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चीन की रेल पर सवार हो कर दिल्ली से दूर न चला जाए नेपाल

भारत के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक, आध्यात्मिक विरासत रखने वाला सबसे भरोसेमंद पड़ोसी नेपाल बदल क्यों रहा है?

Updated On: Jun 22, 2018 10:31 AM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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चीन की रेल पर सवार हो कर दिल्ली से दूर न चला जाए नेपाल

जो देश अपनी हर छोटी-मोटी जरूरत भारत की मदद से पूरी करता आया हो वो अब चीन के लुभावने सपनों में अपना सुखी संसार देख रहा है. जो देश भारत के पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों की नीति में सबसे अहम हो वो चीन की सेना के साथ संयुक्त अभ्यास कर रहा है. जिस देश के लोगों का भारत में आवाजाही पर वीजा नहीं लगता हो वो चीन की रेल को काठमांडू बुला रहा है. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि भारत के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक, आध्यात्मिक विरासत रखने वाला सबसे भरोसेमंद पड़ोसी नेपाल बदल क्यों रहा है?

फोटो रॉयटर से

फोटो रॉयटर से

नेपाल में राजशाही के खात्मे के बाद सत्ता में आईं सरकारें अपनी पार्टियों के भविष्य को देखते हुए प्राथमिकताएं तय करती आई हैं. उन प्राथमिकताओं में  देशों के साथ संबंध भी तय होते आए हैं. नेपाल में पूर्ण बहुमत से आई वामदलों की सरकार चीन के लिए पलक-पांवड़े बिछाती दिखती हैं. नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली को चीन के प्रति झुकाव के लिए जाना जाता है. ओली की विचारधारा का रंग चीन के लाल झंडे जितना ही गाढ़ा है. तभी उन्होंने भारत का भ्रम तोड़ते हुए चीन के 'वेलकम' के लिए नेपाल के दरवाजे खोलने में देर नहीं की. ऐसा लग रहा है कि जैसे किसी तय पटकथा की तरह नेपाल और चीन के बीच समझौतों के सिलसिले चल रहे हैं.

नेपाल का दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद ओली चीन की सात दिवसीय यात्रा पर हैं. इस दौरान नेपाल चीन के साथ अबतक 152 अरब रुपए के समझौतों पर दस्तखत कर चुका है. जबकि अभी केपी शर्मा ओली की चीन के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मुलाकात होना बाकी है. लेकिन नेपाल की चीन के साथ समझौतों की रफ्तार देखकर समझा जा सकता है कि पीएम ओली चीन से आर्थिक और व्यापारिक सहयोग लेने के लिए हर समझौते पर दस्तखत करने के लिए आतुर और तैयार दिख रहे हैं.

Pakistan's Prime Minister Shahid Khaqan Abbasi is welcomed by his Nepalese counterpart Khadga Prasad Sharma Oli, also known as K.P. Oli after his arrival in Kathmandu, Nepal March 5, 2018. REUTERS/Navesh Chitrakar - RC16D59A6BA0

भारत के साथ चिंता की बड़ी बात ये है कि भारत के सहयोग से अपनी सड़कों, इमारतों, स्कूलों, अस्पतालों, यूनिवर्सिटी और पर्यटन स्थलों को बनाने वाला नेपाल अब चीन के मायाजाल में खुद का भविष्य हांगकांग की तरह देख रहा है. नेपाल और चीन के बीच तिब्बत के ल्हासा से नेपाल के काठमांडू तक रेल लाइन बिछाने का समझौता होने जा रहा है. हालांकि ये चीन के लिए सबसे खर्चीली योजना होगी इसके बावजूद फिलहाल चीन की नीति दोनों हाथों से नेपाल पर पैसा लुटाने की है ताकि किसी भी तरह नेपाल को अपने पाले में पूरी तरह लिया जा सके.

वहीं चीन को लेकर नेपाल के पीएम ओली की भी दरियादिली को देखकर ऐसा लग रहा है जैसे कि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियां चुनाव में ‘अदृश्य ताकतों’ से मिली मदद का अहसान चुका रही हों. प्रधानमंत्री ओली उन सभी परियोजनाओं को हरी झंडी दे चुके हैं जो कि उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले कार्यकाल के दौरान चीन के साथ समझौतों में शामिल थीं लेकिन पद से हटने के बाद रद्द कर दी गईं.

बड़ा सवाल ये है कि विस्तारवादी चीन के मोहजाल में नेपाल कैसे फंसता जा रहा है? भारत ने नेपाल के साथ स्वाभाविक मित्रता ही दिखाई है. रिश्तों के निर्वाह में कहीं उससे देर भी हुई तो गलतियां भी. इसके बावजूद सिर्फ एक सुर में भारत की विदेश नीति पर आरोप मढ़ना ठीक नहीं होगा.

काठमांडू का बौद्ध स्वयंभूनाथ मंदिर (तस्वीर- विकीमीडिया)

काठमांडू का बौद्ध स्वयंभूनाथ मंदिर (तस्वीर- विकीमीडिया)

दरअसल साल 2015 में नेपाल में मधेसी आंदोलन की वजह से आर्थिक नाकेबंदी हुई. आर्थिक नाकेबंदी से नेपाल में रोजमर्रा की चीजों में कमी आने लगी. इसके लिए भारत को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए भारत विरोधी हवा बनाई गई. जिससे भारत-नेपाल रिश्तों में खटास पड़ना शुरू हो गई. उस वक्त भी नेपाल में केपीएस ओली ही प्रधानमंत्री थे.

आर्थिक नाकेबंदी का नेपाल में जबरदस्त राजनीतिक इस्तेमाल किया गया. भारत विरोधी तत्वों ने भारत के खिलाफ जमकर दुष्प्रचार किया. आर्थिक नाकेबंदी के फैसले से भारत को बड़ा नुकसान तब पहुंचा जब नेपाल ने भारत के विकल्प के तौर पर चीन से हाथ मिला लिया. केपीएस ओली ने चीन के साथ ट्रांजिट ट्रेड का समझौता कर चीन को नेपाल में औपचारिक एंट्री दे दी. हालांकि इस संधि से पहले भी पिछले एक दशक से चीन का नेपाल में दखल बढ़ता जा रहा था. चीन ने नेपाल में इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी से जुड़े प्रोजेक्ट को समय से पहले पूरा कर नेपाली जन मानस में भरोसा जगाने का काम किया था.

वहीं भारत केवल मूकदर्शक की तरह नेपाल में बदलते घटनाक्रम को देखता रह गया. नेपाल के साथ रिश्तों को वापस पटरी पर लाने में भारत की तरफ से पहल में देर भी हुई. इसी का नतीजा है कि नेपाल अब काठमांडू के स्टेशन पर चीन से आती हुई रेल को हरी झंडी दिखाना चाहता है.

हालांकि नेपाल के पीएम ओली ने दोबारा पीएम बनने के बाद भारत के साथ सद्भाव की पहल भी दिखाई. उन्होंने रिश्तों के संतुलन के लिए अपनी विदेश यात्रा में सबसे पहले भारत को ही चुना. इधर पीएम मोदी ने भी भारत-नेपाल के रिश्तों को पटरी पर लाने के लिए नेपाल यात्रा की. मोदी ने भारत-नेपाल के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्तों की विरासत पर जोर दिया था. जनकपुर से अयोध्या के बीच बस सेवा की शुरुआती भी की. भारत ने ल्हासा-काठमांडू रेल लाइन के जवाब में बिहार के रक्सौल से काठमांडू तक रेल लाइन बिछाने की पेशकश की.

Nepal PM Visits India

लेकिन बदलते दौर में आपसी संबंधों की मिठास अब आर्थिक हित तय करने लगे हैं. नेपाल को शायद लगता है कि वो चीन को 'बड़ा भाई' बता कर भारत के साथ बराबरी की दोस्ती हासिल कर सकता है. वहीं नेपाल की ओली सरकार चाहती है कि भारत उसके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप न करे और एक दूसरे के साथ बराबरी से व्यवहार करते हुए आपसी संबंधों का निर्वाह करे. कल तक नेपाल के अंदरूनी मामलों में भारत के हस्तक्षेप को एक मदद के तौर पर देखा जाता था तो राजशाही के खात्मे के बाद बदलते राजनीतिक हालात में उसे राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने वाला दखल बताया जाने लगा.

जबकि नेपाल की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियां ऐसी रही हैं कि वहां के किसी भी राजनीतिक या सामाजिक संकट के वक्त भारत की भूमिका बड़े भाई के रूप में जरूरी है. इसके बावजूद भारत ने कभी भी नेपाल की संप्रभुता को कम करके नहीं आंका और नेपाल को दूसरे देशों की तरह ही सम्मान दिया है.

लेकिन चीन और पाकिस्तान की मदद से नेपाल में भारत विरोधी तत्वों ने भारत के खिलाफ माहौल बनाने का काम किया जिसने भारत-नेपाल रिश्तों में अस्थिरता लाने का काम किया. नेपाल के अंदरूनी हालातों में भारत पर दखल का आरोप लगाने वाला नेपाल अब चीन और पाकिस्तान के बिछाए जाल में बुरी तरह उलझता दिख रहा है.

Prime Minister Narendra Modi in Nepal

भारत के पास यही विकल्प है कि नेपाल में चीन की धमक को देखते हुए वो भी भरोसा जगाने के लिए शिद्दत से जुटे. काठमांडू और दिल्ली के बीच संवाद में कमी न रखे. साथ ही  सकारात्मक माहौल बनाने के लिए नेताओं की यात्राएं भी जारी रहें.

नेपाल के जनमानस को जिताने के लिए भी भारत को नेपाल में अधर में लटके अपने प्रोजेक्ट को पूरा करना चाहिए ताकि चीन को लेकर ये आम राय न बन सके कि सिर्फ वो ही समय पर अपने प्रोजेक्ट पूरा कर देता है. भारत को बेहद सतर्कता के साथ चीन-नेपाल रिश्तों पर सजग रहने की जरूरत है ताकि भविष्य में अरुणाचल प्रदेश जैसी सीमा पर होने वाली समस्या नेपाल की जमीन से भी  सिरदर्द न बन सके.

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