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सेना प्रमुख बदलने से भारत नीति नहीं बदलेगा पाक

राहिल शरीफ आज पाकिस्तान के सबसे ताकतवर व्यक्ति हैं.

Updated On: Nov 24, 2016 07:10 PM IST

Prakash Katoch

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सेना प्रमुख बदलने से भारत नीति नहीं बदलेगा पाक

भारत और पाकिस्तान में आपसी तनाव के बीच इन दिनों उत्सुकता का भी माहौल है. यह उत्सुकता पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख को लेकर है. दरअसल इस 29 नवंबर को राहिल शरीफ रिटायर हो रहे हैं.

पाकिस्तान में सेना प्रमुख चुनने के लिए प्रधानमंत्री के पास जनरल हेडक्वार्टर से शीर्ष छह सैन्य अधिकारियों के डोजियर भेजे जाते हैं. वहां के रक्षा मंत्री इस डोजियर को हेडक्वाटर से मंगाकर पीएम को भेजते हैं. नए सेना प्रमुख के नाम का अनुमोदन रक्षा मंत्री कर सकते हैं.

लेकिन पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ सेना से जुड़े मामलों से खुद को दूर ही रखते हैं. यह इस लिहाज सही भी है कि ऐसे में गलती की कोई गुंजाइश नहीं बचती. प्रधानमंत्री के पास उम्मीदवारों की सूची पहुंचने पर वे निवर्तमान सेना प्रमुख से सलाह लेकर नए मुखिया की घोषणा करते हैं.

नवाज़ शरीफ़

नवाज के ऊपर दोहरी जिम्मेदारी

29 नवंबर को ही पाकिस्तान के ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ (सीजेसीएस) के अध्यक्ष का पद भी खाली हो रहा है. इसके लिए भी सेना प्रमुख जैसी प्रक्रिया से गुजरना होता है. अब प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर दोनों नियुक्तियों को करने की जिम्मेदारी है.

पहले, पाकिस्तान मीडिया के हवाले से यह खबर आ रही थी कि राहिल शरीफ सेना प्रमुख का कार्यकाल तीन की बजाय चार साल करवाना चाहते हैं. ऐसा होने से उन्हें सेना प्रमुख के तौर पर एक साल और मिल जाता. लेकिन इस साल जनवरी में ही शरीफ ने अपनी रवानगी की घोषणा करके सबको चौंका दिया था. इससे पहले पाकिस्तानी मीडिया ने यह खबर दी थी कि पाकिस्तान सरकार सभी प्रमुखों (सेना, नेवी, एयर फोर्स) के कार्यकाल को तीन से बढ़ाकर चार साल करने की सोच रही है. इसी बीच राहिल शरीफ को फील्ड मार्शल का खिताब दिए जाने को लेकर एक अपील भी पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं. यह खिताब उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकियों के खिलाफ ‘जर्ब-ए-अज्ब’ ऑपरेशन चलाने के लिए दिया गया था. इससे पहले यह अपील रावलपिंडी और लाहौर हाई कोर्ट में भी की गयी थी, जहां इसे खारिज कर दिया गया.

राहिल शरीफ की लोकप्रियता उनके पूर्ववर्तियों की ही तरह है. इस लोकप्रियता पर नजर इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) द्वारा रखी जाती है जिसमें मेजर जनरल रैंक के अफसर होते हैं. ‘द आर्मी एंड डेमोक्रेसी: मिलिट्री पॉलिटिक्स इन पाकिस्तान’ के लेखक अकील शाह के मुताबिक-

‘आईएसपीआर इसके लिए सोशल मीडिया का उपयोग करता है. इसके अलावा कलाकारों, अदाकारों, सिनेमा निर्देशकों और लेखकों के सहयोग से देशभक्ति से भरे वीडियो, गीतों और फिल्मों द्वारा फंड उगाही का रंगारंग कार्यक्रम भी आयोजित करता है. आईएसआई... पत्रकारों को लोभ या भय से नियंत्रित करता है. अगर कोई पत्रकार राहिल शरीफ की छवि या सेना के नीतियों पर सवाल खड़ा करने की हिम्मत करता है, जैसे कोई बलूचिस्तान में सेना की भूमिका पर सवाल खड़ा करता है तो यह उसकी अपनी जिम्मेदारी है.’

कुछ महीने पहले पाकिस्तान में राहिल शरीफ से अगला चुनाव लड़ने की गुजारिश करने वाले कुछ पोस्टर दिखे.

राहिल शरीफ़

सैन्य प्रमुख की दौड़ में शामिल चर्चित नाम

नवाज शरीफ के पास सेना प्रमुख की नियुक्ति का अनुभव पहले से है. वे पांचवीं बार यह नियुक्ति करेंगे. लेकिन मुशर्रफ़ की नियुक्ति के समय वरिष्ठता को नजरअंदाज करना आज भी उनके लिए एक भयंकर सपने की तरह है. तो क्या नवाज वरिष्ठता को आधार बनाएंगे? वरिष्ठता के क्रम के अनुसार इस पद के शीर्ष दावेदार हैं- लेफ्टिनेंट जनरल जुबैर हयात, जनरल स्टाफ के प्रमुख; लेफ्टिनेंट जनरल इशफाक नदीम, मुल्तान सैन्यदल के कमांडर; लेफ्टिनेंट जनरल जावेद इकबाल रामडे, बहावलपुर सैन्यदल के कमांडर और लेफ्टिनेंट जनरल जावेद बाजवा, इंस्पेक्टर जनरल ट्रेनिंग और इवैल्यूएशन. इनके प्रोफाइल में कई विशेषताएं हैं:

• इशफाक नदीम अहमद आजाद कश्मीर राइफल्स से हैं और सीजीएस के रूप में काम किया है. इन्होंने वजीरिस्तान में ब्रिगेडियर के रूप में काम किया है; स्वात ऑपरेशन में मेजर जनरल के रूप में हिस्सा लिया है; जब वह डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन के डायरेक्टर जनरल थे, तब उन्होंने ‘जर्ब-ए-अज्ब’ ऑपरेशन का ब्लू प्रिंट तैयार किया और नवाज शरीफ को इसके बारे में समझाया, जिसके बाद नवाज शरीफ ने इस ऑपरेशन की अनुमति दी.

• जावेद इकबाल रामडे सिंध रेजिमेंट से हैं और स्वात ऑपरेशन के दौरान जीओसी थे, जिसमें एक स्नाइपर की गोली से वह घायल भी हुए थे. इसके बाद उन्होंने नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी, इस्लामाबाद में चार सालों तक कमांडेंट-कम-चीफ इंस्ट्रक्टर के रूप में काम किया और बाद में इसके प्रेसिडेंट भी बने.

• कमर जावेद बाजवा बलूच रेजिमेंट से हैं और लाइन ऑफ कंट्रोल के 10 खास इलाकों में सैन्यदल का नेतृत्व किया है. मेजर जनरल के रूप में उन्होंने उत्तरी इलाकों (एफसीएनए) में भी सेना का नेतृत्व किया है. ये अभी जनरल हेडक्वार्टर में ट्रेनिंग और इवैल्यूएशन के इंस्पेक्टर जनरल हैं. सेना प्रमुख बनने से पहले राहिल शरीफ़ भी इसी पद पर थे.

पाकिस्तानी आर्मी को चाहिए एकाधिकार

नवाज शरीफ को अगले सेना प्रमुख और सीजेसीएस की नियुक्ति करने में एक और वजह से मुश्किल हो सकती है. सीजेसीएस के प्रमुख के रूप में सेना के किसी भी सेवा से चार स्टार वाले (आर्मी, नेवी, एयर फोर्स) किसी भी वरिष्ठतम अफसर की नियुक्ति की जा सकती है. यह पद नेशनल कमांड अथॉरिटी (एनसीए) द्वारा बनाया गया है. आर्मी ने इस पर भी दांव लगा रखा है क्योंकि यह पद परमाणु कमांड और रणनीतिक रूप से अन्य खास चीजों पर नियंत्रण रखता है. सीजेसीएस का प्रमुख प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली एनसीए की तैनाती समिति का उपाध्यक्ष भी होता है.

हालांकि इनमें से सभी सैन्य प्रमुख बनने की योग्यता रखते हैं लेकिन पाकिस्तानी मीडिया की खबरों के मुताबिक बहावलपुर सैन्यदल के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जावेद इकबाल रामडे का नाम सबसे आगे चल रहा है क्योंकि वे नवाज शरीफ के प्रिय हैं और उनके परिवार का राजनीतिक संबंध भी है. लेकिन अभी तक यह सिर्फ अटकलबाजी है. अभी तक अगले सेना प्रमुख की नियुक्ति के लिए नवाज शरीफ और राहिल शरीफ के बीच किसी भी तरह की बातचीत की खबर नहीं आई है.

राहिल शरीफ़

भारत पर प्रभाव

पाकिस्तान का अगला सेना प्रमुख कौन होगा और यह भारत को कैसे प्रभावित करेगा? यह हर बार साबित हुआ है कि पाकिस्तानी सेना और आईएसआई ने हमेशा पाकिस्तान के सिविलियन नेताओं के कामकाज पर वीटो लगाया है और फिलहाल यह तस्वीर अभी बदलने वाली नहीं है. यह भ्रम है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है. एक बार आसिफ अली जरदारी ने आईएसआई को आंतरिक मंत्रालय के तहत लाने का फैसला किया था और मजबूर होकर उन्हें यह फैसला 24 घंटे के भीतर वापस लेना पड़ा. राहिल शरीफ़ आज पाकिस्तान के सबसे ताकतवर व्यक्ति हैं. अगर वह रिटायर हो रहे हैं तो यह उनकी इच्छा है. पाकिस्तान में सेना की ताकत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि मुशर्रफ के खिलाफ वारंट जारी होने के बाद भी इस पर कोई ठोस कदम नहीं लिया गया है.

अमेरिका के नेतृत्व में बदलाव के बाद, अमेरिका हो सकता है कि अपनी नीतियों पर फिर से विचार करे लेकिन अफगानिस्तान के मामले में रणनीतिक लिहाज से चीन और पाकिस्तान के मिलकर काम करता रहेगा. इसी वजह से पाकिस्तान अपनी सीमा के दोनों ओर आतंकवाद को बढ़ावा देते रहता है. पाकिस्तान को अमेरिका से मिलने वाली सहायता में कटौती की स्थिति में चीन पहले से ही तैयार है. बलूचिस्तान में कारवाई करने के लिए चीन द्वारा पाकिस्तान को तीन हमलावर हेलिकॉप्टरों का उपहार, इसका हल्का संकेत है. यह काल्पनिक सोच है कि पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख की नियुक्ति के बाद पाकिस्तान की नीति में कोई बदलाव आएगा. इसके विपरीत पाकिस्तान का रुख और कठोर हो सकता है. हो सकता है कि एशिया शिखर सम्मलेन में सरताज अजीज के दिल्ली आगमन को भारत-पाक संबंध में सुधार के तौर पर देखा जाए लेकिन हर बार की तरह इसका परिणाम भी पाकिस्तान ‘पीठ में छुरा घोंपकर’ ही देगा.

लेखक भारतीय सेना में दिग्गज लेफ्टिनेंट जनरल रह चुके हैं.

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