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सऊदी अरब झूठ बोल रहा है, लेकिन फिर भी ट्रंप मेहरबान क्यों हैं?

ये साफ है कि जैसे शिनजियांग में लाखों की मुसलमान आबादी को कुचलने वाले चीन के खिलाफ जैसे अमेरिका ने कोई कदम नहीं उठाया वैसे ही रियाध को भी हत्या के आरोप में एक हल्की चपत लगा कर बख्श दिया जाएगा.

Updated On: Oct 23, 2018 07:17 AM IST

Naghma Sahar Naghma Sahar

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सऊदी अरब झूठ बोल रहा है, लेकिन फिर भी ट्रंप मेहरबान क्यों हैं?
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खशोगी हत्या पर सऊदी अरब झूठ बोल रहा है, ये जानते और मानते हुए भी क्यों ट्रंप सऊदी अरब के प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान पर भरोसा जाता रहे हैं? सऊदी अरब के साथ हुए रक्षा सौदे को रद्द नहीं करने का ऐलान कर रहे हैं? अमेरिकी प्रशासन से सऊदी अरब पर कार्रवाई करने का दबाव बढ़ने के बाद ट्रंप ये तो मानते हैं कि सऊदी अरब झूठ बोल रहा है, पर क्या अमेरिका अपने खास सहयोगी, अपने हथियारों के बड़े बाजार और ईरान के खिलाफ खड़े सऊदी अरब के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगा?

वाशिंगटन पोस्ट के सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी तुर्की में सऊदी दूतावास में मारे गए. सऊदी अरब का पहला बयान आया कि खशोगी 2 अक्टूबर को सऊदी दूतावास से सही सलामत निकल गए. फिर ऐलान किया कि किसी आपसी मुठभेड़ या झगड़े की वजह से खाशोज्जी सऊदी दूतावास में ही मारे गए हैं. सऊदी विदेश मंत्री अब्दुल जुबिर अब तक इस मामले पर बोलने वाले सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं जिन्होंने कहा है कि इस बात की विस्तृत जानकारी नहीं कि प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के आलोचक पत्रकार जमाल खाशोज्जी किस तरह सऊदी दूतावास में मारे गए. ये भी नहीं पता कि उनकी लाश कहां है लेकिन हां, इस का पता लगाया जाएगा और सजा होगी.

इस हत्या की जांच में कार्रवाई के तौर पर दूतावास के 5 अधिकारियों को हटाया गया और 18 को गिरफ्तार किया गया है. सऊदी और तुर्की के अधिकारियों के बयान इस मामले में एक-दुसरे से बिलकुल अलग हैं. तुर्की के मुताबिक जिस दिन खशोगी मारे गए 15 सऊदी अधिकारी दो जेट में सऊदी दूतावास आए थे. तुर्की के राष्ट्रपति अब इस मामले में सच सामने लाने की बात कर रहे हैं.

ट्रंप को क्यों है प्रिंस सलमान पर भरोसा

Donald Trump

सबसे दिलचस्प है इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका का रोल. पहले ट्रंप ने खशोगी मामले में अपने हेडमास्टर वाले अंदा में सऊदी अरब को सख्त सजा देने की बात की. सऊदी अरब अमेरिका के हथियारों का बड़ा बाजार है. दोनों देशों के बीच 2017 में 110 अरब डॉलर का हथियार सौदा हुआ है. व्हाइट हाउस के मुताबिक ये अमेरिका के इतिहास में सबसे बड़ा सौदा था.

ये देखते हुए ट्रंप ने फौरन साफ किया कि सऊदी अरब के साथ हुआ 110 अरब डॉलर का ये सौदा रद्द नहीं होगा. फिर सख्त हमला करते हुए कहा कि खशोगी की हत्या के मामले में सऊदी अरब झूठ बोल रहा है. साथ ही सऊदी अरब के कार्यकारी बादशाह MBS यानी प्रिंस सलमान को क्लीन चिट दे दी और कहा प्रिंस की लीडरशिप पर उन्हें विश्वास है. विश्वास मजबूरी है क्योंकि 110 अरब डॉलर के इस सौदे का मतलब कई मिलियन अमेरिकी नौकरियां भी हैं. ट्रंप ने साफ कहा है कि ये सौदा रद्द करना जितना उन्हें नुकसान पहुंचाएगा उससे कहीं ज्यादा अमेरिका को. हां, दूसरी सजाओं पर अमेरिका सोच सकता है जिसमें प्रमुख है प्रतिबंध. लेकिन ये प्रतिबंध की तलवार भी शायद एक दिखावा ही है. अगर ट्रंप ने यहां सख्ती दिखाई तो सऊदी अरब ने भी जवाबी कार्रवाई की धमकी दे दी है और उसका सबसे बड़ा हथियार है तेल. सऊदी अरब ने धमकी दी है की 80 डॉलर प्रति बैरल से कीमत बढ़ कर 400 डॉलर प्रति बैरल पहुंच सकती है. क्या अमेरिका उस सऊदी के सामने खड़ा हो सकता है जो उसका साथ ईरान के विरुद्ध दे रहा है?

सऊदी अरब की सामरिक शक्ति

हालांकि ब्रिटेन और फ्रांस ने भी जमाल खशोगी के मामले में सऊदी अरब की सफाई को न मानते हुए जवाब मांगा है लेकिन ब्रिटेन की निर्भरता यूरोपीय यूनियन से बाहर आने के बाद सऊदी अरब पर और बढ़ी है. MBS के लंदन दौरे पर BAE सौदा किया गया. यूरोप में सऊदी अरब को हथियार बेचने वाले अन्य देशों में फ्रांस और जर्मनी शामिल हैं. सरकारी मीडिया अल अरबिया के मुताबिक किसी भी प्रतिबंध के खिलाफ सऊदी अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन और रूस का रुख कर सकता है.

ये कहानी सिर्फ एक पत्रकार के लापता होने की कहानी नहीं. ये सऊदी अरब, तुर्की और अमेरिका के साथ-साथ कई पश्चिमी दशों के उलझे कूटनीतिक रिश्तों की कहानी है. सऊदी अरब की आर्थिक और भूराजनीतिक स्थिति ऐसी है की वो सौदेबाजी कर सकता है. सऊदी पर प्रतिबंध लगाने से एक ऐसी आर्थिक आपदा आएगी जो पूरी दुनिया को प्रभावित करेगी.

सऊदी अरब पश्चिम एशिया में सुरक्षा बनाए रखने और चरमपंथ और आतंकवाद का मुकाबला करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरिज़ा मे ने सऊदी अरब के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते हुए उसका बचाव किया है. बावजूद इसके कि यमन में सऊदी अरब पर युद्ध अपराधों का आरोप लगाया जा रहा है, उन्होंने कहा, 'सऊदी ने ब्रिटेन की सड़कों पर लोगों को सुरक्षित रखने में मदद की है.'

खशोगी हत्या और MBS

jamal khashoggi

खशोगी हत्या से मोहम्मद बिन सलमान जो MBS के नाम से जाने जाते हैं कि छवि को धक्का पहुंचा है. दावोस इन द डेजर्ट नाम से होने वाले बिजनेस सम्मलेन से कई बड़ी कंपनियों ने अपना नाम हटा लिया है. इस हत्याकांड से प्रिंस की उदारवादी छवि के पीछे एक घिनौनी तानाशाही मानसिकता सामने आई है.

अरब और तुर्की का टकराव

जिस बात पर कम ध्यान दिया गया है वो है तुर्की और सऊदी अरब की पुरानी दुश्मनी, जिसका इतिहास 18 वीं सदी में है जब आज पश्चिम एशिया से जाने जाने वाले इलाके पर ओटोमन सल्तनत का राज था. इसका केंद्र इस्तांबुल था. मक्का और मदीना सिर्फ धार्मिक वजहों से अहम थे, उनकी सियासी अहमियत नहीं थी. फिर 1740 में अब्द अल वहाब का उदय हुआ जो असल इस्लाम को वापस लाने की क्रांति लेकर आए, जिन्होंने धर्मविरोधी शिया मुसलमानों और सुन्नी तुर्कों पर हमला बोल दिया. वहाब सऊदी वंश के स्थापक इब्न सूद के साथ हो लिए और ऐसे शुरू हुई सूद घराने की कहानी जिसके वंशज हैं मौजूदा सऊदी बादशाह और राजकुमार.

आज हालांकि तुर्की में एर्दोआन फिर से पुराने उदारवाद की जगह कट्टर इस्लाम ला रहे हैं फिर भी सऊदी अरब के मुकाबले वो ज्यादा मॉडर्न समाज है. और ये टकराव अंकारा और रियाध का सियासी टकराव है जिसमें एक बड़ा कारण है ईरान और दूसरा मुख्य टकराव राजनीतिक कंट्रोल के लिए है, मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ. जमाल खशोगी प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान के आलोचक और मुस्लिम ब्रदरहुड के करीबी बताए जाते हैं.

अमेरिका की डेमोक्रेट पार्टी की नेता तुलसी गब्बार्ड के शब्दों में सऊदी अरब उस वहाबी इस्लाम का सबसे बड़ा निर्यातक है जो इस्लामिक स्टेट जैसी आतंकी संगठन की सोच को बढ़ावा देता है. सऊदी अरब सदियों से शिया-सुन्नी नस्लीय हिंसा को हवा देता है. यमन में वो एक नरसंहार का स्पॉन्सर है जिस में अमेरिका उसका समर्थन कर रहा है. अगर ये अरब दुनिया में अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगी है तो अमेरिका को अपने सहयोग पर दोबारा सोचना चाहिए.

मोहम्मद बिन सलमान

मोहम्मद बिन सलमान

जहां तक अमेरिका के हथियारों का बाजार या फिर अरबों के हथियार सौदे की बात है अमेरिका को ये सोचना होगा कि क्या अमेरिका ऐसे देश को हथियार बेच कर अपने नागरिकों की नौकरियां बचाना चाहता है जो यमन जैसे देश में आम लोगों के खिलाफ गृह युद्ध को छेड़ रहा है. ये साफ है कि जैसे शिनजियांग में लाखों की मुसलमान आबादी को कुचलने वाले चीन के खिलाफ जैसे अमेरिका ने कोई कदम नहीं उठाया वैसे ही रियाध को भी हत्या के आरोप में एक हल्की चपत लगा कर बख्श दिया जाएगा.

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