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मोदी सरकार की नई विदेश नीति, अरब देशों से रिश्ते बेहतर करने की पहल

मोदी सरकार का अरब देशों से ताल्लुक बेहतर करने का मिशन कई लोगों को पसंद आया है

Updated On: Feb 06, 2017 04:46 PM IST

Shantanu Guha Ray

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मोदी सरकार की नई विदेश नीति, अरब देशों से रिश्ते बेहतर करने की पहल

पश्चिम एशियाई देशों से भारत की बढ़ती नजदीकी बहुत ज्यादा सुर्खियां नहीं बटोर रही है. मगर मोदी सरकार का अरब देशों से ताल्लुक बेहतर करने का मिशन कई लोगों को पसंद आया है.

कई जानकारों को लगता है कि, अरब मुल्कों से नजदीकी बढ़ाने से घरेलू मोर्चे पर मोदी सरकार ये संदेश भी देने में कामयाब होगी कि वह धर्मनिरपेक्ष है.

प्रधानमंत्री मोदी का इरादा विदेश नीति में पश्चिमी एशियाई देशों को अहमियत देने का है. उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ईरान, इराक और कतर के अलावा फिलिस्तीन से ताल्लुक बेहतर करने पर जोर दिया है.

हालांकि, इन नीतियों से भारत अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर संदेश देना चाह रहा है. मगर इसका घरेलू राजनीति पर भी असर होगा. भारत में 14 करोड़ मुसलमान रहते हैं, जो दुनिया के किसी देश में मुसलमानों की दूसरी सबसे ज्यादा आबादी है.

प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक और विदेश नीति में काफी दिलचस्पी है. अरब देशों के साथ संबंध बेहतर करके वो मुस्लिम देशों के बीच पाकिस्तान के असर को भी कम करना चाह रहे हैं. ताकि भारत के साथ विवाद में इन देशों का पाकिस्तान को मिल रहा समर्थन कमजोर हो.

विदेश मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि बहुत से लोग पीएम मोदी की इस नीति के समर्थक हैं. सूत्रों के मुताबिक, मोरक्को की राजधानी रबात से कुछ जानकारियां ऐसी मिली हैं कि आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा मोरक्को की जमीन का इस्तेमाल अपनी गतिविधियों के लिए कर रहे हैं.

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मोरक्को की संसद (तस्वीर-विकीकॉमंस)

मोरक्को से गुजारिश

सूत्र बताते हैं कि भारत पिछले 10 साल से मोरक्को से गुजारिश कर रहा था कि वो अपने देश में लश्कर की गतिविधियों की जानकारी साझा करे. मगर भारत की अपील अनसुनी कर दी जा रही थी. अब हालात बदल रहे हैं.

मोदी की मुस्लिम देशों से संबंध बढ़ाने की इस नीति के पीछे हैं विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर. अकबर सीरिया, इराक और फिलिस्तीन का दौरा कर चुके हैं, ताकि इन देशों से भारत के रिश्तों को नए सिरे से गढ़ा जा सके.

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कभी चर्चित संपादक रहे एमजे अकबर ने इस मुद्दे पर हमसे बात करने से इनकार कर दिया. लेकिन विदेश मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि सरकार मुस्लिम देशों से ताल्लुक बेहतर करने पर बहुत जोर दे रही है. इसी का नतीजा था कि इस बार गणतंत्र दिवस की परेड में संयुक्त अरब अमीरात के शहजादे शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान को मुख्य अतिथि बनाया गया था.

इस एक कदम से भारत ने ये साफ कर दिया है कि वो खाड़ी देशों से अपने रिश्तों को नई दशा-दिशा देना चाहता है. सूत्रों ने कहा कि, पूर्व प्रधानमंत्री कई बार अमेरिका गए मगर उन्होंने सिर्फ एक बार संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया जबकि, वहां बीस लाख से ज्यादा भारतीय रहते हैं.

कई पूर्व राजनयिक कहते हैं कि मोदी सरकार का ये कदम घरेलू राजनीति के लिहाज से भी कारगर है. संयुक्त अरब अमीरात के युवराज शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान सरकार के मुखिया नहीं हैं. लेकिन वो संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं की नई पीढ़ी की नुमाइंदगी करते हैं.

नहयान खाड़ी देश में बेहद लोकप्रिय हैं. उनकी वजह से संयुक्त अरब अमीरात और भारत की सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ा है. पूर्व राजनयिक हरदीप पुरी कहते हैं कि ये भारत के लिए फायदे की बात है. हरदीप पुरी के मुताबिक ऐसे कदम से भारतीय मुसलमानों के बीच भी अच्छा संदेश जाता है.

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संयुक्त अरब अमीरात से उम्मीदें

ऐसा इसलिए क्योंकि, भारत के मुसलमान मानसिक सहयोग के लिए संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब की तरफ उम्मीद भरी निगाह से देखते हैं. मोदी सरकार खाड़ी देशों से ताल्लुक पर जोर देकर भारतीय मुसलमानों के बीच अच्छा संदेश दे सकते हैं. साथ ही इससे इन देशों में पाकिस्तान का असर कम करने में भी आसानी होगी.

पुरी के मुताबिक, यूपी के चुनाव में इस बात का फायदा बीजेपी को मिल सकता है. पुरी के मुताबिक शेख जायद अल-नहयान के दौरे से भारत को खाड़ी देशों में ब्रांड इंडिया को मजबूत करने में मदद मिलेगी.

संयुक्त अरब अमीरात को भारत के निर्यात का दूसरा बड़ा हिस्सा जाता है, साथ ही संयुक्त अरब अमीरात भारत का तीसरा बड़ा कारोबारी साझीदार है. उसका नंबर चीन और अमेरिका के बाद आता है. दोनों देशों के बीच करीब पचास अरब डॉलर का कारोबार होता है.

भारत के लिए फायदे की बात ये है कि दोनों देशों के बीच रक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ रहा है. साथ ही दोनों देशों में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 75 अरब डॉलर के निवेश के समझौते पर भी बात चल रही है. छह देशों के सदस्यों वाली गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल, भारत की तेल और गैस की जरूरतों का आधा हिस्सा सप्लाई करती है.

इन देशों के पास दुनिया के 45 फीसद तेल और 20 प्रतिशत गैस के भंडार हैं. एनर्जी एक्सपर्ट नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि, खाड़ी देश भारत के बड़े बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते हैं. हाल के दिनों में भारत ने फिलिस्तीन से भी संबंध बेहतर करने पर जोर दिया है.

सीरिया और इराक के संघर्ष में भारत का रोल न के बराबर है. ऐसे में फिलिस्तीन से बेहतर ताल्लुक से भारत इस इलाके में अपना असर बनाए रखना चाहता है.

Muslims shout slogans as they take part in a rally demanding increase in allowances for clerics and opposing the Indian government's move to change the Muslim Personal Law, according to a media release, in Kolkata

मुसलमान मतदाता को लुभाने की कोशिश की जा रही है

भारतीय मुसलमानों को संदेश

मोदी सरकार का अब तक पूरा जोर इजराइल से संबंध बेहतर करने पर रहा है. इससे कई अरब देश नाखुश भी हुए हैं. इसका भारतीय मुसलमानों के बीच भी अच्छा संदेश नहीं गया है. फिलिस्तीन से रिश्ते बेहतर करके मोदी सरकार इस नाखुशी को दूर करना चाहती है.

जेएनयू के प्रोफेसर आफताब कमाल पाशा कहते हैं कि, भारत हमेशा से फिलिस्तीन का समर्थक रहा है. अब इस पर नए सिरे से जोर देकर वो इजराइल से बढ़ते रिश्तों से हो रही नाराजगी को दूर कर सकता है.

पाशा बताते हैं कि साझा आयोग की बैठक में फिलिस्तीनी अधिकारियों ने इस बात पर खुशी जताई कि भारत ने उनसे संबंध बढ़ाने में फिर से दिलचस्पी दिखाई है. उन्हें लगता है कि, इसका फायदा फिलिस्तीन को भी मिल सकता है क्योंकि भारत के इजराइल से काफी अच्छे रिश्ते हैं.

पाशा कहते हैं कि आज की तारीख में आधे अरब देश खुद ही इजराइल से रिश्ते बेहतर करने पर जोर दे रहे हैं. भारत इजराइल से बड़े पैमाने पर हथियार खरीद रहा है. दोनों देशों के बीच सुरक्षा साझीदारी बढ़ रही है. दोनों देश अब एटमी हथियारों की तकनीक के लेनदेन पर भी बात कर रहे हैं. साथ ही मौजूदा सरकार इजराइल की पानी के बेहतर इस्तेमाल की तकनीक का भी फायदा उठाना चाहती है.

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भारत में राजनयिक सूत्र कहते हैं कि मोदी सरकार की फिलिस्तीन में दिलचस्पी की एक और वजह भी है. भारत, फिलिस्तीन के गाजा शहर मे इन्फोटेक पार्क बनाना चाहता है. ये फिलिस्तीन की तरक्की में भारत का अब तक का सबसे बड़ा योगदान होगा. विदेश मंत्रालय इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है.

पिछले महीने एम जे अकबर ने जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी को एक चिट्ठी लिखी थी. इसमें उन्होंने तीन फिलिस्तीनी यूनिवर्सिटी से सहयोग के समझौते को लागू करने में नाकामी पर नाखुशी जताई थी. चिट्ठी में उन्होंने जामिया के वाइस चांसलर तलत अहमद से पूछा था कि फिलिस्तीन की अल- कुद्स, अल इस्तिकाल और हेब्रान यूनिवर्सिटी से समझौता अधर में क्यों लटका है?

पीएम मोदी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खासा रुचि लेते हैं

पीएम मोदी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खासा रुचि लेते हैं

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति

प्रधानमंत्री मोदी अपनी कोशिशों के फौरी नतीजे चाहते हैं. वो मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की जगह बेहद अहम है. वो देख रहे हैं कि ईरान और इजराइल से बहुत से देशों से अच्छे रिश्ते नहीं हैं. आज भारत और ईरान के ताल्लुक काफी अच्छे हो गए हैं. शायद किसी भी अरब देश से भारत के रिश्ते उतने अच्छे नहीं, जितनी आज की तारीख में ईरान से है.

अगर अमेरिका, ईरान से पाबंदियां हटाता है तो इसका सबसे ज्यादा फायदा भारत को होगा. हालांकि ट्रंप प्रशासन से इसकी उम्मीद कम ही है.

हरदीप पुरी कहते हैं कि भारत, ईरान और इजराइल के करीब आने से दुनिया की राजनीति पर भी असर पड़ना तय है. मोदी सरकार मानती है कि अरब देशों और ईरान-इजराइल से अच्छे संबंध से भारत को एनर्जी सिक्योरिटी मिलेगी, जो देश की तरक्की के लिए जरूरी है.

साथ ही इसके जरिए वो दुनिया के नक्शे पर विश्व नेता की छाप छोड़ने में भी कामयाब होंगे. मोदी को ऐसे नेता के तौर पर देखा जाएगा जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना असर छोड़ा. पर सवाल ये है कि क्या ऐसा होगा?

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'मोदी डॉक्ट्रिन' किताब के लेखक डॉक्टर अनिर्बान गांगुली कहते हैं कि, बरसों से भारत की पश्चिमी एशिया नीति, पाकिस्तान के चश्मे से देखी जाती रही. जबकि, इसका भारतीय मुसलमानों पर गहरा असर होता है. अब मोदी सरकार अपनी नई विदेश नीति से इस तस्वीर को बदलना चाहती है.

भारत के मुसलमान हमेशा से चाहते रहे हैं कि, भारत के मुस्लिम देशों से ताल्लुक अच्छे रहें. ऐसा कदम अब मोदी सरकार उठा रही है ताकि वो मुसलमानों की अपेक्षाओं पर खरी उतर सके.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव इस बात का इम्तिहान हैं कि, मोदी और उनकी नीतियों का मुसलमानों पर कितना असर हुआ है. उत्तरप्रदेश में तीन करोड़ अस्सी लाख मुसलमान रहते हैं, जो किसी भी प्रदेश में अल्पसंख्यकों की सबसे ज्यादा आबादी है.

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