकिस्तान के हाल के इतिहास की बात करें, तो जनरल जिया उल हक का विमान दुर्घटनाग्रस्त होने के एक दशक बाद पाकिस्तान में राजनेताओं को लोकतंत्र को स्थिरता मुहैया कराने नहीं दिया गया.

गंदी राजनीति और दोषारोपण के खेल के अलावा मरहूम बेनजीर भुट्टो बेहद कुशलता से प्रगतिशील दिमागों को लेकर अहम भूमिका अदा कर रही थीं. सत्ता को चुनौती देने के मामले में बेनजीर देश की ऐतिहासिक आइकन रहीं और आज के सत्ता विरोधी नेता नवाज शरीफ ने उस वक्त अलोकतांत्रिक और गलत रवैया अख्तियार कर रखा था जैसा कि आज के दौर में इमरान खान का रवैया देखने को मिल रहा है.

पाकिस्तान में 1971 का चुनाव सबसे निष्पक्ष और पारदर्शी था

जानकार और विश्लेषक 1971 में पाकिस्तान में हुए चुनाव को निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र बताते हैं और इसके परिणामस्वरूप उसे अपना अहम भाग यानी पूर्वी हिस्सा (बांग्लादेश) गंवाना पड़ा. उसके बाद से अब तक इस मुल्क में ऐसी मजबूत लोकतांत्रिक सरकार देखने को नहीं मिली है, जो जनता द्वारा चुनी हुई एसेंबली के माध्यम से असरदार ढंग से सरकार चला सके. मुमकिन है कि पाकिस्तानी तंत्र का कुछ हिस्सा निष्पक्ष चुनाव को देश की शासन व्यवस्था के लिए नुकसानदेह मानता हो.

बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब-उर-रहमान

बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब-उर-रहमान

उप-महाद्वीपीय विभाजन से पहले हुए आखिरी चुनाव में इस प्रांत के लोगों ने पाकिस्तान मुस्लिम लीग के बजाय कांग्रेस की सहयोगी रही इकाई खुदाई खिदमतगारों का समर्थन किया था. खुदाई खिदमतगारों ने देश विभाजन के आइडिया का कभी समर्थन नहीं किया और अखंड भारत की अवधारणा के साथ मजबूती से खड़ा रहा.

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत स्थित बाचा खान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और प्रोफेसर फजल रहीम का पक्के तौर मानना है कि खुदाई खिदमतगारों के देसी और दूरदर्शी आंदोलन ने पठानों को अहिंसक प्रतिरोध की शक्ति मुहैया कराई. रहीम के मुताबिक, उसके बाद से पख्तूनों की राजनीतिक समझ और मानसिक रवैये में बदलाव नहीं हुआ और वे हमेशा प्रगतिशील और आक्रामक घोषणापत्र के साथ खड़ रहे.

खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा प्रांत है और यहां फिलहाल तकरीबन 1.53 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर हैं ( यह 2013 के मुकाबले 25 फीसदी ज्यादा है). इनमें 87.1 लाख वोटर पुरुष हैं, जबकि महिला वोटरों की तादाद 66 लाख है. पाकिस्तान में 25वें संविधान संशोधन के तहत इस मुल्क की पूर्वी सीमा से सटे कबीलाई इलाके भी इस प्रांत का हिस्सा हैं, जो पहले राष्ट्रीय सरकार के प्रशासन के तहत आते थे. इस प्रशासन के दायरे में 7 जिले थे-दक्षिणी वजीरिस्तान, उत्तरी वजीरिस्तान, मोहम्मद, खैबर, ओरकजई बजूर और कुर्रम. इन जिलों के करीब 27 लाख वोटर 25 जुलाई को होने वाले चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे.

तीन दशकों से भी ज्यादा तक पाकिस्तान में लगा रहा है मार्शल लॉ

पाकिस्तान में तीन दशकों से भी ज्यादा मार्शल लॉ यानी सैनिक शासन रहा है और कई साल अप्रत्यक्ष रूप से भी सेना ने इस मुल्क में हुकूमत चलाई है. इसी वजह से यहां लोकतंत्र उतनी मजबूती से फलफूल नहीं सका, जितना भारत में देखने को मिला. जनरल परवेज मुशर्रफ ने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई नवाज शरीफ की सरकार को सत्ता से बेदखल किया और लंबे समय तक देश की सर्वोच्च कुर्सी का सुख भोगने के बाद इस तानाशाह ने 2003 में चुनाव का ऐलान किया.

चुनाव नतीजों के बाद वहां के संघीय शासन पर गैर-लोकतांत्रिक नेताओं का नियंत्रण हुआ. ये नेता 'मुशर्रफ की बी टीम' के तौर जाने जाते थे. खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में धार्मिक पार्टियों के गठबंधन मुत्ताहिदा-मजलिस-ए-अमल सत्ता में आया. यह गठबंधन शरीया कानून को लागू करने के वादे के साथ इस प्रांत में सत्ता में आया था. और इन मदरसा प्रतिनिधियों ने संगीत, डांस, महिलाओं के ड्रेस वाले पुतलों पर पाबंदी लगा दी. यहां तक कि इस सरकार ने होर्डिंग्स पर मौजूद मॉडल की तस्वीरों को भी 'अश्लीलता' करार दिया.

पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान में अमेरिका, नाटो और पाकिस्तान उसके प्रमुख सहयोगी के तौर पर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे. इसकी प्रतिक्रया में आतंकवादी संगठनों ने गरीब और कम पढ़े लिखे पख्तूनों को जिहादी भावना के तहत गुमराह किया और इनमें से कई आतंकवादियों का सफाया करने के लिए सहयोगी देशों द्वारा अफगानिस्तान में की गई बमबारी में मारे गए.

अफगान युद्ध के दौरान 'काफिर कम्युनिस्टों' से लड़ाई में अरबी लड़ाकों द्वारा अपने पाकिस्तानी और अमेरिकी दोस्तों की मदद से खैबर पख्तूनख्वाह के सीमावर्ती इलाकों में हजारों मदरसे स्थापित किए गए थे. इन मदरसों के छात्र पहले ही चुनाव प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा चुके हैं और उन्होंने वोटरों की अमेरिका विरोधी भावनाओं का फायदा उठाया.

इस इलाके में धार्मिक संगठनों के समूह के शासन के दौरान तहरीक-ए-तालिबान (टीटी) उभर रहा था, लेकिन किसी ने इस तरह ध्यान नहीं दिया. 2008 में नए चुनाव का ऐलान हुआ. जब चुनाव हुए तो वोटरों ने इसमें धार्मिक समूह को खारिज कर दिया. दरअसल, इन संगठनों ने न सिर्फ अंसवैधानिक मुशर्रफ शासन को मजबूत किया, बल्कि शरीयत (इस्लामिक कानून) को लागू करने को लेकर किए अपने वादे भी नहीं पूरे किए. इस बीच, मुल्लाओं के गठबंधन ने अपना नाम बदलकर मुल्ला सैन्य गठबंधन कर दिया. खुदाई खिदमतगारों की विरासत संभालने का दावा करने वाली अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) सत्ता में आई और बाचा खान के अहिंसक समर्थकों पर तहरीक-ए-तालिबान पार्टी द्वारा निर्मम हमले के लिए पिच तैयार थी.

2008-2013 खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के लिए बेहद खराब रहा

2008 से 2013 के दौरान की पांच साल की अवधि पख्तून इतिहास में काले अध्याय के रूप में लिखी जाएगी. खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में हजारों लोग आत्मघाती दस्ते द्वारा अंजाम दी गई बमबारी और अन्य तरह के हमलों में मारे गए और दुर्भाग्य से निर्मम हत्याओं का यह दौर अब तक थमा नहीं है.

पाकिस्तान के वोटरों को जल्द मुल्क और प्रांतों में अगली सत्ताधारी पार्टी का चुनाव करना है. ऐसे में हत्याओं का दौर फिर से शुरू हो गया है. पिछले 10 दिनों में चार बड़े आत्मघाती हमले हुए हैं और इनमें तीन हमले पख्तून इलाके में हुए. चौथा बलूचिस्तान प्रांत में हुआ, जिसमें 175 से भी ज्यादा लोग मारे गए. इस बार आतंकवादियों ने बिना किसी तरह का भेदभाव करते हुए तमाम पार्टियों के उम्मीदवारों को निशाना बनाया.

इस प्रांत के पूर्व सीएम और धार्मिक समूह से जुड़े रहे अकरम खान बन्नू जिले में हुए आत्मघाती हमले में बाल-बाल बच गए, जबकि अवामी नेशनल पार्टी के नेता हारून बिलौर की 10 जुलाई 2018 को पेशावर में हत्या कर दी गई. दिसंबर 2012 में चुनाव प्रचार के दौरान ही हारून के पिता बशीर बिल्लौर की भी हत्या कर दी गई थी.

KHYBER PAKHTUNKHWA

खैबर पख्तूनख्वा की एक प्रतीकात्मक तस्वीर ( रॉयटर्स इमेज )

बलूचिस्तान के मस्तुंग इलाके में राष्ट्रवादी बलूच नेता सिराज राइसानी पर हमला किया गया, जिसमें तकरीबन 147 लोग मारे गए. 22 जुलाई एक आत्मघाती दस्ते ने इमरान खान की पार्टी के उम्मीदवार इससरा गैंदापुर को मार दिया. पांच साल पहले उनके बड़े भाई इकरम भी खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आत्मघाती हमले में मारे गए थे.

रैलियों और नेताओं पर हमले से वोटरों में भय का माहौल

चुनावी दिनों में खून-खराबे के इस अंतहीन सिलसिले ने उम्मीदवारों, कार्यकर्ताओं और वोटरों के मन में डर पैदा कर दिया. इस उपमहाद्वीपीय राजनीति की खूबसूरती बड़ी पब्लिक रैलियां होती हैं, लेकिन लगातार जानलेवा हमलों ने लोगों को भयभीत कर दिया और रैलियां काफी छोटी हो गईं. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बम धमाकों से वोटिंग में हिस्सेदारी पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा.

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के निवासी चुनाव के शांतिपूर्ण दौर की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन शांति की चाह सपना ही बनी रही. और आतंकवादी हमलों के हालिया दौर के कारण वोटरों को पोलिंग बूथ रवाना होने से रुककर सोचना पड़ेगा. साथ ही, उनके जेहन में हमेशा ब्लास्ट का खतरा मंडराता रहेगा.

राजनीतिक नेताओं ने इस मामले में सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका की आलोचना की. उनका कहना था कि सुरक्षा एजेंसियों की विफलता के कारण ही उन्हें चुनाव प्रचार के लिए खुला माहौल नहीं मुहैया कराया जा सका. हर नागरिक की सुरक्षा मुहैया कराना देश के निजाम की जिम्मेदारी है.

यहां पर प्रगतिशील पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और अवामी नेशनल पार्टी की गठबंधन सरकार भी रह चुकी है. अवामी नेशनल पार्टी को खास तौर पर नुकसान पहुंचाने के लिए भी कट्टरपंथ और चरमपंथ के बीज बोए गए. अवामी नेशनल पार्टी पारंपरिक तौर पर किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ है. यहां तक कि जब पाकिस्तानी निजाम ने अफगान युद्ध में पूंजीवादियों के पक्ष में खड़ा होने का फैसला किया, तो अवामी नेशनल पार्टी ने इसका जमकर विरोध किया.

पार्टी के नेता स्वर्गीय वली खान का मानना था कि यह 'दो हाथियों' के बीच लड़ाई है और चूहे को बर्बादी से बचने के लिए खुद को इस लड़ाई से दूर रखना चाहिए. उस वक्त 'पेशावर7' का गठन किया गया था, जिसमें सभी अफगान मजहबी पार्टियां शामिल थीं और राष्ट्रवादियों को जानबूझकर इसके दायरे से बाहर रखा गया था.

पार्टी एक बार फिर आतंकवाद के खिलाफ खड़ी हुई और उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी. एएनपी के महासचिव मियां इफ्तिखार हुसैन ने बताया, 'धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ हमारी नीति आज भी वही है, जो एक दशक पहले थी और इसी वजह से हम तालिबान विरोधी नारों के पक्ष में रहे.' हुसैन का कहना था कि वह और उनकी पार्टी समावेशी और बहुलतावादी समाज के हक में हैं. एएनपी धर्म, जाति या विचारधारा के आधार पर लोगों को अलग करने का समर्थन नहीं करती है.

तालिबान के खिलाफ साहसिक और निर्णायक रुख के कारण मियां इफ्तिखार हुसैन को अपना एकमात्र बेटा और प्रभावकारी सामाजिक जीवन गंवाना पड़ा. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों या गृह मंत्रालय द्वारा जब भी किसी तरह का खतरा संबंधी अलर्ट जारी किया जाता है, उसके मुताबिक आतंकवादियों के निशाने पर मियां इफ्तिखार का नाम प्रमुखता से होता है. 2013 के चुनावों में अवामी नेशनल पार्टी पिंजरे में रही और उसकी प्रतिद्वंदी पार्टी पीटीआई लोगों को बैट छाप (पार्टी के चुनाव चिन्ह) पर मुहर लगाने की खातिर राजी करने के लिए स्वतंत्र थी. एक समय ऐसा भी था, जब हर सुबह पेशावर के निवासियों की नींद जोरदार धमाकों के साथ खुलती थी. यहां तक कि एक दिन यह खबर भी छपी, 'कल का दिन पूरा अमन रहा, पेशावर में कोई धमाका नहीं हुआ.'

PTI chairman Imran Khan gestures while addressing his supporters during a campaign meeting ahead of general elections in Karachi

इमरान खान

इमरान की पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान किए वादों को पूरा नहीं किया

इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) इस प्रांत में अप्रैल 2018 तक सत्ता में रही और यहां के युवा अब भी पार्टी के 'बदलाव' नारे के पीछे-पीछे चल रहे हैं. हालांकि, उसने 2013 के चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों को पूरा नहीं किया.

पाकिस्तान में 25वें संविधान संशोधन के बाद खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में कुल 34 जिले यानी 27 सेटल एरिया और 7 कबाइली क्षेत्र हैं. अगर कोई भी पार्टी पांच जिलों (पेशावर, मरदान, स्वाबी, चरसद्दा और नौशेरा) की सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रहती है, तो वह मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर सकती है.

अब तक स्थिति साफ नजर नहीं आ रही है. ऐतिहासिक तौर पर दक्षिणी जिले में दक्षिणपंथी पार्टियों की जीत होती है. जमीयत उलेमा इस्लाम का गृह नगर डी आई खान है और वह अक्सर टांक जिले से भी चुनाव लड़ते हैं.

प्रांत के उत्तरी हिस्से में मौजूद शहरों अक्सर वामपंथी रुझान वाली पार्टियों और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) को जीत मिलती रही है. इससे ऊपर का दीर जिला जमात-ए-इस्लामी के कब्जे में रहा है और इस बार पार्टी ने जेयूआई और अन्य धार्मिक समूहों के साथ गठबंधन किया है. मजहबी पार्टियां एक बार फिर इस्लाम के नाम पर वोटरों को संगठित करने में जुटी हैं.

मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमल (एमएमए) को निजाम द्वारा उस वक्त खड़ा किया गया था, जब अमेरिकी विरोधी भावनाओं चरम थीं. हालांकि, इस बार पार्टी नेतृत्व के लिए अपने दम पर चुनाव जीतने की चुनौती है. अवामी नेशनल पार्टी को वापसी करने का इंतजार है और उसे मरदान और स्वाबी समेत सीमांत गांधी के जन्मस्थान से जीत हासिल करने की उम्मीद है.

इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस शौकत सिद्दीकी ने हाल में कहा था कि सैन्य तख्तापलट और खुफियों एजेंसियों के अप्रत्यक्ष रूप से दखल के कारण पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रणाली नहीं फल-फूल पाई. इसके अलावा उन्होंने कई और गंभीर आरोप लगाए थे.

पाकिस्तान का 2018 का चुनाव सत्ता समर्थक और विरोधी विचारों के बीच है. देश के अलग-अलग हिस्सों में 'खास उम्मीदवारों' को जीप चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया है. जानकारों की राय है कि पाकिस्तान का 'असल सत्ता तंत्र' केंद्र में कमजोर सरकार चाहता है, ताकि वह उसे किसी भी वक्त अपने हिसाब से चला सके. दूसरी तरफ, राजनीतिक नेतृत्व अब भी वंशवाद राजनीतिक का समर्थन करता है और सत्ता को साझा नहीं करना चाहता. और न ही सिस्टम को पारदर्शी और जवाबहेद बनाना चाहता है.

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