In association with
S M L

इजरायल-भारत आगे बढ़ गए पीछे छूट गया फिलीस्तीन!

भारत और इज़रायल के संबंधों की गर्मजोशी के बीच फिलीस्तीन पीछे छूटता जा रहा है

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jan 14, 2018 06:21 PM IST

0
इजरायल-भारत आगे बढ़ गए पीछे छूट गया फिलीस्तीन!

भारत-पाकिस्तान संबंध जैसे हमेशा वैश्विक चर्चा का विषय रहते हैं करीब वैसे इजरायल और फिलस्तीन की तनातनी दुनिया भर में सुर्खियों में रही है. भारत उन पहले मुल्कों में था जिन्होंने फिलस्तीन को मान्यता दी थी और उन आखिरी मुल्कों में था जिन्होंने इजरायल को मान्यता दी थी. मतलब अगर विदेश नीति के आधार पर देखा जाए तो भारत ने हमेशा फिलस्तीन के मुद्दे को ज्यादा तरजीह दी है. 90 के दशक के आखिरी में देश में छपने वाली ज्यादातर पत्रिकाओं में फिलस्तीनी मामले को लेकर ऐड हुआ करते थे, आर्टिकल हुआ करते थे या फिर तस्वीरें छपा करती थीं. लेकिन हालिया स्थिति बदल चुकी है.

अब शायद ही कभी चैनलों, अखबारों में या पत्रिकाओं में फिलस्तीनी आंदोलन के पक्ष में कुछ विशेष लिखा जा रहा हो. हां खबरें अक्सर सुनाई या दिखाई देती हैं लेकिन कुछ ही देर बाद मुद्दा ओझल हो जाता है. अब फिलस्तीन का मुद्दा भारत के लिए गौण हो गया है. आज की किशोर पीढ़ी से इतर जिन्हें भी फिलस्तीनी नेता यासर अराफात की आखिरी यात्रा याद हो तो उन्हें उसमें भारतीय नेताओं की मौजूदगी जरूर याद होगी. यासर अराफात को भारतीय आम जनमानस में बेहद इज्जत से देखा जाता था. इस समय चारा घोटाले में जेल की सलाखों के पीछे सजा काट रहे लालू यादव भी यासर अराफात की आखिरी यात्रा में शामिल हुए थे.

अराफात की कमी

yasser arafat atal bihari

विदेशी मामलों के कई जानकार भारत के साथ इजरायल के साथ प्रगाढ़ होते संबंध को फिलस्तीनी लीडरशिप में यासर अराफात के जाने के बाद उपजे पॉलिटिकल वैक्यूम से जोड़कर भी देखते हैं. एक तरफ फिलस्तीन कमजोर होता गया दूसरी तरफ इजरायल हर लिहाज से मजबूत हुआ. इजरायल की वैश्विक स्थिति से इतर सिर्फ भारत-इजरायल संबंधों पर भी नजर डाली जाए तो महसूस होगा कि दोनों देशों में प्रगाढ़ता अपने नए दौर में है. 1999 में करगिल युद्ध के बाद से इजरायल और भारत के बीच हथियारों की खरीद का व्यापार 2009 तक तकरीबन 9 बिलियन डॉलर पहुंच गया.

इन्हीं सालों में इजरायल की सूची में हथियार खरीदने वालों में भारत शीर्ष पर पहुंच गया. जबकि भारत जिन देशों से हथियार खरीदता था उनमें पहले नंबर पर रूस तो दूसरे नंबर पर इजरायल आ गया. मतलब एनडीए की अटल बिहारी वाजेपयी की अगुवाई में शुरू हुआ संबंध डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार में अपने पूरे शबाब पर आ गया.

साल 2000 में तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी भारत के ऐसे पहले मंत्री थे जो इजरायल दौरे पर गए. इससे पहले कोई भी भारतीय मंत्री इजरायल दौरे पर नहीं गया था. बाद में इसी साल जसवंत सिंह पहले विदेश मंत्री थे जो इजरायल के दौरे पर गए. इस दौरे के बाद दोनों देशों ने संयुक्त आतंक विरोधी कमीशन भी बनाया था जिससे आतंक के खिलाफ लड़ाई को और मजबूती से लड़ा जा सके. पिछली एनडीए की सरकार में ही पहली बार इजरायली प्रधानमंत्री एरियल शेरोन भारत आए थे. तब सीतारम येचुरी, एबी बर्धन और अवनी राय के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट के नेताओं ने एक प्रदर्शन के दौरान ‘किलर शेरोन वापस जाओ, अटल बिहारी होश में आओ’ के नारे भी लगाए थे. ‘भारत-फिलस्तीन जिंदाबाद’ जैसे नारे भी हवा में खूब गूंजे. लेकिन तत्कालीन एनडीए सरकार ने शेरोन का स्वागत खूब गर्मजोशी से किया जो बाद में यूपीए की सरकार में भी और मजबूत ही हुआ.

2014 के बाद

Indian Prime Minister Narendra Modi, left, shakes hands with Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu during their meeting at the King David hotel in Jerusalem, Wednesday, July 5, 2017. Israel and India have signed a series of agreements to cooperate in the fields of technology, water and agriculture. AP/PTI Photo(AP7_5_2017_000169B)

साल 2014 के आंकड़ों के मुताबिक इजरायल के साथ व्यापारिक संबंधों में भारत का स्थान एशिया में तीसरे नंबर पर था. मई 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दोनों देशों के संबंधों में और ज्यादा मधुरता आई है. सरकार के आलोचक इजरायल के साथ इस बढ़ती प्रगाढ़ता को राष्ट्रवाद के मुद्दे से जोड़कर देखते हैं. इनका मानना है भारत में हिंदू राष्ट्रवादी खुद को यहूदी राष्ट्रवाद से प्रेरित मानते हैं. इसके साक्ष्य के तौर पर विनायक दामोदर सावरकर के उस स्टेटमेंट को भी आलोचक कोट करते हैं जो उन्होंने इजरायल के निर्माण के समय समर्थन के रूप में दिया था.

शायद यही वजह है जब साल 2014 में गाजा पट्टी पर विवाद बढ़ा तो भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सफाई देते हुए कहा था कि फिलस्तीन पर हमारी नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है. हम इजरायल के साथ बेहतर संबंधों की कोशिश करते हुए फिलस्तीन के मुद्दे को लगातार समर्थन देते रहेंगे. हालांकि उसी साल जब यूनाइटेड नेशंस में इस बात के लिए वोट किया जाना था कि इजरायल ने युद्ध संबंधी अपराध किए हैं या नहीं, तो भारत ने खुद को वोटिंग प्रक्रिया से अलग कर लिया था. जबकि 41 देशों ने इजरायल के विरुद्ध वोट किया था. इसके लिए इजरायल की तरफ से भारत का शुक्रिया भी अदा किया गया.

जबकि ऐसा माना जाता है कि कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों में हमेशा फिलस्तीन समर्थक नीति रही. कांग्रेस की नीति की आलोचना इस बात पर भी की जाती है कि भारत फिलस्तीन के पक्ष में कभी भी कुछ बेहतर कर सकने की स्थिति में नहीं था और देश में सेकुलर वोटों को जोड़ने के लिए फिलस्तीन के मुद्दे को कायम रखा गया.

दुनियाभर में इजरायल पर इस बात के आरोप लगते रहे कि उसकी तरफ से हमास की लीडरशिप को खत्म किया जा रहा है. यहां तक कि यासर अराफात की मृत्यु के कारणों को लेकर कई तरह की थ्योरी हैं. हां 2004 में जब यूपीए सरकार आई तो कांग्रेस की नीति पहले से काफी बदली हुई थी. एनडीए की सरकार में जिन संबंधों को तरजीह दी गई थी वो यूपीए की सरकार में लगातार कायम रहे.

भारत से बहुत दूर नहीं रहा इज़रायल

MUMBAI ATTACK

दूसरी तरफ इजरायल कभी भी भारत के साथ अपने संबंधों को लेकर किसी हिचक में नहीं रहा. 2008 में 26 नवंबर को मुंबई में हुए दुर्दांत आतंकी हमलों के बाद न इजरायल ने सिर्फ तुरंत निंदा की बल्कि आगे भी आतंकी डेविड कोलमैन हेडली के मामले में वहां की खुफिया एजेंसी मोसाद ने काफी मदद की.

इस बार की यात्रा के ठीक पहले भी जारी एक बयान में इजरायली पीएम नेतान्याहू ने भारत के साथ बेहतर संबंधों की दुहाई दी है. बयान में कहा गया है, ‘ मैं भारत की ऐतिहासिक यात्रा पर जा रहा हूं. मैं वहां प्रधानमंत्री से मिलूंगा, मेरे मित्र नरेंद्र मोदी से. भारत के राष्ट्रपति और कई अन्य नेताओं के साथ भी मुलाकात करुंगा. हम कई करारों पर दस्तखत करेंगे. हम इजरायल और दुनिया की इस महत्वपूर्ण ताकत के साथ संबंधों को मजबूत करेंगे. यह हमारे सुरक्षा, आर्थिक, व्यापार और पर्यटन क्षेत्रों के हित में है. इसके अलावा कई अन्य क्षेत्रों को भी फायदा होगा. यह इजरायल के लिए एक बड़ा वरदान होगा.’

पीएम मोदी भी शनिवार को नेतान्याहू के स्वागत में प्रोटोकॉल तोड़कर पहुंचे. दोनों के संबंधों में बेहद गर्मजोशी दिखी. इसमें संदेह भी नहीं कि शायद कई व्यापारिक समझौते दोनों देशों के बीच हों. लेकिन हाल में इजरायल की राजधानी यरुशलम किए जाने को लेकर भारत की निगेटिव वोटिंग के मायने क्या भूल जाने चाहिए? क्या विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बयान के मायने बदल जाएंगे? क्या फिलस्तीन के मुद्दे पर भी भारत कोई बात करेगा? गाजापट्टी पर इजरायली तानाशाही झेल रहे फिलस्तीनी नागरिकों के पास जब हमारे पीएम और नेतान्याहू की यूं गले मिलते तस्वीर पहुंचेगी तो उसे वो भारत जरूर याद आएगा जिसने हमेशा उसके लिए स्टैंड लिया. क्या वो भारत जैसे बड़े देश से उम्मीदें फिर भी पाले रहे पाएगा?

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
गणतंंत्र दिवस पर बेटियां दिखाएंगी कमाल!

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi