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डोकलाम विवाद के जरिए अपनी कुर्सी मजबूत करने में जुटे हैं चीनी राष्ट्रपति

देश के भीतर कई कमजोर मोर्चों पर जूझते शी जिनपिंग डोकमाल विवाद को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं

Sumit Kumar Dubey Sumit Kumar Dubey Updated On: Jul 19, 2017 04:37 PM IST

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डोकलाम विवाद के जरिए अपनी कुर्सी मजबूत करने में जुटे हैं चीनी राष्ट्रपति

सिक्किम के करीब डोकलाम इलाके में एक महीने से भी ज्यादा वक्त से चल रहे भारत-चीन विवाद के बीच चीनी विदेश मंत्रालय ने एक ताजा बयान जारी करके भारत सरकार को इस विवाद को राजनीतिक फायदे के लिए हवा ना देने की नसीहत दी है. लेकिन चीनी विदेश मंत्रालय के इस बयान से दो दिन पहले चीन से ही एक और खबर आई जो इशारा करती है कि खुद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस विवाद के बीच अपनी कुर्सी को मजबूत करने में जुटे हैं.

दरअसल 2017 का साल चीन की सत्ता में बदलाव का साल है. साल 2012 में राष्ट्रपति चुने गए शी जनपिंग को इसी साल होने वाली चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में दोबारा पार्टी का महासचिव चुना जाएगा और अगले राष्ट्रपति पद की उनकी कुर्सी भी बरकरार रहेगी. लेकिन इसके साथ-साथ चीन में शासन चलाने वाली पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग कमेटी और पोलित ब्यूरो के सदस्यों का चुनाव भी होगा.

ऐसे में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 19 वें अधिवेशन से पहले पार्टी के चोंग्किंग शहर के अध्यक्ष  सुन जेंगसई को हटा दिया  है. यही नहीं उनके खिलाफ पार्टी नियमों के खिलाफ काम करने के आरोप में जांच भी बिठा दी गई है. यानी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 19 वें अधिवेशन से पहले सुन को राजनीतिक रूप से निपटा दिया गया है.

जिनपिंग को चुनौती दे सकते थे सुन जेंगसई

China's President Xi Jinping speaks to the media after a signing bilateral agreements with Chile's President Michelle Bachelet during a meeting at the government house in Santiago

शी जिनपिंग (रायटर इमेज)

52 साल के सुन जेंगसई को चीन की सत्ता के गलियारों में शी जिनपिंग का उत्तराधिकारी माना जाता था. चीन में सत्ता के केंद्र यानी 25 सदस्यीय पोलित ब्यूरो के वह सबसे युवा सदस्य थे. और इस बार उनका सात सदस्यीय स्टैंडिंग कमेटी में जाना तय था.

उम्मीद की जा रही थी कि जिनपिंग के दूसरे कार्यकाल के बाद यानी 2022 में सुन जेंगसई ही चीन की सत्ता संभालेंगे. लेकिन इससे पहले ही उनकी राजनीति को खत्म कर दिया गया.

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इस कदम से साफ है कि इस बार राष्ट्रपति जिनपिंग स्टैंडिंग कमेटी में अपने चहेते लोगों को जगह देंगे. और पश्चिमी मीडिया में इस बात की पूरी संभावना जताई जा रही है कि जिनपिंग परंपरा से हटकर, अपने पांच-पांच सालों के दो कार्यकालों के बाद तीसरे कार्यकाल के लिए भी राष्ट्रपति पद पर जमे रह सकते हैं.

इससे पहले साल 2012 में राष्ट्रपति बनने के बाद जिनपिंग ने चोंग्किंग के ही लोकप्रिय नेता बो जिलाई को हटा कर जेल में डलवा दिया था. उन्हें भी जिनपिंग का उत्तराधिकारी माना जा रहा था.

यानी भारत के साथ सीमा विवाद के दौरान देश में बने राष्ट्रवाद के माहौल का फायदा उठाकर शी जिनपिंग ने अपने तीसरे कार्यकाल के रास्ते की एक बाधा को हटा दिया है. दरअसल चीन की ओर से उसका सरकारी मीडिया भारत के खिलाफ सीमा विवाद पर आक्रामक माहौल बनाने में जुटा है. ताकि चीन की जनता के मन में भारत के साथ युद्ध की आशंका का आतंक खड़ा करके शी जिनपिंग की छवि को और बड़ा किया जा सके.

पिछले ही साल शी जिनपिंग चीन को ‘कोर लीडर’ का रुतबा दिया गया था. इससे पहले चीन के इतिहास में यह रुतबा माओत्से तुंग और देंग जियाओ पिंग जैसे नेताओं को ही हासिल हुआ था. जिनपिंग के सामने कई चुनौतियां हैं.

चमत्कारिक कही जाने वाली चीनी अर्थ व्यवस्था अब अपने ढलान पर है. उसे बरकरार रखने के लिए जिनपिंग ने वन बेल्ट वन रोड यानी ओआरओबी की शुरुआत की है. जिसकी कामयाबी की संभावना पर तमाम अर्थशास्त्री सवाल उठा रहे हैं.

उत्तर कोरिया के सनकी शासक के चलते अमेरिकी बेड़ा चीन की सीमा के करीब पहुंचा हुआ है. अमेरिका का ताइवान को हथियार बेचने के फैसला वन चाइना पॉलिसी पर सवाल खड़े कर रहा है.

चीन के उत्तर-पश्चिमी सूबे जिनजियांग में उग्रवाद की जड़ें जम चुकी हैं. वहीं तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा की हाल ही में की गई तवांग यात्रा को दुनिया भर के तिब्बतियों के समर्थन ने भी चीन को परेशान किया हुआ है.

ऐसा लग रहा है कि घरेलू और बाहरी परेशानियों के बीच अपने देश की जनता को राष्ट्रवाद का झुनझुना थमाने और अपने राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ताकत और छवि को बरकरार रखने के लिए चीनी सरकार भारत के साथ डोकलाम में टकराव के इस रास्ते पर अभी बरकारार रहेगी.

युद्धाभ्यास की तस्वीरों के जरिए प्रोपेगेंडा

china militry

एक ओर जहां चीन सीमा पर युद्धाभ्यास की तस्वीरें जारी करके युद्धोन्माद का प्रोपेगेंडा खड़ा कर रहा है. चीनी विदेश मंत्रालय डोकलाम से भारतीय सेना की वापसी से पहले बातचीत की किसी भी गुंजाइश से इनकार कर रहा है.

वहीं दूसरी ओर भारत में चीन के राजदूत ने ना सिर्फ विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की है बल्कि इसी विवाद के दौरान वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन,असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई तक से मुलाकात कर चुके हैं.

यही नहीं खबरों के मुताबिक भारत में चीनी राजदूत की पत्नी भूटान की सरकार से बात करने के लिए थिंपू भी जा चुकी हैं.

यानी भारत के साथ विवाद को सुलझाने के लिए एक ओर चीन के राजनयिक प्रयास भी जारी हैं वहीं दूसरी ओर इस स्थिति को चीनी राष्ट्रपति घरेलू मोर्चे पर भुनाना चाहते हैं.

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