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भारत को अब पाकिस्तान की जगह चीन के लिए रणनीति बनानी चाहिए

हमें अपने फलते-फूलते लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए दूर तक देखने की प्रवत्ति विकसित करनी होगी

Milind Deora Milind Deora Updated On: Sep 30, 2017 02:24 PM IST

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भारत को अब पाकिस्तान की जगह चीन के लिए रणनीति बनानी चाहिए

राहुल गांधी के साथ अमेरिका की अपनी हाल की यात्रा के दौरान कई नेता, पत्रकार, विशेषज्ञ, व्यापारी और राजनीतिज्ञों से मेरी मुलाकात हुई. इस मुलाकात में कुछ गहरी सूझ भरी बातें, नयी दिशाओं का भान कराती व्याख्याएं और कुछ चुभते हुए सवालों से हमारा सामना हुआ. गहरी सूझ भरी दो बातों ने खास तौर से मेरा ध्यान खींचा.

एक जाने-माने अखबार के संपादक ने सवाल उठाया कि आखिर रुस को लेकर अमेरिका में इस कदर हौव्वा क्यों उठ खड़ा हुआ है? हिलेरी क्लिंटन ने आरोप लगाया था कि रुस की साजिश के कारण चुनावों में उनकी हार हुई, तब से रुस का हौव्वा अमेरिका पर कुछ ज्यादा ही हावी है.

संपादक ने अमेरिका की इस हालत की तुलना भारत से की जहां हर वक्त पाकिस्तानी साजिश का राग अलापा जाता है. संपादक ने ध्यान दिलाया कि रुसी हौव्वे की तासीर कुछ ज्यादा ही चढ़ी रहती है क्योंकि रुस और ठीक इसी तर्ज पर दक्षिण कोरिया भी अमेरिका में चर्चा के लिहाज से खूब चटखारेदार विषय हैं, बहुत कुछ वैसे ही जैसे कि भारत में होने वाली बातचीत में तड़का ‘पाकिस्तान’ के जिक्र से लगता है.

लेकिन इस चक्कर में भारत और अमेरिका अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहे हैं. उनका ध्यान वहां जा ही नहीं रहा जहां जाना चाहिए—भारत और अमेरिका दोनों के लिए चीन पर ध्यान देना कहीं ज्यादा जरुरी है.

चीन के कारण एक आर्थिक दुविधा खड़ी हो गई है. उसने खास मेहनत-मजदूरी की मांग करने वाली नौकरियों के लिए अपने यहां ठोस जमीन कायम की है और नौकरियां अपने यहां खींच रहा है. यह बात सियासी अनिश्चितता पैदा कर रही है क्योंकि अमेरिका और भारत मे नौकरियों की कमी है. चीन में मजदूर-संगठन नहीं हैं सो ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में जोर-जबर्दस्ती से कारखाने खूब तेजी से खड़े किए जाते हैं. अमेरिका और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था इस मामले में चीन से मुकाबला नहीं कर सकती.

कहने का मतलब यह नहीं कि चीन के प्रति दुश्मनी का रवैया अपनाया जाए लेकिन नौकरियों की कमी के कारण जो आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियां पैदा हुई हैं उनका रिश्ता शायद डोनाल्ड ट्रंप के उभार से है.

चुनौतियां रणनीतिक भी हैं. उत्तर कोरिया और पाकिस्तान दोनों की चीन से गहरी नजदीकी है और चीन की जाहिर मदद के बगैर ये दोनों देश दुनिया की राजनीति में खास रणनीतिक अहमियत भी नहीं रख पाते. मिसाल के लिए चीन ने चाइना-पाकिस्तान इकॉनॉमिक कॉरीडोर के जरिए पाकिस्तान में अरबों डॉलर का निवेश कर रखा है. यह सड़क, परिवहन नेटवर्क और बिजली उत्पादन की इकाइयां खड़ी करके बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने की परियोजना है.

पाकिस्तान का विकास हो और विकास के जरिए इस मुल्क में स्थिरता आए तो यह भारत के लिए रणनीतिक रुप से फायदेमंद है लेकिन अमेरिका में जिस बात की तरफ लोगों ने मेरा ध्यान खींचा वह ये थी कि भारत को अब पाकिस्तान का राग अलापना बंद कर देना चाहिए. भारत के लिए अब कहीं ज्यादा जरुरी है कि वह चीन को लेकर एक टिकाऊ नीति बनाए. भारत के लिए डोकलाम जैसा अतिक्रमण पाकिस्तान के साथ चलने वाले सीमा-विवाद की तुलना में कहीं ज्यादा चिन्ताजनक है.

ऐसे में रणनीतिक चुनौती यह बनती है कि क्या भारत और अमेरिका ओबीओआर(वन बेल्ट वन रोड) के बरक्स दुनिया का कोई वैकल्पिक विजन या कह लें कथानक तैयार कर सकते हैं, क्योंकि ओबीओआर जाहिर तौर पर दुनिया के मंच पर चीन की दमदार आर्थिक और राजनीतिक ताकत का प्रतीक है.

दूसरा विश्लेषण रणनीतिक मामलों के एक विशेषज्ञ का था. इस विशेषज्ञ का कहना था कि मध्य-पूर्व से शुरु होकर म्यांमार तक फैली चंद्राकार पट्टी में भारत एकमात्र देश है जहां 20 करोड़ की तादाद में नरममिजाज मुस्लिम आबादी रहती है और इस मुस्लिम आबादी के भीतर अपनी राष्ट्रीयता की पहचान उसकी मजहबी पहचान से कहीं ज्यादा गहरी है साथ ही यह आबादी भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के कारण खुशहाली की राह पर है.

भारत में ध्रुवीकरण पर दुनिया की है नजर

इस विशेषज्ञ को चिन्ता थी कि भारत में ध्रुवीकरण की राजनीति के कारण धार्मिक अल्पसंख्यक अलग-थलग पड़ सकते हैं, वे हाशिए पर छिटक सकते हैं जिसकी वजह से उनमें राष्ट्रीयता से जुड़ाव की जगह धार्मिक भावनाएं प्रबल हो सकती हैं.

अगर ऐसा होता है तो धार्मिक-अल्पसंख्यकों की नरममिजाजी खत्म हो जाएगी. उस विशेषज्ञ का तर्क था कि भारत की घरेलू राजनीति के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा की समस्याएं पैदा हो रही हैं जिसकी एक मिसाल जम्मू-कश्मीर है.

मैंने अपनी तरफ से बिल्कुल साफ-साफ कहा कि ऐसा होना मुमकिन नहीं क्योंकि भारत मे धार्मिक अल्पसंख्यकों ने हमेशा हिन्दुओं के साथ मिल-जुलकर और शांति के साथ जिंदगी बितायी है, चाहे राजनीति का मिजाज कुछ भी रहा हो. मैं नहीं मानता कि कट्टर या फिर अतिवादी भावनाओं वाले मुल्कों की भीड़ में एक उदार राष्ट्र के रूप में हमारा होना किसी दम खत्म भी हो सकता है लेकिन भारत की राजनीति को लेकर दुनिया के मुल्कों में किस नजरिए से सोचा जा रहा है, यह जानना मेरे लिए बहुत दिलचस्प था.

इन गहरी सूझ भरी बातों से मन में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र(भारत) और सबसे पुराने लोकतंत्र(अमेरिका) में चल रही बहसों को लेकर कुछ विचार जागे. ऐसा लगता है कि भारत और अमेरिका में चल रही घरेलू राजनीति हमें बड़ी तस्वीर को देखने से रोक रही है, हम रणनीतिक महत्व के मामलों को लेकर ज्यादा दूर तक  देख नहीं पा रहे.

कहना ना होगा कि मुझे अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गर्व है लेकिन मैं अचरज के साथ सोचता हूं कि क्या फलते-फूलते लोकतंत्र में दूर तक ना देख पाने की प्रवृत्ति से बचा नहीं जा सकता और क्या जटिल बहसों को सीधा-सरल बनाने के चक्कर में हम लोकतंत्र की ही कीमत खुशी-खुशी नहीं चुका रहे?

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