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जो ब्रिटेन के लिए 'जहर'... वो भारत के लिए दवा कैसे

जिन प्रतिबंधित सीरिंज पंपों को ब्रिटेन के अस्पताल से हटाया गया था, उन्हें वहां से हटाने के बाद भारत, नेपाल और साउथ अफ्रीका जैसे देशों में दान में दिया गया

Updated On: Jul 13, 2018 01:40 PM IST

Alpyu Singh

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जो ब्रिटेन के लिए 'जहर'... वो भारत के लिए दवा कैसे
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बात बीते मार्च की है,जब ब्रिटेन की एक घटना ने देश-विदेश में कूटनीतिक स्तर पर एक नई बहस छेड़ दी. 4 मार्च को ब्रिटेन के सेलिस्बरी में दो लोगों के बेहोश हालत में मिलने की घटना ने एकाएक विश्व बिरादरी की एकतरह से कूटनीतिक लय ही बिगाड़ दी. ये दो लोग थे रूस के पूर्व जासूस स्रिकपल और उनकी बेटी लूलिया. ये दोनों ब्रिटेन के अपने घर के नजदीक एक रेस्टोरेंट के बाहर बेहोश मिले थे.

इस घटना ने ब्रिटेन और रूस के बीच जो कूटनीतिक तनातनी पैदा की, उसने दुनिया को कोल्ड वॉर की यादें ताजा करा दीं. एक तरफ रूस और दूसरी ओर पश्चिमी देश. 100 से ज्यादा राजनयिकों को अपने अपने-अपने देशों में वापस भेजा गया. आरोप लगाया कि रूस ने खतरनाक नर्व एजेंट का इस्तेमाल किया था, जो ब्रिटेन के लिए कतई बर्दाश्त नहीं था.

ब्रिटेन ने सेलिस्बेरी की घटना को अपनी धरती पर लोगों की जान की हिफाजत से जोड़ा. दरअसल इस प्रतिक्रिया के जरिए ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दिखाना चाहता है कि वो अपनी धरती पर हुई मौतों को बहुत गंभीरता से लेता है लेकिन सवाल ये है कि जब बात दूसरे देशों में लोगों की जान की आती है, तो तब भी क्या ब्रिटेन या अमेरिका जैसे देश उतने ही संवेदनशील हैं, जितना वे अपने मामलों में दिखाई पड़ते हैं. शायद नहीं.

क्या ब्रिटेन का मानवाधिक सिर्फ अपने लिए है?

ब्रिटेन के एक बड़े अखबार संडे टाइम्स में जो खबर सामने आई है, उसने इंसानों की कीमत पर इन देशों पर चढ़ा मुखौटा उतार फेंका है.

फोटो रॉयटर्स से

फोटो रॉयटर्स से

पिछले कई दिनों से ब्रिटिश अखबारों में एनएचएस गोसपोर्ट वॉर मेमोरियल अस्पताल के एक स्कैंडल की गूंज 10 डाउनिंग स्ट्रीट तक सुनाई पड़ रही है. इस अस्पताल में 1988-2000 के बीच हुई जानलेवा लापरवाही से 650 मौतों की जांच के खुलासे पर हंगामा बरपा है. अस्पताल के स्टाफ पर मरीजों को बिना जरूरत के ही दर्दनिवारक दवाओं की खतरनाक डोज देने का आरोप है.

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आरोपों के घेरे में सबसे बड़ा नाम डॉ. जेन बर्टन का है जिन्हें मेडिकल लापरवाही का दोषी माना गया है. वहीं विवाद के एक सिरे पर वो ग्रीसबाई सीरिंज पंप भी हैं, जिनका इस्तेमाल अस्पताल में 30 साल तक हुआ और खतरनाक पाए जाने पर उन्हें 2010 के बाद चरणबद्ध तरीके से हटाया गया लेकिन बात सिर्फ ब्रिटेन तक ही सीमित नहीं. विवादित सीरिंज पंपों की एक कड़ी भारत से भी जुड़ती है और आरोपों की सुई अब नेपाल और साउथ अफ्रीका तक घूम गई है.

ब्रिटेन ने पूरी दुनिया को दिए 'मौत के सीरिंज'

दरअसल 'संडे टाइम्स' ने ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस ट्रस्ट के एक पुराने नोटिस का हवाला देकर खुलासा किया है कि जिन प्रतिबंधित सीरिंज पंपों को ब्रिटेन के अस्पताल से हटाया गया था, उन्हें वहां से हटाने के बाद भारत, नेपाल और साउथ अफ्रीका जैसे देशों में दान में दिया गया. साल 2011 में Isle of Wight NHS Trust के एक नोटिस में साफ-साफ कहा गया था कि 'ग्रीसबाई सीरिंज पंपों को यहां के अस्पतालों से तो हटाया जाएगा लेकिन इन्हें तीसरी दुनिया के देशों में दान में दिया जाएगा'.

अखबार ने एक व्हिसलब्लोअर के हवाले से कहा है कि इस मामलें में जांच कर रही एजेंसी ने जान बूझ कर सीरिंज पंपों के खतरे को नजरअंदाज़ किया ताकि इसे देश का सबसे बड़ा मेडिकल घोटाला होने से रोका जा सके.

ब्रिटेन के रोटरी क्लब प्रोग्राम ने माना है कि साल 2011 में साउथ अफ्रीका में 100 सीरिंज पंप भेजे गए थे लेकिन भारत और नेपाल में कब-कब और कहां इन सीरिंजों को दान दिया गया, इसके बारे में अभी तक कहीं से कोई जानकारी सामने नहीं आई है.

इसे दान कहें या मारने की साजिश?

इसके अलावा इन पंपों की डोनेशन महज इतनी ही नहीं थी, बल्कि निजी तौर पर इन्हें दान किया गया. समरसेट में रहने वाली एक नर्स ने 2014 में यह बात अपने ब्लॉग में कबूली कि उसे ऐसे कई सीरिंज पंप भारत ले जाने की इजाजत अस्पताल प्रशासन ने दे दी थी.

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गौरतलब है कि वो नर्स बतौर मेडिकल वॉलंटियर भारत आई थी. वहीं नेपाल में भी इसी तरह के एक कैंप में शामिल होने आए एक डॉक्टर को भी ये सीरिंज पंप ले जाने दिया गया.

ग्रेसबाई के एमएस 16 और एमएस 26 सीरिंज के बारे में स्टडी से पता चला कि ये खून में दवाइयों की खतरनाक डोज़ जारी करने के लिए जिम्मेदार होते हैं, जिससे जान भी जा सकती है. खबर सामने आने पर ब्रिटेन की सरकार इसकी जांच कराने पर विचार कर रही है कि क्या 2010 में इनके खतरे सामने आने के बाद अस्पताल ने इन्हें हटाने में देरी की.

एनएचएस के नोटिस और नर्स के कबूलनामे से एक बात साफ है कि ये खतरनाक सीरिंज दान की शक्ल में भारतीय अस्पतालों में इस्तेमाल हुए होंगे या हो सकता है कि अभी भी हो रहे हों. अब सवाल ये है कि जब ब्रिटेन की सरकारी हेल्थ सर्विस ने अपने मरीज़ों के लिए इन मेडिकल उपकरणों को खतरनाक पाया तो वो तीसरी दुनिया के देशों के लिए ठीक कैसे हो सकते हैं ? क्या इस प्रकरण ने तीसरी दुनिया को डंपिंग ग्राउंड बनाने के विकसित देशों के एजेंडे की कलई नहीं खोल दी है?

मेडिकल डंपिंग ग्राउंड बना भारत

बात महज डोनेशन की ही नहीं है. मेडिकल डंपिंग के मामले में भारत बहुत खतरनाक मोड़ पर खड़ा है. एक अनुमान के मुताबिक भारत हेल्थकेयर की अपनी जरूरतों का 75 फीसदी सामान आयात करता है.

फोटो रॉयटर्स से

फोटो रॉयटर्स से

मेडिकल सेक्टर से संबंधित कानूनी मामलों के जानकार और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील करण एस ठुकराल बताते हैं, 'मेडिकल डंपिंग रोकने के लिए हमारे पास कोई पुख्ता कानून नहीं है. इससे जुड़ा कानून 'द ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 'मेडिकल डंपिंग की चुनौतियों से लड़ने में कामयाब नहीं है. वहीं 2016 में इस बिल के संशोधित ड्राफ्ट को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के पास और सुझाव जोड़ने के लिए भेजा गया जो अभी तक बिल ठंडे बस्ते में ही है. दूसरी ओर मेडिकल डोनेशन को लेकर भारत डब्ल्यूएचओ की ओर से तय की गई साधारण गाइडलाइंस के तहत ही काम कर रहा है.'

The Lancet की एक रिपोर्ट की मानें तो कई विकासशील देशों के पास जो मेडिकल उपकरण उपलब्ध हैं उनमें से 80 प्रतिशत दान में मिले हैं. 2011 ये अध्ययन साफ करता है इनमें से करीब 40 फीसदी मशीनें और उपकरण ठीक से काम नहीं करते लेकिन विकसित देशों में ये आंकड़ा महज 1 प्रतिशत का है. वहीं 2017 में सामने आई डब्ल्यूएचओ की एक और रिपोर्ट ये बताती है कि विकासशील देशों में दस में एक दवा या तो खराब है या नकली है.

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यही वजह है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले एक्टिविस्ट मानते हैं कि दूसरे विकासशील देशों की तरह भारत ना सिर्फ मेडिकल डंपिंग ग्राउंड है, बल्कि कई तरह के वायरस और बीमारियों का ब्रिडिंग ग्राउंड भी है.

लचर कानून और अभिशप्त जनता

जन स्वास्थ्य वैज्ञानिक और कार्यकर्ता ए के अरुण कहते हैं कि 'मेडिकल डोनेशन को लेकर हमारे पास ना तो कोई स्पष्ट नीति है ना दिशा. आपदा के वक्त मदद के नाम पर दूषित मेडिकल उपकरण और दवाएं यहां भेज दी जाती हैं, जिनकी गुणवत्ता जांचने का कोई सिस्टम हमारे पास है ही नहीं. हमसे बेहतर ड्रग पॉलिसी बांग्लादेश के पास है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि स्वास्थ्य हमारे देश में कभी भी राजनीतिक मुद्दा बना ही नहीं. कानूनों में सख्ती के साथ सोशल ऑडिट से ही जानलेवा डंपिंग की इस समस्या से निपटा जा सकता है. साल 2000 तक हेल्थ फॉर ऑल के वादे का 18 साल बाद भी क्या हुआ कोई नहीं जानता.'

फोटो रॉयटर्स से

फोटो रॉयटर्स से

गोसपोर्ट वॉर मेमोरियल अस्पताल में लापरवाही से मौत के मामले ने जैसे बोतल से जिन्न को बाहर ला दिया है. डोनेशन के इस काले सच में अगर विकसित देशों का डबल स्टैंडर्ड दिखता है तो भारत जैसे देश की लचर व्यवस्था भी. अगर एनएचएस के नोटिस की खबर ब्रिटेन की मीडिया में सामने नहीं आती तो शायद हमें ये मालूम भी नहीं पड़ता कि मेडिकल मदद के नाम पर हम ऐसे खतरनाक मेडिकल उपकरणों का शिकार होते आ रहे हैं, क्योंकि हमारे लिए ये पता लगाना भी मुश्किल है कि 2011 के बाद देश के किन-किन हिस्सों में किन लोगों पर ऐसे सीरिंज पंपों का इस्तेमाल हुआ है.

अब तक नहीं जागे तो कब जागेंगे?

सोचने वाली बात ये है कि जिन सीरिंज पंपों को न्यूज़ीलैंड और आस्ट्रेलिया में नब्बे के दशक में ही बैन कर दिया गया वो ब्रिटेन में 2015 तक चलते रहे और शायद उन पर रोक भी नहीं लगती अगर गिलियन मैकेंजे नाम की महिला साल 1998 में पहली बार सामने आकर विवादित अस्पताल पर ये आरोप ना लगाती कि उनकी 91 साल की मां की मौत दर्दनाशक दवाओं के गलत इस्तेमाल की वजह से हुई. जिसके बाद 1988-2000 तक के कई ऐसे परिवारों ने अस्पताल के खिलाफ़ पुलिस में मामला दर्ज कराया.

विडंबना ये है कि अगर नेपाल, साउथ अफ्रीका और भारत में ऐसे सीरिंज पंपों का इस्तेमाल हुआ है, तो जाहिर सी बात है कि उनके दुष्प्रभावों की आशंका को भी नजरअंदाज़ नहीं कर सकते. और अगर उनके दुष्प्रभाव हुए हैं तो क्या मामले की गंभीरता से हम भी वाकिफ हो पाएंगे, या फिर कभी उन लोगों के नाम जान पाएंगे जो इसका शिकार हुए. शायद कभी नहीं.

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