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धमकियों से डरा रहा है ड्रैगन, युद्ध करने से पहले दस बार सोचेगा चीन

चीन से टकराव के हालातों के बीच 1962 और 2017 का फर्क ये है कि भारत के साथ कई देश खड़े हैं

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Aug 23, 2017 08:38 AM IST

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धमकियों से डरा रहा है ड्रैगन,  युद्ध करने से पहले दस बार सोचेगा चीन

डोकलाम के मुद्दे पर बार-बार मिल रही चीन की धमकियों में ड्रैगन का डर झलकने लगा है. इसकी बड़ी वजह ये है कि अब डोकलाम का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय बनता जा रहा है. चीन ने नई धमकी दी है कि अगर हमारे सैनिक भारतीय सीमा में घुसे तो हालात और खराब हो जाएंगे. चीन के इस माइंडगेम उसकी तिलमिलाहट को देखा जा सकता है.

भारत इस मनोवैज्ञानिक युद्ध में बढ़त बनाए हुए है. डोकलाम के मामले में अमेरिका के बाद जापान भी भारत के साथ खड़ा हो गया है. जापान ने कहा है कि दोनों देशों को विवाद का हल बातचीत से निकालना चाहिए. जापान के बयान पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दर्ज की है. लेकिन भारत की कूटनीतिक कोशिश दुनिया के बड़े देशों को इस मुद्दे पर साथ लाने में कामयाब हो गई है.

इसके बावजूद एक बड़ा सवाल ये है कि अगर भारत और चीन के बीच युद्ध भड़क उठा तो कौन कौन से देश भारत के साथ खड़े होंगे?

Modi-TrumpHug

भारत के लिये चीन से निपटने के लिये अमेरिका का साथ होना बेहद जरूरी है. पीएम मोदी के अमेरिकी दौरे ने भारत-अमेरिका रिश्तों को नया आयाम दिया है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मोदी की करीबी ने आर्थिक और सामरिक रिश्तों की नई शुरुआत की है. मौजूदा समय में अमेरिका भारत का सबसे ताकतवर और करीबी दोस्त है.

अमेरिका डोकलाम मुद्दे पर बारीकी से नजर रखे हुए है. वैसे भी दक्षिण चीन सागर विवाद, ताइवान और उत्तरी कोरिया के मुद्दे पर ट्रंप के बेबाक बयानों के निशाने पर चीन है. ऐसे में अपनी विस्तारवादी और आक्रमणकारी नीतियों की वजह से चीन अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में घिरता जा रहा है.

India's Prime Minister Narendra Modi (front L) and his Japanese counterpart Shinzo Abe smile with Buddhist monks in the background, during their visit to Toji Buddhist temple, a UNESCO World Heritage site, in Kyoto, western Japan, in this photo released by Kyodo August 31, 2014. Modi arrived in Japan on Saturday seeking to capitalise on his affinity with Abe to strengthen security and business ties on his first major foreign visit since his landslide election victory in May. Mandatory credit REUTERS/Kyodo (JAPAN - Tags: POLITICS RELIGION BUSINESS) ATTENTION EDITORS - FOR EDITORIAL USE ONLY. NOT FOR SALE FOR MARKETING OR ADVERTISING CAMPAIGNS. THIS IMAGE HAS BEEN SUPPLIED BY A THIRD PARTY. THIS PICTURE WAS PROCESSED BY REUTERS TO ENHANCE QUALITY. AN UNPROCESSED VERSION WILL BE PROVIDED SEPARATELY. MANDATORY CREDIT. JAPAN OUT. NO COMMERCIAL OR EDITORIAL SALES IN JAPAN

डोकलाम के मुद्दे पर जापान का समर्थन पीएम मोदी और जापान के पीएम शिंजो अबे की दोस्ती की कहानी कहता है. जापान ने डोकलाम में भारत की भूमिका को जायज ठहराया है. भारत और जापान के बीच सामरिक साझेदारियों के नए दरवाजे खुले हैं. जुलाई में भारत, अमेरिका और जापान की सेनाओं ने बंगाल की खाड़ी में संयुक्त युद्धाभ्यास भी किया है.

अमेरिका और जापान के समर्थन के बावजूद भारत को अपने स्वाभाविक मित्र रूस की इस निर्णायक मौके पर बेहद जरूरत है. रूस ने भारत का हमेशा से ही साथ दिया है. 1971 की जंग में रूस की वजह से ही चीन और भारत विरोधी देश भारत के लिये दूसरा मोर्चा नहीं खोल सके थे. लेकिन 1962 में भारत-चीन की जंग में  रूस ने किसी का भी पक्ष नहीं लिया था. तब सोवियत संघ और चीन वैचारिक स्तर पर एक दूसरे के करीब थे. हालांकि अब सोवियत संघ नहीं रहा लेकिन रूस की सुपरपावर सत्ता के संतुलन में अपना असर रखती है. ऐसे में डोकलाम के मामले में रूस की तरफ से अभी किसी बयान का न आना भारत के लिये आशंका बढ़ा जाता है. इतिहास सशंकित करता है कि कहीं इस बार भी रूस डोकलाम विवाद पर छिड़े युद्ध को दोस्त और भाई के बीच का मामला बता कर अलग न हो जाए. 1962 की जंग मे उसने चीन को भाई बताया था. जबकि आज के दौर में वो भारत को स्वाभाविक मित्र कहता है.

Russian President Vladimir Putin (R) and Indian Prime Minister Narendra Modi react while walking near the Constantine (Konstantinovsky) Palace during their meeting in St. Petersburg, Russia, June 1, 2017. REUTERS/Mikhail Metzel/TASS/Host Photo Agency/Pool EDITORIAL USE ONLY. TPX IMAGES OF THE DAY - RTX38MCW

भारत गुट-निरपेक्ष देशों के आवरण से अब बाहर आ चुका है. हालात अब पूरी तरह बदल चुके हैं. आज अमेरिका भारत के मित्र देशों की कतार में आ गया है. अमेरिका की ही वजह से भारत को ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, इजरायल, फ्रांस और इटली का भी समर्थन मिल सकता है. ऑस्ट्रेलिया ने भी चीन को डोकलाम विवाद पर संयम बरतने की नसीहत दी है. दक्षिण चीन सागर विवाद के मामले में ऑस्ट्रेलिया चीन को चेतावनी भी दे चुका है. उधर वियतनाम भी दक्षिण चीन सागर विवाद को लेकर चीन को आंखें दिखा रहा है. ऐसे में चीन कई मोर्चों पर घिरा हुआ महसूस कर रहा है.

लेकिन भारत की सबसे बड़ी कोशिश यही है कि कूटनीतिक तरीके से डोकलाम विवाद को सुलझाया जाए. भारत अपना पक्ष साफ कर चुका है कि डोकलाम में चीन की सड़क बनने से खतरा दिल्ली तक बढ़ जाएगा. वहीं भारत बार-बार भारत-चीन-भूटान के बीच हुए समझौते के मुताबिक यथास्थिति बरकरार रखने की बात कर रहा है.

लेकिन चीन की सेना, मंत्रालय और मीडिया लगातार धमकियां देकर भारत के धैर्य का इम्तिहान ले रहे हैं. चीनी मीडिया के मुताबिक युद्ध की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. चाइना डेली लिखता है कि मुसीबत को दबाने से अच्छा है उसे खत्म कर दिया जाए. मीडिया के जरिए चीन लगातार प्रोपेगेंडा किए जा रहा है.

इसमें कोई शक नहीं है कि चीन की सैन्य ताकत भारत से कई मायनों में बहुत आगे है लेकिन 62 की जंग के बाद से अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. भारत भी परमाणु संपन्न राष्ट्र बन चुका है. भारतीय सेना को डोकलाम भेजने का फैसला बहुत सोच समझकर ही किया गया होगा.

पीएम मोदी ने जहां दुनिया के बड़े देशों के साथ संबंधों को सुधार कर नई मजबूती दी वहीं चीन के संबंध दुनिया के तमाम देशों के साथ खराब ही होते चले गए. लेकिन कूटनीतिक घेराबंदी के अलावा सामरिक और रणनीतिक तौर पर भी भारत को सचेत रहने की जरूरत है. अब भारत को चीन की अगली छद्म चाल से पहले ही किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने की जरूरत है.

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