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भारत के पैसों पर पलने वाले आतंकवादी असल समस्या: पाक मीडिया

पाकिस्तान का कहना है कि भारत और अमेरिका की छत्रछाया में अफगानिस्तान में आतंकवाद फल-फूल रहा है

Seema Tanwar Updated On: Dec 04, 2017 10:37 AM IST

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भारत के पैसों पर पलने वाले आतंकवादी असल समस्या: पाक मीडिया

पाकिस्तानी अखबारों को देखकर लगता है कि वहां उल्टी ही गंगा बह रही है. पूरी दुनिया जहां आतंकवाद फैलाने और आतंकवादियों को सुरक्षित पनाहगाहें मुहैया कराने का इल्जाम पाकिस्तान पर लगाती है, वहीं पाकिस्तानी अखबार इस तरह के इल्जाम अमेरिका और भारत पर मढ़ते हैं. पेशावर के एक कृषि ट्रेनिंग कॉलेज में पिछले दिनों हुए तालिबान हमले के बाद फिर इसी तरह के इल्जाम पाकिस्तानी मीडिया में गर्दिश कर रहे हैं.

बुरका पहन कर आए आंतकवादियों ने शुक्रवार को पेशावर के कॉलेज में हमला किया जिसमें 9 लोग मारे गये और 30 से ज्यादा घायल हो गये. पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि अफगानिस्तान से आए तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान के आतंकवादियों ने हमले को अंजाम दिया. पाकिस्तानी अखबारों का कहना है कि हर दिन पाकिस्तान को आतंकवादी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने की हिदायत देने वाला अमेरिका अफगानिस्तान में क्यों उन पर लगाम नहीं लगा रहा है. इस सिलसिले में पाकिस्तानी मीडिया ने फिर अफगानिस्तान में भारत की बढ़ते प्रभाव पर सवाल उठाये हैं.

गुड और बैड तालिबान

'उम्मत' अखबार लिखता है कि अमेरिका चाहता ही नहीं है कि आतंकवाद का पूरी तरह सफाया हो क्योंकि फिर वह इस क्षेत्र में अपना वजूद और सैन्य मौजूदगी को कैसे बनाये रख पाएगा. अखबार के मुताबिक हैरतअंगेज बात यह है कि अमेरिका पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवादियों की मौजूदगी को खुद अपने लिए खतरा मानता है लेकिन इसके साथ ही तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान गुट को भी संरक्षण दिए हुए है.

अखबार लिखता है कि सितम तो यह है कि कुछ मीडिया संस्थान “भारत से फंडिंग लेकर पाकिस्तान में हमले करने वाले” प्रतिबंधित गुट तहरीक ए तालिबान के आतंकवादियों और अपने “देश को अमेरिकी कब्जे से मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रहे” अफगान तालिबान में फर्क नहीं जानते हैं या फिर इस फर्क को बयान करने से गुरेज करते हैं. अखबार की इस टिप्पणी से साफ है कि उसकी नजर में अब भी अफगान तालिबान गुड तालिबान है और पाकिस्तानी तालिबान बैड तालिबान है.

रोजनामा 'इंसाफ' लिखता है कि अफगानिस्तान की सरजमीन पर “भारतीय पैसे पर पलने वाले आतंकवादी” असली समस्या हैं. अखबार कहता है कि अमेरिका की नाक के नीचे ये तत्व अमेरिका की मर्जी के बगैर पाकिस्तान के खिलाफ हमले जारी नहीं रख सकते हैं. अखबार की टिप्पणी है कि नकाब पहन कर आने वाले हमारे सामने पूरी तरह बेनकाब हैं कि उन्हें अफगान सरजमीन पर “भारत और अमेरिका का आशीर्वाद” हासिल है और सिर्फ इसका मकसद यह है कि पाकिस्तान को अस्थिर किया जाए.

अखबार ने एक अफगान सांसद जाहिर कदीर के हवाले से लिखा है कि अमेरिकी हेलीकॉप्टरों से आतंकवादी गुटों को सहूलियत मुहैया कराई जाती हैं. अखबार ने पाकिस्तान में आत्मसमर्पण करने वाले तालिबान नेता एसहानुल्लाह एहसान और मौत की सजा पाने वाले भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव के तथाकथित बयानों के आधार पर लिखा है कि पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवाद के केंद्र अमेरिकी कब्जे वाले अफगानिस्तान में हैं और वे भारत अमेरिका की छत्रछाया तले बैठकर “पाकिस्तान में आंतकवाद की जंग”लड़ रहा है.

सफाया बाकी

‘दुनिया’ लिखता है कि पेशावर के हालिया आतंकवादी हमले ने आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए भयानक हमले की याद ताजा कर दी है. अखबार कहता है कि वह हमला 2014 में 16 दिसंबर को किया गया था जबकि बीते शुक्रवार को हमले के दिन एक दिसंबर था.

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अखबार की राय है कि तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान की तरफ से इस हमले की जिम्मेदारी लेने से साफ होता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में हथियारबंद ऑपरेशनों की बदौलत चरमपंथियों की ताकत घटी जरूर है लेकिन अभी तक उनका पूरी तरह सफाया नहीं हुआ है और इसीलिए जब और जहां उन्हें मौका मिलता है, वे हमले करने से नहीं चूकते हैं.

अखबार के मुताबिक पहले क्वेटा और अब पेशावर में हमले से साफ है कि देश की शांति को भंग करने वाले एक बार फिर सक्रिय हो गये हैं, इसलिए जरूरी है कि सियासी सेटअप सिक्योरिटी फूलप्रूफ बनाने में मददगार हो क्योंकि देश से आतंकवाद का सफाया सिर्फ सुरक्षा बलों की ही नहीं, बल्कि सब की जिम्मेदारी है.

‘जंग’ अखबार ने भी पेशावर हमले के लिए अफगानिस्तान से होने वाली कथित घुसपैठ को जिम्मेदार बताया है. अखबार ने भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए जहां अफगानिस्तान से लगने वाली सीमा के बेहतर प्रबंधन पर जोर दिया है, वहीं अफगानिस्तान और अमेरिका से सहयोग की उम्मीद जतायी है.

रूस के साथ की उम्मीद

‘नवा ए वक्त’ ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी के रूसी दौरे पर संपादकीय लिखा है और भारत से मुकाबला करने के लिए चीन के अलावा रूस का साथ मिलने की उम्मीद भी जताई है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए रूस के शहर सोची के दौरे पर गए जहां उनकी रूस और चीन के प्रधानमंत्रियों के साथ मुलाकातें हुईं.

अखबार के मुताबिक यह स्वागतयोग्य बात है कि इन मुलाकातों के चलते रूस और चीन के साथ रक्षा सहयोग में इजाफा होगा जो “भारत की जंगी तैयारियों” को देखते हुए बहुत जरूरी है. अखबार के मुताबिक चीन तो पहले ही पाकिस्तान के रुख को समझता है, लेकिन रूस भी अगर कश्मीर, आतंकवाद और भारत के बारे में पाकिस्तान की नीति को समझने लगे तो इस इलाके में अस्थिरता पैदा करने वाली “भारत की साजिशों” को नाकाम बनाया जा सकता है.

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