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अमेरिका को मूर्ख बता कर ट्रंप कहीं 'मेक रशिया ग्रेट अगेन' तो नहीं चाह रहे?

ट्रंप से ये उम्मीद करना कि वो अमेरिकी विदेश नीति, संविधान, कानून और पार्टी के दायरे में रह कर शांति से व्हाइट हाउस में पांच साल का वक्त गुजारेंगे तो ऐसा सोचना भी उनकी शख्सियत के साथ ज्यादती होगी

Updated On: Jul 17, 2018 09:17 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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अमेरिका को मूर्ख बता कर ट्रंप कहीं 'मेक रशिया ग्रेट अगेन' तो नहीं चाह रहे?

आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप में अब अमेरिका के ही लोगों को एक अपराधी, देशद्रोही, अमेरिका को अस्थिर करने वाला और रूस की सरपरस्ती के आगे दोस्ती के नाम पर सिर झुकाने वाला चेहरा क्यों दिखाई दे रहा है? ट्रंप के अंदाज और मिजाज़ को जानने वाले अब उनके अल्हड़, बेतकल्लुफ, गैर सियासी तरीके और अपरंपरागत रवैये के अंदाज पर सवाल क्यों उठा रहे हैं?  आखिर ट्रंप ने ऐसा क्या नया कर डाला जो अबतक उनसे अपेक्षित नहीं था?

दरअसल इस बार ट्रंप ने जो किया इसका खुद उनकी रिपब्लिकन पार्टी को भी अंदाजा नहीं था. फिनलैंड में हेलसिंकी में दुनिया के दो शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्षों की मुलाकात पर वैश्विक दुनिया का पहरा था. लोग ये जानना चाहते थे कि इस द्विपक्षीय शिखर वार्ता से रूस-अमेरिका संबंधों में नया मोड़ क्या आता है. दोनों देशों के बीच कई दशकों तक चले शीतयुद्ध के बाद इस शिखर वार्ता पर वैसे भी पुराने विवादों का साया था.

लेकिन इस महामुलाकात में ट्रंप की ही वजह से अमेरिका में भूचाल आ गया. भूचाल के झटकों से रिपब्लिकन पार्टी भी डगमगा गई. इस भूचाल की वजह ट्रंप की पुतिन के लिये दीवानगी की हद से पार करती दोस्ती वजह बनी.

ट्रंप पर आरोप है कि उन्होंने पुतिन से दोस्ती निभाने की खातिर अमेरिका की सारी परंपराओं को ध्वस्त कर दिया. ट्रंप पर ये भी आरोप है कि उन्होंने रूस से रिश्ते सुधारने की हड़बड़ाहट में रूस के विरोध की रिपब्लिकन पार्टी की पारंपरिक नीतियों को भी नजरअंदाज किया है.

दरअसल साल 2016 में हुए अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में धांधली करने का रूस पर संगीन आरोप है. अमरीकी जांच एजेंसियों का मानना है कि रूस ने चुनावों और नतीजों को ट्रंप के पक्ष में करने का काम किया.

Donald Trump

अमरीका में विशेष अभियोजक रॉबर्ट म्यूलर राष्ट्रपति चुनाव में रूसी हैकिंग और साइबर अटैक की जांच कर रहे हैं. म्यूलर ने रूस के 12 खुफिया अधिकारियों पर अमेरिकी राष्ट्रपति पद की डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और उनकी पार्टी के कम्प्यूटर सर्वर को हैक करने और जानकारियां लीक करने का आरोप लगाया है. खास बात है कि ये आरोप एक सप्ताह पहले ही लगाए गए थे.

लेकिन जब डोनाल्ड ट्रंप से प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बारे में सवाल पूछा गया कि वो अमेरिकी चुनाव में मॉस्को के दखल पर खुफिया एजेंसियों को सही मानते हैं या नहीं तो उन्होंने रूस पर लगे आरोपों को सिरे से ही खारिज कर दिया. ट्रंप ने अपने ही देश की जांच एजेंसी एफबीआई को कटघरे में खड़ा कर दिया. ट्रंप ने कहा कि उन्हें CIA चीफ ने बताया था कि रूस ने हैकिंग को अंजाम दिया है. लेकिन वह इस पर भरोसा नहीं करते हैं. उन्हें नहीं लगता है कि रूस के पास ऐसा करने की कोई वजह है.

रूस के पास ऐसा करने की कोई वजह नहीं भी हो सकती है लेकिन ऐसा करने की कई वजहें हो भी सकती हैं. अमेरिका को अस्थिर करने से ही रूस मजबूत होगा. लेकिन यहां पर ट्रंप रूस की वकालत करते नजर आए. उन्होंने रूस पर लग रहे साइबर अटैक के आरोपों को राजनीतिक हमला करार दिया.

ट्रंप ने ट्वीट किया कि, ‘रूस के साथ हमारे रिश्ते इतने खराब कभी नहीं रहे और इसकी वजह कई साल से अमेरिकी मूर्खता और बेवकूफी और निशाना बनाकर की जा रही जांच है.’

ट्रंप के बयान के बाद सेनेटर जेफ फ्लैक ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन अमेरिका का कोई राष्ट्रपति रूस के राष्ट्रपति के साथ एक ही मंच पर खड़े हो कर रूस के खिलाफ आक्रामकता के लिये अमेरिका को ही जिम्मेदार ठहराएगा.

जाहिर तौर पर दुनिया का कोई भी राष्ट्राध्यक्ष कम से कम किसी दुश्मन या फिर प्रतिद्वन्द्वी देश के लिये अपनी जांच एजेंसी पर तो सवाल खड़े नहीं करेगा. रूस के संदर्भ में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति से ऐसे बयान की उम्मीद भी नहीं करेगा.

लेकिन ट्रंप का ये स्वाभाविक बयान है. कोई लाग-लपेट या हिचक या फिर किसी बात का डर नहीं. उनके इसी अंदाज के कायल हैं रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन जिन्होंने ट्रंप की बयार में बहते हुए बड़ा बयान दे दिया.

पुतिन ने कहा कि, ‘वो खुद भी चाहते थे कि डॉनाल्ड ट्रंप अमेरिका का राष्ट्रपति बनें.’ उन्होंने कहा कि वह बिजनसमैन ट्रंप की नीतियों की वजह से उन्हें राष्ट्रपति बनते देखना चाहते थे.

अब तक रूस के किसी पीएम या पूर्व राष्ट्रपति ने शायद ही कभी ऐसा कहा होगा कि उनकी पसंद का शख्स अमेरिका का राष्ट्रपति बना है. पुतिन को बिजनेसमैन ट्रंप पसंद हैं और अमेरिका अब इस उलझन में उलझता जा रहा है कि आखिर दोनों के बीच कौन सी सौदेबाजी हुई है?

आखिर पुतिन ऐसा कहें न भी तो क्यों? ट्रंप उनसे दोस्ती निभाने में नाटो, यूरोपीय देशों के बाद अपने ही देश को दुश्मन बना चुके हैं. इससे पहले नाटो समिट में भी ट्रंप ने कहा था कि रूस अमेरिका के लिये दुश्मन नहीं बल्कि प्रतिद्वन्द्वी है. वहीं दुनिया की आर्थिक महाशक्तियों के समूह जी-7 में रूस को दोबारा शामिल करने की वकालत भी की थी.

ट्रंप ने जो किया वो शायद ही किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष कभी कर सके. अपनी ही जांच एजेंसी को कटघरे में खड़ा कर ट्रंप ने रूस को क्लीन-चिट देकर दोस्ती का नया पासा फेंका है. उन्होंने ये बताने की कोशिश की है कि वो तमाम आंतरिक दबावों के बावजूद रूस के साथ दोस्ती को लेकर कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं.

ट्रंप कह रहे हैं कि दुनिया अब अमेरिका और रूस को साथ मिलकर चलते देखना चाहती है तो रूस के राष्ट्रपति पुतिन का कहना है कि अब समय आ गया है कि अलग-अलग अतंरराष्ट्रीय समस्याओं और संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत कर समाधान की तरफ बढ़ा जाए.

russia-vladimir-putin FINAL

ये तो वो बातें रहीं जो ट्रंप-पुतिन ने खुलेतौर पर कहीं. लेकिन अब चिंता उस बात के लेकर अमेरिका को सता रही होगी कि बंद कमरे में ट्रंप ने पुतिन से क्या बातें की होंगी क्योंकि उस वक्त दोनों के साथ कोई तीसरा नहीं था सिवाए दुभाषिए के.

ट्रंप इस शिखर वार्ता में अपनी ‘निजी विदेश नीति की कामयाबी देख सकते हैं. उत्तर कोरिया की तरह ही उन्होंने यहां भी रूस के राष्ट्रपति के साथ आत्मीय और अनौपचारिक मुलाकात की.

लेकिन अमेरिका की विदेश नीति, रणनीति और परंपरा के मुताबिक ट्रंप ने बेड़ागर्क कर दिया. अमेरिकी चिंतकों, विश्लेषको, समीक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों का वर्ग इस मुलाकात को बेहद शर्मनाक, दुखद अध्याय और देशद्रोह मान रहा है.

दरअसल पुतिन से मुलाकात से पहले ट्रंप पर ये भारी दबाव था कि वो इस शिखर वार्ता में चुनाव में रूसी दखल का मामला उठाएंगे. यहां तक कि इस मामले में लिखित बयान तक ट्रंप को दिया गया था. इसके बावजूद ट्रंप ने वो बयान नहीं पढ़ा और जो कह डाला उससे अमेरिकी आलोचकों के सिर चकरा गए.

ट्रंप के बयान को पूर्व सीआईए अधिकारी जॉन ओ ब्रेनन विश्वासघाती बता रहे हैं. जॉन ओ ब्रेनन ने ट्वीट किया, ‘डोनाल्ड ट्रम्प ने हेलसिंकी में प्रेस कॉन्फ्रेंस में सभी हदें पार कर दीं. उनका बयान एक बड़े अपराध से कम नहीं है.’

वहीं सेनेटर जॉन मकेन इस शिखर वार्ता को ‘दुखद’ बता रहे हैं तो ऐरिजोना से सेनेटर जेफ फ्लेक इसे शर्मनाक बता रहे हैं.

अमेरिकी मीडिया में तो डोनाल्ड ट्रंप को देशद्रोही तक बताया जा रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे ट्रंप ने ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के लिये सोए अमेरिकी स्वाभिमान को चाबुक मार कर जगा दिया हो.

वाशिंगटन रिपोर्ट के मुताबिक पुतिन के सामने ट्रंप को अमेरिकी चुनाव में रूस के दखल को लेकर सख्त रुख अपनाना चाहिये था. उन्हें बैठक से पहले 100 पेज की ब्रीफिंग भी दी गई थी. लेकिन ट्रंप ने ब्रीफिंग को नजरअंदाज कर पूरी शिखर वार्ता में अपनी मनमर्जी की. जबकि न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है कि ट्रम्प की तरह किसी भी पूर्ववर्ती अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस तरह परंपराओं के खिलाफ जा कर विदेश में बयान नहीं दिया है.

लेकिन ट्रंप के बयान पर आलोचनाओं का ये शोर रूस की हिम्मत बढ़ाने का ही काम करेगा. रूस की मजबूती अमेरिका के कमजोर होने पर निर्भर करती है. ट्रंप के खिलाफ बयानबाजी से दुनिया में अमेरिका खुद ये संदेश देने का काम करेगा कि व्हाइट हाउस की कमान रूस के हाथों में आ चुकी है.

अमेरिका को अब ये जान लेना चाहिये कि ट्रंप इतिहास में अपना नाम पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों की तरह लिखवाने नहीं आए हैं बल्कि वो उनसे अलग हटकर अपना अलग ही अध्याय दर्ज कराने आए हैं.

ट्रंप के ‘फ्यूचर प्लान’ चुनाव-प्रचार के वक्त ही सामने आ चुके थे. अब ट्रंप से ये उम्मीद करना कि वो अमेरिकी विदेश नीति, संविधान, कानून और पार्टी के दायरे में रह कर शांति से व्हाइट हाउस में पांच साल का वक्त गुजारेंगे तो ऐसा सोचना ट्रंप की शख्सीयत के साथ ज्यादती होगी. लेकिन एक सवाल तो उठता ही है कि क्या ट्रंप अब खुद को अमेरिका से ऊपर समझने लगे हैं?

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