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अच्छा है! अफगानिस्तान में मिलकर काम करें भारत और चीन लेकिन पाकिस्तान का क्या करेंगे?

चीन और भारत का अफगानिस्तान में साथ मिलकर काम करने का फैसला बिल्कुल व्यावहारिक है और इसे समझा जा सकता है

Updated On: May 14, 2018 01:45 PM IST

Vinay Kaura

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अच्छा है! अफगानिस्तान में मिलकर काम करें भारत और चीन लेकिन पाकिस्तान का क्या करेंगे?

अफगानिस्तान, भारत और चीन के बीच सहयोग की नई संभावनाओं के मंच के रूप में उभरता दिख रहा है. हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वुहान में हुई अनौपचारिक बैठक में सहमति बनी कि दोनों देश अफगानिस्तान में आर्थिक परियोजनाओं पर काम करेंगे. रणनीतिक लिहाज से इस सहमति के गहरे मायने हैं. भारत और चीन के बीच इस सहमति से विश्वास बहाली में मदद मिलेगी. साथ ही युद्ध-जर्जर अफगानिस्तान के विकास और वहां अमन कायम करने में भी यह कदम सहायक साबित होगा.

यह बात बिल्कुल जाहिर है कि भारत ने अफगानिस्तान में क्षमता बढ़ाने की कई परियोजनाओं में भारी निवेश किया है. अफगानिस्तान की सरकार भी यह मानकर चल रही है कि वहां राजकाज की संस्थाओं की मजबूती के लिए भारत की भागीदारी एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है. राष्ट्रपति अशरफ गनी की अगुवाई में चल रही अफगानिस्तान की शासन-व्यवस्था को मोदी सरकार ने सियासी और आर्थिक मोर्चे पर अहम मदद मुहैया कराई है.

भारत सरकार का मानना है कि अफगानिस्तान की सरकार और तालिबान के बीच संघर्ष खत्म करने के लिए किसी भी किस्म की बातचीत अफगानी नेतृत्व और उसके मातहतों में ही होनी चाहिए, इसमें किसी बाहरी शक्ति का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए लेकिन पाकिस्तान का रक्षा प्रतिष्ठान बाज नहीं आ रहा. वह आतंकवादी जमातों को पनाह दे रहा है और काबुल में अपनी कठपुतली सरकार कायम करने की खतरनाक नीति पर चल रहा है.

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पाकिस्तान की हुकूमत में इस बात की बेचैनी लगी है कि भारत काबुल में  सरकार से साठगांठ कर पाकिस्तान सेना के मंसूबों पर पानी फेर सकता है और अपनी इसी बेचैनी में पाकिस्तानी हुकूमत अफगानिस्तान में भारत की बढ़ती भागीदारी को टेढ़ी नजरों से देख रही है. पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान दोनों पर आरोप लगाता है कि ये मुल्क पाकिस्तान की सरजमीं पर पश्तून और बलोच अलगाववादियों के आंदोलन को बढ़ावा देने में लगे हैं.

फोटो रॉयटर से

फोटो रॉयटर से

यहां हमें याद रखना होगा कि पाकिस्तानी हुकूमत ने अफगानी तालिबान की लंबे वक्त से पुरजोर हिमायत की है. पश्तून आबादी के बीच मौजूद कट्टरपंथी तत्वों से रिश्ता कायम करने की उसकी पुरानी रवायत रही है. पाकिस्तान मानकर चलता है कि अफगानिस्तान उसके लिए बहुत अहम है क्योंकि अगर पूरब की तरफ भारत के साथ संघर्ष की स्थिति बनती है तो पश्चिम में अफगानिस्तानी इलाकों के इस्तेमाल से उसे रणनीतिक बढ़त हासिल होगी.

साल 2001 में तालिबानी सत्ता का पतन हुआ और इसके बाद से ही अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी को लेकर पाकिस्तान परेशानी में है. हालांकि तथ्य यही है कि भारत परंपरागत रूप से अफगानिस्तान का मुख्य क्षेत्रीय सहयोगी देश रहा है. अफगानिस्तान, भारत के विस्तृत पड़ोस का हमेशा हिस्सा रहा है और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा के तकाजे से अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति बहुत अहम है.

काबुल की सरकार के साथ दोस्ती कायम करने के पीछे भारत का मुख्य मकसद अफगानिस्तान को जेहादी जमातों का दूसरा पनाहगाह बनने से रोकना है. अफगानिस्तान भले भारत का नजदीकी पड़ोसी मुल्क नहीं हो लेकिन अफगानिस्तान में जारी आखिरी दौर की रणनीतिक रस्साकशी में भारत की भागीदारी बहुत जरूरी है.

भारत ने अफगानिस्तान में अपनी सेना न भेजकर बुद्धिमानी का परिचय दिया है क्योंकि अफगानी इलाके बहुत दुर्गम माने जाते हैं. दूसरी बात ये कि अगर भारत वहां अपनी फौज भेजता है तो पाकिस्तान इसकी मुखालफत में अपनी तरफ से जरूर बड़ा कदम उठाएगा. इसलिए भारत ने फौजी दखलंदाजी की राह न अपनाते हुए कूटनीति का रास्ता चुना और यह रास्ता भारत के मकसद को साधने के लिहाज से कारगर साबित हो रहा है. पर पाकिस्तान को भारत की अफगानिस्तान में किसी भी किस्म की मौजूदगी जरा भी बर्दाश्त नहीं, सो पाकिस्तान अड़ा हुआ है कि भारत की जो थोड़ी सी भी मौजूदगी है, वह किसी तरह कम हो.

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ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जिनमें भारतीय मजदूरों को अफगानिस्तान में निशाना बनाया गया है, उन्हें अगवा किया गया है. इसका मकसद भारत को डराना है. भारतीय दूतावास के सामने साल 2008 में एक कार बम-विस्फोट हुआ. इसमें भारत के डिफेंस अटैची समेत 50 लोग मारे गए. इस घटना को आईएसआई से जुड़े हक्कानी नेटवर्क ने अंजाम दिया था. मुल्क में बढ़ते आतंकवादी हमलों के पीछे इसी नेटवर्क का हाथ बताया जाता है.

अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी कम करने के दबावों के आगे पांव पीछे खींचने की जगह भारत ने अपनी पेशकदमी जारी रखी है. भारत और अफगानिस्तान आपस में संपर्क बढ़ाने के लिए एक एयर कॉरिडोर की शुरुआत करने पर राजी हुए हैं. इससे पता चलता है कि दोनों मुल्कों के रिश्तों में और ज्यादा मजबूती आ रही है. बीते छह मई को अफगानिस्तान में बिजली कंपनी के लिए काम कर रहे छह भारतीय मजदूरों को अगवा कर लिया गया. इससे एक बार फिर जाहिर हुआ है कि पाकिस्तान अपनी अंदरुनी पैठ के जरिए भारत पर दबाव बनाने की नीति पर कायम है और चाहता है कि भारत अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी कम करे.

फोटो रॉयटर से

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कुछ अपुष्ट खबरें ऐसी भी आई हैं कि अफगानी तालिबान की स्थानीय इकाई पर आईएसआई दबाव डाल रही है कि वो अपहरण की घटनाएं जारी रखे ताकि भारत की बिजली कंपनी को उत्तरी अफगानिस्तान से कदम बाहर हटाने पर मजबूर किया जा सके.

अफगानिस्तान से चीन के अपने आर्थिक और सुरक्षा संबंधी हित जुड़े हैं. चीन नहीं चाहता कि किसी भी सूरत में अफगानिस्तान उईगुर मुस्लिम उग्रवादियों के लिए पनाहगाह साबित हो. उईगुर उग्रवादी चीन के शिंजियांग प्रांत में बहुत सक्रिय हैं. अफगानिस्तान में अगर अस्थिरता की हालत कायम होती है तो इसका असर कश्मीर के हालात पर भी होगा और शिंजियांग में भी.

बीजिंग को एक चिंता यह भी है कि अफगानिस्तान में अस्थिरता का माहौल कायम होने पर पाकिस्तान और मध्य एशिया के देशों का माहौल बिगड़ेगा और ऐसे में शी जिनपिंग के महत्वाकांक्षी परियोजना ‘बेल्ट एंड रोड’ के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है. चीन अपनी इस परियोजना के सहारे चीन-केंद्रित विश्व-व्यवस्था खड़ी करने और शक्ति-संतुलन के नए समीकरण बनाने के मंसूबे बांधे हुए है.

चीन चूंकि अफगानिस्तान के एकदम पड़ोस में नहीं है सो वह अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी कायम करने के लिए चीन-अफगानिस्तान-पाकिस्तान की त्रिस्तरीय व्यवस्था का सहारा लेता है या फिर उसे काबुल से अपने रिश्ते बनाए रखने में चार मुल्कों (चीन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और अमेरिका) के एक सहयोगी मंच की जरूरत होती है. अब यह एकदम ही अलग बात है कि चीन की ऐसी कोशिशें कामयाब ना हो पाई हैं. ऐसे में चीन चाहेगा कि वह अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए भारत का सहारा ले.

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बहरहाल, अफगानिस्तान में भारत और चीन की संयुक्त परियोजनाएं चलती हैं तो इससे पाकिस्तान को भी नाराजगी नहीं होगी क्योंकि पाकिस्तान को चीन का सदाबहार दोस्त मुल्क माना जाता है. भारत ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के सबसे अहम हिस्से यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को लेकर पुरजोर विरोध जताया. यह परियोजना उस भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरती है जिसपर फिलहाल पाकिस्तान का कब्जा है. सो, भारत ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के बारे में अपनी संप्रभुता का सवाल उठाते हुए ऐतराज जताया था.

चूंकि भारत ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को लेकर अपने विरोधी रुख में कोई बदलाव नहीं किया है सो चीन के लिए बहुत जरूरी हो चला है कि वह अफगानिस्तान को लेकर भारत के साथ सरोकार कायम रखने के नए रास्ते तलाशे.

अफगानिस्तान में चीन के साथ संयुक्त आर्थिक परियोजना चलाने को लेकर भारत रजामंद है तो उसके पीछे भी कुछ कारण हैं. भारत के लिए ऐसा करना आर्थिक और रणनीतिक एतबार से फायदेमंद है. इससे एक तो अफगानिस्तान में मौजूद भारतीय लोगों की हिफाजत में मदद मिलेगी. दूसरे, पाकिस्तानी फौज की शह पर जो आतंकवादी जमातें भारत को अपने हमले का निशाना बनाती हैं, उनसे एक हद तक भारत की सुरक्षा हो सकेगी.

एक और बड़ी वजह है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई जिद. डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुए एटमी समझौते से अमेरिका को बाहर रखने और ईरान पर नए सिरे से आर्थिक प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है. इस फैसले के दूरगामी असर होंगे और यह असर ईरान-अमेरिका के संबंधों के दायरे के बाहर भी महसूस किया जाएगा. इस बात की वाजिब आशंकाएं हैं कि मध्य-पूर्व में सैन्य तनाव बढ़ेगा और ईरान के असर को सीमित करने के लिए अमेरिका और सऊदी अरब अपनी कवायद तेज करेंगे.

इसी तरह ईरान भी सऊदी अरब और खाड़ी के उसके सहयोगी मुल्कों पर दबाव डालने के लिए यमन के हूती विद्रोहियों को हथियारों की आपूर्ति बढ़ा सकता है जिससे सऊदी अरब खतरे की जद में आएगा. ईरान के तेवर कड़े हैं. ईरानी राष्ट्रपति हसन रुहानी ने चेतावनी दी है कि अमेरिका अगर एटमी करार से बाहर होता है तो उसे इसका बड़ा भारी पछतावा होगा.

फोटो रॉयटर से

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एक अहम बात यह भी है कि अगर ईरान अफगानी तालिबान को मदद देने के लिए उठ खड़ा होता है तो अमेरिका की स्थिति कमजोर होगी. अफगानिस्तान के हजारा और शिया लोगों से ईरान के ऐतिहासिक रिश्ते हैं और ईरान इन रिश्तों की कीमत पर अफगानिस्तान में हालात अस्थिर कर सकता है. अगर ईरान अस्थिरता कायम करने की दिशा में कदम बढ़ाता है और उसके इस कदम को रूस और पाकिस्तान मदद देते हैं तो अफगानिस्तान की स्थिति और ज्यादा जटिल हो जाएगी.

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अगर अफगानिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष का अखाड़ा बनता है तो सियासी बातचीत के जरिए हुए समझौतों को लागू करना पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल साबित होगा. ईरान के साथ एटमी समझौते से अमेरिका के निकलने के बाद क्षेत्रीय स्तर पर बढ़ते तनाव को रोक पाने में भारत असमर्थ है और ऐसे हालात में उसकी पहली जरूरत है अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी को बरकरार रखने के हिफाजती इंतजाम करना. अफगानिस्तान का सियासी और रणनीतिक माहौल तेजी से बदल रहा है और ऐसे में अफगानी लोगों के दिलो-दिमाग को जीतना या फिर अशरफ गनी की सरकार से दोस्ताना कायम करना भर पर्याप्त नहीं माना जा सकता.

हालांकि भारत और चीन दोनों ही इस जरूरत को महसूस करते हैं कि अफगानिस्तान में हालात के मद्देनजर दोनों मुल्कों को मसले पर सहमति बनानी होगी लेकिन क्षेत्रीय भूराजनीतिक स्थितियां बहुत जटिल हैं और इन जटिलताओं के कारण सहमति कायम करने की दिशा में कदम बढ़ा पाना मुश्किल साबित हो रहा है.

अफगानिस्तान के मसले पर चीन और भारत के बीच पहले भी बातचीत हो चुकी है लेकिन इस बातचीत से कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया है. अफगानिस्तान के मसले पर चीन भारत के प्रति सहयोगी रवैया अपनाएगा-ऐसी किसी बात पर आलोचक निश्चित ही आशंका जताएंगे लेकिन व्यावहारिकता का तकाजा यही है कि इस संभावना को सच बनाने की कोशिश की जाए.

चूंकि अफगानिस्तान में सुरक्षा संबंधी स्थितियां और भी ज्यादा खराब हैं, सो चीन और भारत का अफगानिस्तान में साथ मिलकर काम करने का फैसला बिल्कुल व्यावहारिक है और इसे समझा जा सकता है.

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