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तीसरी बार दूल्हा बने इमरान: शादी निजी मामला लेकिन दुल्हन की मुंह दिखाई सियासी है

इमरान खान की घूंघट वाली दुल्हन को लेकर सोशल मीडिया पर दिलचस्प कमेंट्स की झड़ी लगी हुई है. इस तरह तस्वीर जारी होने के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं

Updated On: Feb 20, 2018 10:39 AM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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तीसरी बार दूल्हा बने इमरान: शादी निजी मामला लेकिन दुल्हन की मुंह दिखाई सियासी है

यह एक दिलचस्प संयोग है कि गुजरे जमाने में महान क्रिकेटर और पाकिस्तान के ताकतवर राजनेता इमरान की जिंदगी में ज्यादातर अच्छी बातें देर से हुई हैं.  राजनीति में वे लंबे समय से हैं, लेकिन असली ताकत करीब 25 साल के संघर्ष के बाद मिली. उनके नेतृत्व में पाकिस्तान ने अपना पहला और आखिरी क्रिकेट वर्ल्ड कप उस समय जीता था, जब इमरान की उम्र 40 पार कर चुकी थी. इमरान की पहली शादी 43 साल की उम्र में हुई थी. अब उन्होंने 65 साल की उम्र में तीसरी बार फिर से सिर पर शादी का सेहरा बांधा है.

इमरान की तीसरी बीवी का नाम बुशरा मनका है. वे इमरान से करीब 20 साल छोटी हैं. बुशरा की शादी कस्टम के एक अधिकारी से हुई थी और इस शादी से उनके पांच बच्चे भी हैं. बुशरा का एक नाम पिंकी पीर भी है लेकिन अब दुनिया उन्हें बुशरा बीवी के नाम से जानती है. बुशरा की खासियित एक आध्यात्मिक गुरू के रूप में उनका मशहूर होना है. पाकिस्तानी मीडिया की मानें तो इमरान अक्सर बुशरा के पास रुहानी मशविरे के लिए जाते थे. इसी दौरान दोनों में जान-पहचान बढ़ी. इस बीच बुशरा ने अपने पहले शौहर से तलाक ले लिया और इमरान से शादी कर ली.

`प्लेबॉय’ की घूंघट वाली दुल्हन

शादी एक निजी मसला है. लेकिन लेकिन शादी के बाद इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने जो तस्वीर जारी की है, उसके बाद यह निजी मसला एक सार्वजनिक बहस में बदल गया है. इमरान की नई पत्नी बुशरा एक लंबे घूंघट में नजर आ रही हैं. क्रिकेट की दुनिया में इमरान खान की इमेज एक प्लेबॉय की रही है. एक अमीर परिवार में पैदा हुए इमरान की परवरिश से लेकर पढ़ाई-लिखाई तक सबकुछ प्रोग्रेसिव माहौल में हुई थी. उन्होने अपनी तालीम इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से हासिल की. इमरान की पहली पत्नी  जमाइमा गोल्डस्मिथ इंग्लैंड के एक अरबपति की बेटी हैं. इमरान की दूसरी शादी पाकिस्तान की मशहूर टीवी एंकर रेहाम खान से हुई थी. इन दोनों शादियों के दौरान जमाइमा या रेहाम ने पर्दा नहीं किया था फिर तीसरी बीवी को इस तरह की वेशभूषा अख्तियार करने की जरूरत क्यों आन पड़ी?

इस सवाल को लेकर सोशल मीडिया पर कमेंट्स की झड़ी लगी हुई है. किसी ने इस तस्वीर को पाकिस्तान और सूबा ए सरहद की लड़कियों का अपमान बताया है जो पुरुषवादी सत्ता को चुनौती देती हुई जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है. तो किसी ने अपने ट्विटर कमेंट में `एन इडियट मैरिंग घोस्ट’ लिखा है. यानी ऐसा लग रहा है कि कोई मूर्ख ढंके चेहरे वाली किसी भूतनी से शादी कर रहा है. कमेंट जरूरत से ज्यादा तीखा है. सच तो यह है कि इमरान खान मूर्ख नहीं हैं. दुनिया का कोई राजनेता मूर्ख नही होता. अगर हो तब भी वह वोटरों को कहीं ज्यादा मूर्ख मानता है.

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शादी के बाद अपने बयान में इमरान ने कहा `मैं परिवार वालों के साथ या अकेले में, जब भी उनसे मिला वे हमेशा पर्दे में ही थी.’ इमरान का दावा है कि उस पर्दानशीन की रुहानियत से प्रभावित होकर उन्होने उसका दामन थामा है. पाकिस्तानी मीडिया की खबरों पर यकीन करें तो यह कहानी खासी दिलचस्प है. बुशरा बीवी ने इमरान के बारे में जो भविष्यवाणियां की हैं वे पूरी तरह सही साबित हुई हैं. बुशरा का ये भी कहना है कि अगर इमरान तीसरी बार शादी करेंगे तो वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन सकते हैं. शादी की सबसे बड़ी वजह यही है.

पर्दे का बखान शादी का खुलासा राजनीतिक मजबूरी

इमरान की नई शादी की अटकलें जनवरी से चल रही हैं. पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने पहले इस तरह की खबरों को बकवास बताया था. माना जा रहा है कि हाल में हुए उप-चुनावों पर इन अटकलों का काफी बुरा असर रहा. विरोधी पार्टियों ने से मुद्दा बनाया और इसी वजह से इमरान की पार्टी को शिकस्त झेलनी पड़ी. इसके बाद से तहरीक-ए-इंसाफ के बाकी नेता इमरान पर लगातार दबाव बना रहे थे कि वे मुल्क को अपनी शादी के बारे में बताए. पाकिस्तान में नेशनल असेंबली के चुनाव भी ज्यादा दूर नही है. ऐसे में इमरान की शादी को लेकर सस्पेंस का कायम रहना पार्टी के हित में नहीं होता.

इमरान का बैकग्राउंड और लाइफस्टाइल भले ही इलीट रही हो लेकिन उनकी राजनीति कट्टरपंथी वोट बैंक पर टिकी है. तहरीक-ए-इंसाफ अफगानिस्तान से लगे सूबा-ए-सरहद में जमायत-ए-इस्लामी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार चला रही है. ये वही इलाका है, जहां से नोबल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई आती हैं. यह समझना मुश्किल नहीं है कि वहां का पूरा समाज किस तरह कट्टरपंथ में जकड़ा हुआ है. सूबा ए-सरहद में सत्ता हासिल करने के अलावा इमरान की पार्टी ने पिछले नेशनल इलेक्शन में भी बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था.उसे पाकिस्तान पीपल्स पार्टी से सिर्फ दो सीटें कम मिली थीं. जाहिर है, इमरान खान अपना कोर वोट बैंक नहीं खोना चाहेंगे. पर्दानशीन दुल्हन का फोटो सार्वजनिक करने के पीछे की असली मंशा यही है.

imran khan bushra

सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में राजनेताओं का यही हाल है. निजी जिंदगी में भले ही रहन-सहन पश्चिमी हो लेकिन वोटरों को प्रभावित करने के लिए नेता दकियानूसी से दकियानूसी तौर-तरीके अपनाने में पीछे नहीं रहते. धार्मिक चिन्हों और प्रतीकों के इस्तेमाल की होड़ लगी रहती है. गुजरात इलेक्शन कैंपेन के दौरान राहुल गांधी जिस तरह सिर पर बड़ा तिलक लगाए और अपने चुनावी सभाओं में मंच पर अगरबत्ती घुमाते नजर आए उससे यह बात और साफ हुई कि नेताओं की राय वोटरों के बारे में क्या है. बात अगर निजी आस्था या सिर्फ धार्मिक प्रतीक चिन्हों के इस्तेमाल तक रहती तब भी ठीक था. वोटरों को खुश करने के चक्कर में नेता सारी हदें पार करते नजर आते हैं. संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्यावत को लेकर उठा बवाल इस बात का एक बड़ा उदाहरण है, जब कुछ नेताओं ने सारी हदें पार करके सती जैसे गैर-कानूनी और अमानवीय मामले तक का महिमामंडन किया.

धर्म की राजनीति का निजी आस्था से कोई रिश्ता नहीं

अपनी रथ-यात्रा से भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट लाने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने एक इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि राममंदिर का आंदोलन धार्मिक ना होकर मूलत: राजनीतिक था. भारतीय उप-महाद्वीप की राजनीति से जुड़ा यह एक बहुत दिलचस्प तथ्य है कि सियासत में मजहब का सबसे कामयाब इस्तेमाल उन्ही लोगों ने किया है जो दरअसल नास्तिक थे.

पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना का निजी जीवन में धर्म से कोई लेना-देना नहीं था. उनके बारे में मशहूर था कि वे पोर्क यानी सूअर का मांस खाते थे. परंपरागत इस्लामिक मान्यताओं से उनका कोई लगाव नहीं था. टर्की जब खलीफा की पदवी खत्म की गई थी और बदले में भारत में खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ तो जिन्ना ने उसे गैर-जरूरी और राष्ट्रीय हित के खिलाफ बताया था. लेकिन राजनीतिक ताकत हासिल करने और दक्षिण एशिया की मुस्लिम आबादी को अपने साथ जोड़ने के लिए जिन्ना ने बाद में धर्म का बेइंतहा इस्तेमाल किया.

Indian Delegates muhammad ali jinnah

कुछ ऐसी ही कहानी टू नेशन थ्योरी के सबसे बड़े पैराकारों में एक हिंदू ने विनायक दामोदर सावरकर की थी. सावरकर भी जिन्ना की तरह यह मानते थे कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्रीयताएं हैं, जो कभी एक साथ नहीं रह सकती. सावरकर को हिंदुत्व शब्द गढ़ने और उसे एक विचारधारा के रूप में स्थापित करने वाला व्यक्ति माना जाता है. लेकिन निजी जीवन में वे नास्तिक थे. वे गाय को माता का दर्जा देकर पूजने को मूर्खता और मानव जाति का अपमान मानते थे. वे इस बात के हिमायती भी थे कि हिंदुओं को मांसाहार अपनाना चाहिए. सावरकर की बायोग्राफी के लेखक धनंजय कीर ने लिखा है—`अपनी पत्नी के निधन के बाद उन्होने किसी भी तरह के धार्मिक कर्मकांड की इजाजत नहीं दी थी’.

इमरान खान की नई दुल्हन की घूंघट में मुंह दिखाई दक्षिण एशिया की उसी राजनीतिक परंपरा का हिस्सा है, जिसमें नेताओं के निजी और सार्वजनिक चेहरे अलग-अलग होते हैं. जनता के बीच आने के लिबास और अल्फाज़ दोनों निजी जिंदगी से एकदम अलग होते हैं. कमाल की बात यह है कि जनता फिर भी उन पर भरोसा करती है.

( लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं )

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